भगवान् श्रीराम जी लंका विजय करके श्री अवध धाम में पधार चुके हैं। उनका राज्याभिषेक हो चुका है। प्रतिदिन प्रातःकाल हनुमान् जी युगल सरकार के श्रीचरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया करते थे। ज्यों ही प्रभु की कृपामयी दृष्टि हनुमान् जी पर पड़ती थी, त्योंही उन्हें हनुमान जी द्वारा किये हुए उपकारों की याद आ जाती थी, तो प्रभु भाव विभोर जाते थे।

मधुर ललित ललाम नर-लीला का अभिनय करते हुए मार्यादा पुरूषोत्तम भगवान् श्रीराम जी जब अपनी प्राणवल्लभा श्रीसीताजी को ढूँढते हुए किष्किन्धा पहुँचे तो सर्वप्रथम हनुमान् जी से मिले। इसके बाद हनुमान् जी द्वारा सुग्रीव जी की श्रीराम जी से मित्रा करवाना तथा श्रीसीताजी के अन्वेषण से लेकर रावण विजय पर्यन्त, श्रीराम सेवा में जो योगदान हनुमान् जी का रहा, वह सब कुछ श्रीयुगल सरकार के लिये अविस्मरणीय है। श्रीहनुमानजी द्वारा समुद्रलंघन, लंकादहन, द्रोणांचल आनयन इत्यादि अघटित-घटन सामथ्र्य से श्रीयुगल सरकार अत्यन्त प्रभावित तो थे ही, साथ ही हनुमान जी के ऋणिया भी बन गये। श्रीभगवान् ने स्वयं ही कहा है-

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होई न सकत मन मोरा।
सुनि सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

प्रेम की प्रतिमा श्रीहनुमान जी को सम्बोधित करते हुए पुनः एक बार प्रभु श्रीराम जी ने कहा था-

एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे।
शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिना वयम्।।
मदंगे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे।
नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम्।।

हे हनुमान्! तुम्हारे एक-एक उपकार का ऋण चुकाने में अपने प्राण समर्पण करने को अद्यत हूँ; परन्तु तुम्हारे जो अनेकों उपकार शेष रह जाते हैं; उनके लिए तो हम सपरिवार तुम्हारे ऋणी ही रहेंगे। मैं नहीं चाहता हूँ कि तुमसे उऋण हो जाऊँ। तुम्हारे उपकार मेरे अंग में पच जायँ, क्योंकि किसी का प्रत्युपकार तभी किया जाता है, जब वह आपत्ति में पड़ा हो। मैं स्वप्न में भी नहीं चाहता कि तुम पर कोई आपत्ति आये।

इधर भगवती श्रीकिशोरी सीता जी कहती हैं-

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।
का देउँ तोहि तैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा।।

बे बार-बार कहती हैं- हे हनुमान् मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है।

इसीलिए तो श्री हनुमान् जी के लिए श्रीयुगल सरकार सदैव मंगल कामना करते हैं। आज तो किशोरी जी के मन में वात्सल्य भाव उमड़ा कि हनुमान् ने मेरे लिए कितना अधिक कष्ट झेला। उसके उपकारों को मैं कभी भी नहीं भूल सकती। हनुमान् मेरा लाड़ला पुत्र है, अतः क्यों न मैं स्वयं ही रसोई बनाकर उसे भोजन कराऊँ। अब तो बस क्या कहना, दूसरे दिन ही हनुमान जी को प्रसाद पाने का निमन्त्रण मिल गया।

इधर हनुमान् जी के आनन्द का ठिकाना न रहा। वे खुशी से उछलने-कूदने लगे, नाचने-गाने लगे, ऐसा होना स्वाभाविक ही था क्योंकि जगन्माता स्वयं भोजन बनाकर जिन्हें खिलायें, यह सौभाग्य किसे मिलता है? दूसरे दिन विदेहनन्दिनी जगज्जननी पराम्बा भगवती माँ श्रीसीताजी ने बड़े ही उत्साहपूर्वक छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाये, और अपने प्यारे दुलारे हनुमान् जी को सम्मुख आसन पर बैठाकर, भोजन परोसने लगीं। निखिलेश्वरी भगवती अन्नपूर्णा श्रीरामवल्लभा स्वयं ही अपने कर-कमलों से परोस रही थीं। उनके परम स्नेहभाजन लाड़ले सुपुत्र हनुमान् जी प्रसाद पा रहे थे। मातायें जब स्नहे से भोजन परोसें तो पुत्र को क्षुधा न भी लगी हो तो लग जाय। इधर हनुमान् जी मस्ती में भाव-विभोर होकर प्रसाद पा रहे थे। जो कुछ भी थाली में आ जाता एक ही कौर में चट कर देते थे। हनुमान् जी न जाने कितना पा गये, इसका कोई हिसाब नहीं।

श्रीजानकी जी प्रसाद फेरते-फेरते थक गयी। पसीना टपकने लगा। फिर भी हनुमान् जी को महापूरण नहीं करा पा रही थीं। अयोध्या नरेश चक्रवर्ती सम्राट के रसोई घर का व्यंजन समाप्त होने को आया किन्तु हनुमान् जी का हाथ शिथिल नहीं हो रहा था। अन्त में जब बिलकुल थक गयीं तो जनकनन्दिनी वैदेही मैथिली जी ने लखनलाल जी को बुलवाया और अपनी कठिनाई प्रस्तुत की। लखनलाल जी इनका रहस्य लख गये। उन्होंने कहा-माता जी! ये तो साकेत के साक्षत् महारूद्र ही हैं। इनको भला, इस प्रकार कौन तृप्त कर सकता है? लक्ष्मण जी ने एक तुलसीदल पर ‘राम’ नाम का चन्दन से लेखनजप कर हनुमान् जी के भोजनपात्र में डाल दिया। वह तुलसी प्रसाद मुख में जाते ही हनुमान् जी ने तृप्ति की डकार ली और इस तरह से महापूरण हुए। पात्र में बचे हुए अन्न को पूरे शरीर में उन्होंने लीप लिया। वे हृदयावेश में प्रेमपूर्वक नृत्य करते हुए, ‘‘श्रीराम जय राम जय जय राम’’ का संमीर्तन करने लगे।

मंगल-मूरति मारूति-नन्दन।

सकल-अमंगल-मूल-निकंदन।

पवनतनय संतन-हितकारी।

हृदय बिराजत अवध बिहारी।।

सारांस यही है कि ‘राम’ नाम लिये बगेर यह शरीर तृप्त नहीं हो सकता। मानव शरीर की तृप्ति का अन्य कोई साधान नहीं है। इसलिए जपो निरंतर ‘‘जय सियाराम जय जय सियाराम।’’

जय सियाराम जय हनुमान्।

लेखक- अनिल यादव।

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