swami maniramdas ji

विन्दु तिलक प्रवर्तकाचार्य दीनबन्धु स्वामी श्री रामप्रसादाचार्य जी महाराज के प्रशिष्य स्वामी श्रीहनुमानदास जी महाराज थे। इन्हीं के शिष्य स्वामी श्री मणिरामदास जी महाराज थे। आप ही ‘श्रीमणिरामदास छावनी’ के आदि संस्थापक हैं। पहले-पहल आप ‘बड़ी जगह’ अपने गुरूद्वारे में रहते थे। वहाँ पर आप सन्त-महात्माओं की सेवा और श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का पाठ किया करते थे। सन्तों को प्रसाद पवाने के पश्चात् ही आप प्रसाद ग्रहण करते थे। एक दिन सन्तों की सेवा के सम्बन्ध में अपने गुरू भाइयों से आपका कुछ विवाद हो गया। वह आपको अच्छा नहीं लगा, इसलिये आप तपस्या करने के लिए श्री चित्रकूट धाम चले गये और वहाँ एक घरघोर जंगल में रहने लगे।

श्री चित्रकूट में आप श्रीमारूतिनन्दन हनुमान जी महाराज को प्रसन्न करने के लिए अत्यन्त कठोर साधना में जुट गये। वहाँ आप श्री हनुमान जी महाराज को श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का नित्य पाठ सुनाते थे। रूखा-सूखा प्रसाद पाने से और कठिन तपश्चर्या करने से आपका शरीर बिलकुल कृश हो गया, फिर भी भगवद्-भजन, भगवद्-आराधना में दिन-रात तत्पर रहते थे। इस तरह से आपके बारह वर्ष के कायिक, वाचिक एवं मानसिक संयम के पश्चात् श्री हनुमान् जी ने आपके ‘ऊपर अहैतु की कृपा की और आपको दिव्य दर्शन दिया। श्री हनुमान् जी का दर्शन पाकर आप कृतकृत्य हो गये, आपका जीवन धन्य हो गया। आज आपकी तपस्या पूरी हो गयी। आपने श्री हनुमान् जी महाराज को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। आपकी सन्तों की सेवा में तीव्र निष्ठा थी, इसीलिये ज्ञानिनाम् ग्रगण्यं, सर्वज्ञ, सुजान श्री हनुमान् जी महाराज ने साधु-सेवा करने के लिए आपको एक अत्युत्तम ‘दिव्य-मणि देते हुए कहा- ‘‘तुम अयोध्या जी चले जाओ और सरयू जी के किनारे निवास करो।

इस ‘दिव्य-मणि’ के प्रभाव से साधु-सेवा करते रहो। कभी भी किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।’’ श्री महाराज जी ने कहा- ‘‘भगवन्! इसे मैं क्या करूँगा? चोर इसे चुराने का प्रयास करेंगे। मुझे इसकी पूरी सुरक्षा करनी होगी; जिससे मेरे भजन में व्यवधान उत्पन्न होगा, इसलिये मुझे ऐसी दिव्य-सम्पत्ति की आवश्यकता विलकुल नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और कुछ देना ही चाहते हैं तो आप स्वयं ही मेरे साथ चलिये, क्योकि आप मणियों के भी मणि हैं। ‘‘अष्ट-सिद्धि नव-निधि के दाता।’’ भगवन्! आप जहाँ पर विराजमान रहेंगे, वहाँ किस चीज की कमी होगी? श्रीहनुमान् जी ने कहा- ‘‘एवमस्तु, ऐसा ही होगा, किन्तु ध्यान रखना, मैं ऐसे प्रकट रूप में नहीं, बल्कि एक पाषाण श्री विग्रह के रूप में आऊँगा, जिसे तुम मेरी प्रेरणा से पहचान जाओगे।

तत्पश्चात् स्थायी रूप से मैं तुम्हारे पास छावनी में रहूँगा। इसलिए तुम चलो, मैं कुछ दिनों के बाद आऊँगा।’’
श्री हनुमान जी के आदेशानुसार श्री महाराज अयोध्या जी आ गये, सरयू जी के किनारे घास-फूस की झोपड़ी छाकर कुटिया ‘श्रीमणिरामदास छावनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। आज जहाँ पर श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण भवन स्थित है पहले वहाँ पर सरयू जी बहती थीं। महाराजश्री यहाँ पर ही यथाशक्ति साधु-सेवा करते रहे। कहा जाता है कि एक दिन कोई सेठ जी श्री हनुमन्तलाल जी के पाषाण श्री विग्रह को खरीद कर और बैलगाड़ी पर लादकर स्थापना कराने के उद्देश्य से किसी निर्दिष्ट स्थान पर ले जा रहे थे। ठीक छावनी के सामने आने पर बैलगाड़ी की धुरी-कील टूट गयी। पाषाण श्रीविग्रह खिसक कर सरयू जी की रेती में आ गया। गाड़ी की मरम्मत हो जाने पर श्रीविग्रह को चढ़ाने के लिए लाख कोशिश की गयी, किन्तु वह श्रीविग्रह टस से मस नहीं हुआ। सेठजी को बड़ा आश्चर्य इसलिये हुआ कि जहाँ श्रीमूर्ति खरीदी गयी थी वहाँ पर इने-गिने व्यक्तियों ने ही उसे गाड़ी पर आराम से चढ़ा दिया था। लेकिन यहाँ क्या हो गया ? इतने सारे व्यक्तियों के बल प्रयोग करने पर भी यह श्रीमूर्ति चढ़ायी नहीं जाती। सेठ जी ने कहा-‘‘बाबा जी! आपने कौन सी जादूगरी की है? यह श्रीविग्रह बहुत प्रयत्न करने पर भी नहीं उठता है। ऐसा लगता है कि श्री हनुमान् जी महाराज आपके पास रहना चाहते हैं। बाबा जी! सुनें, यदि आप इस श्रीविग्रह को उठा सकते हैं तो अपनी कुटिया (छावनी) में विराजमान कर लीजिये। इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।’’

