वैराग्य तथा साधुत्व से मण्डित आपका इतिहास अत्यन्त पवित्र रहा है। बाल्यकाल में जब आपको श्रीसीतारामजी की अहैतु कृपा से बैराग्य हुआ तो आप पारिवारिक माया-जाल, ममता, मोह आदि का त्याग करके वैरागी साधु बनने के उद्देश्य से श्री अयोध्याजी आये। सबसे पहले आप तपस्वीजी की छावनी पहुँचे। वहाँ के महन्त श्री रामदासजी महाराज ने आपके परम सत्व को पहचान लिया, क्योंकि वे महाराज एक पहुँचे हुए सिद्ध-सन्त थे। उन्होंने कहा ‘‘बेटा, तुम श्रीमणिरामदास छावनी चले जाओ। वहीं जाकर तुम मन्त्र-दीक्षा लो और वहीं का शिष्यत्व ग्रहण करो। तुम्हारा अवतार वहीं के लिए हुआ है। वहाँ पर तुम्हारी अत्यन्त तीव्रता के साथ प्रतीक्षा हो रही है।’’

श्री वैष्णवदास जी महाराज तपस्वीजी की छावनी के महान्त के कथनानुसार श्रीमणिरामदास छावनी आकर अपने अयोध्या आने का लक्ष्य बतलाए। उन्होंने महाराज जी से मन्त्र-दीक्षा देने के लिए निवदेन किया। श्रीमणिरामदास जी महाराज ने श्रीहनुमन्तलाल जी महाराज की यही इच्छा है, ऐसा समझकर शुभ मुहूर्त में श्री वैष्णवदास जी महाराज को विधिवत् पंच-संस्कार की दीक्षा दी और उन्हें अपना उत्तराधिकारी शिष्य बनाया। उसके पश्चात् आपने श्री वैष्णवदास जी महाराज को आदेश दिया कि तुम मेरे शरीर त्याग के पश्चात भी छावनी की परम्परा को अक्षुण्ण बनाये रखना। गुरूदेव के साकेतवासी हो जाने के बाद श्री वैष्णवदास जी महाराज ने छावनी के पीठाधीश्वर पद को आठ वर्ष से अधिक समय तक सुशोभित किया। आप एक टकसारी महान्त थे, इसलिए आप अपने शिश्यों को भी टकसार सिखाते थे। ‘टकसार’ शब्द साधुओं की एक सांकेतिक भाषा है। इसमें अपना नाम और अपने आचार्य का नाम लेने की विधि, धाम, क्षेत्र, पंच-संस्कार, अखाड़ा-गुरूद्वारा आदि के सम्बन्ध में प्रश्न पूछा जाता है। जो साधु सही उत्तर देता है वही ठीक साधु माना जाता है, अन्यथा उसे ‘खड़िया’ साधु कहा जाता है। अर्थात् साधु समाज में उसकी प्रतिष्ठा नहीं होती। अब यह परम्परा प्रायः धूमिल होती जा रही है।

स्वामी श्री वैष्णवदास जी महाराज एक उच्चकोटि के तापोनिष्ठ सन्त थे। आपको श्रीरामचरित मानस गुटका की सिद्धि थी। आप में अनेक चमत्कारिक गुण थे। आपके समय में छावनी का दरावाजा सन्तों के लिये कभी बन्द नहीं होता था। आप स्वयं सन्तों के जूठे पत्तल अपने हाथों के उठाते थे। आपकी सन्त-निश्ठा एवं कैकंर्य-निष्ठा के ये श्रेष्ठतम उदाहरण हैं। एक बार आपके समय में बाहर से कोई एक श्रीमहान्त जी आये। उस समय श्री स्वामी जी फलाहार करते थे। श्रीमहान्त जी ने कहा कि मेरा भी फलाहार आपके साथ ही होगा। तब स्वामी जी ने कहा- ‘‘हम आपके फलाहार की व्यवस्था अलग से करा देते हैं।’’ श्री महान्त जी ने कहा- ‘नहीं। नहीं। मैं तो आपके साथ ही फलाहार पाऊँगा।’ जब फलाहार का समय आया, तब दो पत्तलों में उबले हुए नीम के पत्ते सामने आये। यह देखकर उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि छावनी के इतने बड़े महान्त होते हुए भी नीम की पत्तियों का फलाहार! श्रीमहान्त जी ने कहा- ‘महाराज जी! आपने तो अपनी जिव्हा पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। मैंने तो अनुमान लगाया था कि आप फलाहार में माल-टाल छानते-घोंटते होंगे।’

अनन्त श्री विभूषित श्री वैष्णवदास जी महाराज एक सिद्ध सन्त थे। आप अपने संकल्प मात्र से क्षण भर में कहीं से कहीं पहुँच जाते थे। यदि किसी सन्त को यदा-कदा आपकी सिद्धि का पता लग जाता तो आप उसे किसी को न बताने के लिए कह देते थे। आपका जीवन सादा और त्यागमय था। सन्त-महात्माओं की सेवा में आपकी अपार निष्ठा थी।

सारांस यही हैं कि भक्ति दिखावे के लिए न करके मन से करना चाहिये। भक्ति का यही सार है।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक -अनिल यादव।

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