yogi adityanath

भारतीय संस्कृति सभ्यता, धर्म का मूल आधार प्राचीन काल से गौ ही रही है। गोभक्ति, गोपालन को अपने जीवन का सर्वोत्कृष्ट कर्तव्य माना हैै। वेद-शास्त्र, स्मृतियाँ, पुराण तथा इतिहास गौ की उत्कृष्ट महिमाओं से ओत-प्रोत हैं। स्वयं वेद गाय का नमन करता है।

अध्न्ये ते रूपाय नमः – हे अवध्या गौ! आपके स्वरूप को प्रणाम है। ऋग्वेद में कहा गया है कि जिस स्थान पर गाय सुखपूर्वक निवास करती है, वहाँ की रज पवित्र हो जाती है, वह स्थान तीर्थ बन जाता है। हमारे जन्म से मृत्युपर्यन्त सभी संस्कारों में पंचगब्य और पंचामृत की अनिवार्य अपेक्षा रहती है। गोदान के बिना हमारा कोई भी धार्मिक कृत्य सम्पन्न नहीं होता। गौ अपनी उप्तत्ति के समय से ही भारत के लिये पूजनीय रही है। उसके दर्शन, पूजन, सेवा-शुश्रूषा आदि में आस्तिक जन पुण्य मानते हैं। व्रत, जप, उपवास सभी में गौ और गोप्रदत्त पदार्थ परमावश्यक है। गाय का दूध अमृत-तुल्य होता है जो शरीर और मस्तिष्क को पुष्ट करता है। गौमूत्र गंगाजल के समान पवित्र माना जाता है और गोबर में साक्षात् लक्ष्मी का निवास है। शास्त्रों के अनुसार हमारे अंग-प्रत्यंग, मांस-मज्जा-चर्म और अस्थि में स्थित पापों का विनाश पंचगव्य (गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र एवं गोमय) के पानसे होता है। आर्युर्वेद और आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी शरीर-स्वास्थ्य एवं रोग-निवृत्ति के लिये गाय के दूध, दही, मठ्ठा, मक्खन, घृत, मूत्र, गोबर आदि का अत्यन्त उपयोग है।

गाय के शरीर में सभी देवताओं का निवास है। अतः गौ सर्वदेवमयी है। पुरातन काल से ही भारतीय संस्कृति में गाय श्रद्धा का पात्र रही है। भगवान् श्रीराम ने यौवन में प्रवेश करते समय अपने जीवन का लक्ष्य ‘गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्यास्य सुखय च’ के पवित्र संकल्प की पूर्ति के लिये ही उद्घोषित किया था। गाय के प्रति भारतीय भावना कितनी श्रद्धा और कृतज्ञता से ओत-प्रोत थी, यह इस श्लोक से स्पष्ट होता है-

गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो में सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्।।

पुराणों में पद-पद पर गौ की अनन्त महिमा गायी गयी है। भारतीय संस्कृति ही नहीं अपितु सारे विश्व में गौ का बड़ा सम्मान था। जैसे हम गौ की पूजा करते हैं, उसी प्रकार पारसी लोग साँड़ की पूजा करते हैं। मिश्र के प्राचीन सिक्कों पर बैलों की मूति अंकित रहती है। ईसा से कई वर्ष पूर्व बने हुए पिरामिडों में बैलों की मूर्ति अंकित है।

