आप अपने गुरूदेव श्री वैष्णवदास जी महाराज के शिष्यों में सुयोग्यतम शिष्य थे। आपने बहुत पहले से ही महाराजश्री का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया था। अपने गुरूदेव जी के महन्तत्व के समय सारा कामकाज आपने ही सम्हाला था। आपके पीठाधीश्वर काल में दुकानदार के याहाँ से खाद्य-सामग्री उधार में मँगायी जाती थी। एक बार किसी कारणवश सेठ जी का बकाया धन कुछ दिनों तक रूक गया। सेठ जी ने बार-बार तगादा भिजवाया और श्री जानकीरमण को साक्षी देने जैसी कोई बात कह दी। लेन-देन के मामले में भगवान् को बीच में डालना श्री महाराज जी को बहुत बुरा लगा। आपने अपनी सिद्धि के बल पर सेठ जी का सारा बकाया रकम चुकता कर दिया। उसी समय से महाराज ने नियम बनाया कि चाहे जैसी भी परिस्थिति क्यों न हो, दुकानों से कोई भी सामान उधार नहीं लाया जायेगा। उसी समय से प्रायः इस नियम का छावनी में आज भी पालन हो रहा है। इधर सेठ जी को बहुत पश्चाताप हुआ।

आपने ही श्री भगवान् के पुराने मन्दिर को तोड़वाकर नया मन्दिर बनवाने का निश्चय किया, किन्तु शरीर ने साथ नहीं दिया। कुल मिलाकर सिर्फ दस वर्ष तक ही आपने पीठाधीश्वर पद को सम्हाला था कि श्रीभगवद् धाम पधारने का अटल आदेश सन् 1906 में मिल गया। किन्तु, आपकी यशस्विता आज भी छावनी में विद्यमान है।

सारांस यही है कि पत्येक व्यक्ति को सदमार्ग पर चलते हुए जितना है उतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहिए। किसी प्रकार का अतिरिक्त प्रयास नहीं करना चाहिये। समय आने पर भगवान् सब कर देते हैं।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक- अनिल यादव।

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