yoga ka meaning

‘योग’ शब्द का अर्थ वास्तव में निषेधपरक न होकर विधिपरक है। इसमें कोई संदेह नहीं है। परन्तु योगसूत्र में ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ इस प्रकार योग का जो प्रारम्भिक वर्णन किया है, वह निषेधपरक ही है। इसका कारण प्रार्थमिक अभ्यासी की, योग के तात्विक स्वरूप को, जो ‘स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते’ के अनुसार स्वयंसंवेद्य ही है, समझने की क्षमता का न होना ही है।

योग के विषय में ध्यान रखने की दूसरी बात यह है कि योग वास्तव में एक दर्शन नहीं है। वह तो वृत्तियों के रूप में फलझरी-सदृश प्रतिक्षण उपक्षीयमाण जीवनी-शक्ति को स्वरूप में स्थिर करके अनधभस्वर मणि की तरह स्वयं प्रकाश आत्मा के स्वरूप को ‘अनुभव’ करने की एक विशिष्ट कला है। इसी कला का विभिन्न दृष्टियों से भगवद्गीता में ‘समत्वं योग अच्यते’, योगः कर्मसु कौशलम्’ इस प्रकार वर्ण किया है। पर इस कला का भी दार्शनिक आधार होना चाहिये। इसी दृष्टि से जैसे न्याय (तर्क) का कला होने पर भी, दर्शनों में समावेश किया जाता है, उसी प्रकार योग की गणना दर्शनों में की गयी है।

अर्थात् शून्यवाद के सदृश ‘योग’ निषेधपरक नहीं है, वरं अन्वयव्यतिरेक के साथ नेति-नेति द्वारा परब्रह्म परमात्मस्वरूप को प्राप्त कराता है।

योग के अंगो के अनुष्ठान से अशुद्धि के नाश होने पर ज्ञान का प्रकाश विवेक-ख्याति-पर्यन्त हो जाता है।

योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि बताये गये है। इनमें सबसे अन्तिम अंग (स्रम्प्रज्ञात) समाधि है। इस सम्प्रज्ञातसमाधि की चार भूमियाँ-वितर्कानुगत, वियरानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत है।
इपर हमने अवरोह क्रम बतला दिया है। इससे उलटे आरोह क्रम में जितनी अन्तर्मुख्चाता बढ़ती जायगी, उतना ही और तमका विक्षेप तथा मल हटकर सत्व का प्रकाश बढ़ता जायेगा। और इस सत्व के प्रकाश में चेतन (आत्म-स्पर्श) की अधिक स्पष्टता से प्रतीति बढ़ती जायेगी। यही क्रम बन्धको हटाने और मोक्षकी प्रप्ति का है।

लेखक अनिल यादव।

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