भारतीय संस्कृति यज्ञ-प्रधान है। वेद, रामायण, महाभारत आदि धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थों में यज्ञ को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यज्ञ करने से पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश-इन पंचभूतों की शुद्धि होती है। पंचभूतों के सामंजस्य से मानव-शरीर बना है। अतः शरीर को सुरक्षित रखने के लिये पंचभूतो का शुद्ध रूपों में उपयोग आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। यज्ञ करने से जो परमाणु निकलते हैं, वे बादलों को अपनी ओर खींचते हैं। जिससे वर्षा होती है। यज्ञ में गाय के सूखे गोबर का प्रयोग किया जाता है। इस सूखे गोबर से एक प्रकार का तेज निकलता है, जिससे लाखों विषैले कीट तत्क्षण ही नष्ट हो जाते हैं। गौ के सूखे गोबर को जलाने से मक्खी-मच्छर आदि मर जाते हैं। गौ के दूध, दही और घी आदि में वे सब पौष्टिक पदार्थ वर्तमान हैं जो अन्य किसी दुग्धादि में नहीं पाये जाते। गोमूत्र में कितने ही छोटे तथा बड़े रोगों को दूर करने की शक्ति है, इसके यथाविधि सेवन करने से सभी प्रकार के उदर-रोग, नेत्ररोग, कर्णरोग आदि को मिटाया जा सकता है। कई संक्रामक रोग तो गौओं के स्पर्श की हुई वायु लगने से ही निवृत्त हो जाते हैं। गौ के सम्पर्क में रहने से चेचक-जैसे रोग नहीं होते। धर्म और संस्कृति की प्रतीक होने के साथ-साथ गाय भारत की कृषि-प्रधान अर्थ-व्यवस्था की भी रीढ़ है। कौटिल्य-अर्थशास्त्र में गोपालन और गोरक्षण को बहुत महत्व दिया गया है। जिस भूमि में खेती न होती हो उसे गोचर बनाने का सुझाव अर्थशास्त्र का ही है। गौ धर्म और अर्थ की प्रबल पोषक है। धर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा अर्थ से कामनाओं की सिद्ध होती है। इस प्रकार गौ से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसीलिये प्राचीन काल से ही गौ का भारतीय जीवन में इतना ऊँचा महत्व है। हमारे देश में गोपालन पश्चिमी देशों की भाँति केवल दूध के लिये नहीं होता है, प्रत्युत अमृततुल्य दूध के अतिरिक्त खेत जोतने के लिये एवं भार ढोने के लिये बैल तथा भूमि की उर्वरता बनाये रखने के लिये उत्तम खाद भी हमें गाय से प्राप्त होती है, जिसके अभाव में हमारे राष्ट्र की अर्थव्यवस्थ का संकट किसी प्रकार दूर नहीं किया जा सकता। हमारे देश में लाखों एकड़ भूमि ऐसी है जहाँ ट्रैक्टरों का उपयोेग ही नहीं किया जा सकता।

आज गौ को व्यावहारिक उपयोगिता की दृष्टि से भौतिक तुला पर तौला जा रहा है। हमें याद रखना चाहिये कि आज का भौतिक विज्ञान गौ की इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमोत्कृष्ट उपयोगिता का पता ही नहीं लगा सकता, जिसे भारतीय शास्त्रकारों ने अपनी दिव्य दृष्टि से प्रत्यक्ष कर लिया था। गौ की धार्मिक महानता उसमें जिन सूक्ष्मातिसूक्ष्म-रूप तत्वों की प्रखरता के कारण है, उनकी खोज तथा जानकारी के लिये आधुनिक वैज्ञानिकों के भौतिक यन्त्र सदैव स्थूल ही रहेंगे। यही कारण है कि इक्कीसवीं सदी की ओर अग्रसर ‘गैढ’ विज्ञानवेत्ता भी गोमाता के लोम-लोम में देवताओं के निवास-रहस्य और प्रातः गोदर्शन, गोपूजन, गोसेवा आदि का वास्तविक तथ्य समझने में असफल रहा है। गौ का धार्मिक महत्व भाव-जगत् से सम्बन्ध रखता है और वह शास्त्र-प्रमाण द्वारा शुद्ध भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से ही जाना जा सकता है। इन सब विशेषताओं के कारण गौ को भारतीय संस्कृति का मूलाधार कहा गया है।

सारांस गौसेवा परम्सेवा है। जैसे बने करते रहिये।

जय सियाराम, जय हनुमान जाय गौमाता।

लेखक-अनिल यादव।

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