श्री हनुमान् जी महाराज की प्रेरणा से, महराजश्री समझ गये कि श्री चित्रकूट धाम के अपने वरदान को पूर्ण करने के लिए श्री हनुमन्तलाल जी महाराज आ गये हैं। ऐसा समझकर बाबाजी मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न हुए। आपने श्री हनुमन्तलाल जी की पूजा-आरती की। नैवेद्य चढ़ाया। साष्टांक दण्डवत् प्रणाम किया। दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे- ‘‘है नाथ! आप अहैतु की कृपा करके यहाँ पधारे हैं। यह कुटिया (छावनी) आपकी ही है। आप अपनी सेवा स्वयं सम्भालें। मैं आपका दास हूँ। मैं सिफ एक निमित्त मात्र हूँ, लेकिन आप मेरे स्वामी हैं, कर्ता-धर्ता आप ही हैं। आप अपने श्रीविग्रह का भार सामान्य कर लें ताकि मैं आपको छावनी में प्रतिष्ठापित कर सकँू।’’ सचमुच, देखते ही देखते अल्प प्रयास तथा अल्प बल प्रयोग से ही वह श्रीविग्रह उठ गया। वहाँ पर उपस्थित लोगों ने श्री हनुमान जी के इस दिव्य चमत्कार को देख। सब लोगों ने श्री हनुमान जी महाराज का जय-जयकार किया। लोगों ने महाराजश्री की भूरि-भूरि प्रशंसा की। साधुवाद! सधुवाद!! की गर्जना से आकाश गूँज उठा।

श्री हनुमन्तलाल जी महाराज का पाषाण श्रीविग्रह छावनी में स्थापित करा दिया गया, जो छावनी के मन्दिर में सर्वसिद्ध श्री हनुमान् जी महाराज के रूप में आज भी विराजमान हैं। श्रीमहाराज जी स्वयं ही श्री हनुमन्तलाल जी महाराज को श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का पाठ सुनाया करत थे। इसीलिये वर्तमान में भी वही क्रम किसी न किसी रूप् में पण्डितों द्वारा आज भी व्यवहृत होता चला आ रहा है।

महाराजश्री ने अपने जीवनकाल में ही छावनी के लिए नियम बना दिया था कि किसी से कुछ मांगना नहीं। भगवद् इच्छा से अयाचित रूप में, आकाश-वृत्ति से जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसे भक्त और भगवान् की सेवा में लगाना। यदि कोई जमीन, जायदाद, भवन आदि स्थायी सम्पत्ति देना चाहे तो उसे स्वीकार नहीं करना। उनका यही मानना था कि इससे प्रपंच बढ़ता है, कचहरियों का मुँह ताकना पड़ता है। जिससे भजन में बाधा पड़ती है और भगवान् श्री जानकीरमण में भरोसा भी कम हो जाता है। इसलिए आकाश-वृत्ति से जो कुछ भी मिल जाय, उसी से सन्तोष करके सोवा-पूजा करनी है, क्योंकि इसी में साधुता भी है।

महाराजश्री यह भी आदेश दे गये हैं कि साधुओं को कभी भी जवाब नहीं देना है, जब तक वे साधुता की मर्यादा को भंग नहीं करते। मर्यादित साधु जीवन-पर्यन्त छावनी में बेरोक-टोक अपने निजी घर की तरह आराम से जीवन-यापन कर सकते हैं।

छावनी का पवित्र इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। यहाँ का परम्परागत मूल-धर्म ‘साधु-सेवा’ है। महाराजश्री के जीवन काल में लगभग पच्चीस वार्षो तक अनवरत साधु-सेवा होती रही। सन् 1835 में महाराजश्री अपने नश्वर देह का परित्याग करके परम धाम साकेत चले गये। आपकी उदार भक्ति-भावना के विषय में श्री अवध धाम में एक लोकप्रिय लोकोत्ति प्रचलित है कि-
खेती करै औ हरि भजै, जथा सक्ति कछु देय।

याहू पै हरि ना मिलै, तो मनीराम से लेय।।
सचमुच, महाराज श्रीमणिरामदास जी सन्त-सेवा के साकार स्वरूप थे। वे साधना और आराधना के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे सात्विक विचारधारा के निस्पृह, निर्लोभी तथा निर्विकारी सन्त-शिरोमणि थे। उन्होंने कभी किसी का निरादर नहीं किया, कभी किसी का अपमान नहीं किया। वे सहजता, सरलता और निश्छलता की प्रतिमूर्ति थे। वे छावनी के लिए अनन्य थे और छावनी आपको पाकर धन्य हुई।

ऐसे महापुरूष को मेरा बारम्बार साष्टांग दण्डवत् प्रणाम।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक अनिल यादव।

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