hanuman ji

भगवान् मर्यादा पुरूतोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक सम्पन्न हो रहा था। इसलिए राजाधिराज अयोध्या सम्राट को सब माण्डलिक नरेश अपनी भेंटें समर्पित कर रहे थे। विभीषण जी ने भी बड़े प्रेम से रत्नों की एक दिव्य मणिमाला बनावायी और राज्याभिषेक के समय वही मणिमाला भक्तिपूर्वक श्रीरघुनाथ जी को भेंट की-

रतन अपार क्षीरसागर उधार किये लिये हित चाय कै बनाय मा करी है।

सबसुखसाज रघुनाथमहाराजजू को भक्तिसों विभीषणजू आनि भेंटधरी है।।

(भक्तमाल)

सुरदुर्लभ उस दिव्य मणिमाला को देखकर राजसभा में बैठे हुए सेवकों के मन लेने की चाह हुई।
ऐसा कहा जाता है कि चाहने वालों कोनहीं मिलाता और जो नहीं चाहता है, उसको सब कुछ मिल जाता है। एकमात्र श्री हनुमान् जी वहाँ निष्काम थे। सर्वज्ञ प्रभु ने विचार किया-माला एक है और चाहने वाले अनेके हैं। लंका-विजय मैंने इन्हीं वानर-सेवकों के द्वारा की है। यदि किसी एक को दे दूँगा तो शेषा अप्रसन्न हो जायेंगे। इसमें पक्षपात की कल्पना हो सकती है। अतः श्रीराघवेन्द्र जी ने वह माला श्रीजानकी जी के गले में डाल दिया। चूँकि श्रीकिशोरी जी प्राणवल्लभा हैं, इसलिये इनमें किसी को कष्ट नहीं हुआ।

सुरदुर्लभ श्रेष्ठतम मणियों की वह दिव्य माला राज्याभिष्योक के सुनहरे सुअवसर पर अवध की सम्राज्ञी श्रीकिशोरी जी के कण्ठ को भूषित कर स्वयं ही सुशोभित होकर धन्यता को प्राप्त हुई। अब कोषागार से प्रभु ने अपनी प्रसन्नता प्रगट करने के लिये बन्दी, मागध, नौकर-चाकर आदि सेवकों को उपहार भेंट किये। सुग्रीव जी, विभीषण जी, जम्बवान् जी और अंगदादि को बहुमूल्य वस्त्राभूषण स्वंय श्रीराघवेन्द्र जी ने अपने कर-कमलों से अर्पित किये। सबके अन्त में उठकर हनुमान्जी ने श्रीयुगल सरकार भगवान् सीताराम जी के पदारविन्दों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया। बड़े ही उल्लास से जगज्जननी जानकी जी ने अपने कण्ठ से वही दिव्य मणिमाला उतारकर श्री हनुमान् जी के गले में पहना दी।

उसकी कान्ति से हनुमान् कादिव्य विग्रह अपूर्व शोभा से उदीप्त हो उठा-

तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामथ्र्यं विनयो नयः।
पौरूषं विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा।।
हनुमांस्तेन हारेण शुशुभे वानरर्षभः।
चन्द्रांशुचयगौरेण श्वेताभे्रण यथाचलः।।
(वाल्मीकि रामायण)

‘‘जिन हनुमान् जी में तेज, धैर्य, सुयश, चातुर्य, सामथ्र्य, विनय, नीति, पुरूषार्थ, पराक्रम तथा विलक्षण बुद्धि- ये सदगुण नित्य ही निवास करते हैं, वे वानर श्रेष्ठ हनुमान् जी उस हार को धारण करने से ऐसे सुशोभित होने लगे, जैसे चन्द्रमा की किरणों के समूह- सदृश श्वेत बादलों की माला से कोई पर्वत शोभा पा रहा हो।’’

इस सन्दर्भ को आध्यात्मिक दृष्टि से आँकें तो भाव यही निकलता है कि सम्मुख में साक्षात् शक्ति के साथ शक्तिमान् परमात्मा विराजमान हैं। इन्हें न चाहकर एक भौतिक पदार्थ माला की चाहना करते हैं। अविनाशी को छोड़कर असार संसार में भटकना चाहते हैं। श्रीलक्ष्मीपति को छोड़कर चंचला लक्ष्मी जी की चाहना करते हैं। “The more you seek things, the more you lose.” (जितना ही चीजों को ढूँढ़ते हैं, उतना ही आप उन्हें खोते हैं।) ये मानसिक दुर्बलतायें नहीं, तो क्या हैं? सर्वान्तर्यामी प्रभु ने सबके हृदय की इस दुर्बलता दूर करने के लिये हनुमान् जी के माध्यम से सबको उपदेश दिया। श्रीहनुमान् जी के कण्ठ में माला पड़ते ही वे चैंक उठे। विचार करने लगे माता जी ने मुझे क्या अद्भुत वस्तु उदे दी? मैं इसका भला क्यो करूँगा। जरा दूर हटकर एक कोने में समीरकुमार जी बैठ गये। उन्होंने गले से मणिमाला उतारकर हाथ में ले ली। अब घुमा-फिराकर, उलट-पलटकर एक-एक मणि को देखने लगे। प्रत्येक मणियों से किरणें प्रस्फुटित हो रही थीं। उसमें हनमानजी कुछ शोध कर रहे थे। समस्त राजसभा में उपस्थित लोगों की दृष्टि हनुमान जी पर लगी हुई थी। हनुमान् जी जिस कुतूहर तथा अन्वेषण की दृष्टि से मणियों को देख रहे थे, उससे स्पष्ट था कि उन्हें मणियों की महत्ता का बिलकुल बोध नहीं था। अनेक लोगों के मुखों पर हास्य की रेखायें थी। इतने में एक मणि तोड़कर अंजनीकुमार ने मुख में डाल ली और अपने वज्र के समान दाँतों से उसे फोड़ दिया। मणिखण्डों को हाथ पर अगलकर वे उसे फिर देखने लगे। चाह की वस्तु नहीं मिली। निराशा हुई। उन टुकड़ों को फेंक दिया। क्रमशः एक के बाद एक फोड़ते गये, फेकते गये, कुछ मिला यनहीं जो वे ढूँढ रहे थे। उस समय युगल सरकार श्रीसीताराम जी महाराज मुस्करा रहे थे। सभासद चकित तथा कुछ लोग तो क्षुभित भी हो रहे थे। अतः एक युवक राजकुमार ने झल्लाते हुए पूछ ही दिया। जैसा कि पुराने कवियों ने लिखा है-

बाोलि उठ्यकोई नृपति सुत कहा करत हनुमान।
क्यों तोरत मणिमाल को सुन्दर रतन सुजान।।
(पं0ज्वालाप्रसाद जी टीका)

श्रीहनुमान्जी! आप ये सब क्या कर रहे हैं? आप इन्हें तोड-फोड़कर बरबाद क्यों रहे हैं? सुरदुर्लभ अतिशय अलभ्य परम मूल्यवान् मणियों को क्यों नष्ट किये जा रहे हैं? तब बड़ी सरलता से हनुमान्जी ने कहा-‘‘इनमें न श्रीसीताराम जी का साकार विग्रह है और न तो नाम ही लिखा हुआ है। जहाँ यह न हो, तो उस पत्थर का क्या मूल्य है। तब उसराजकुमार ने कसते हुए व्यंग किया। आपके शरीर में क्या श्रीराम नाम लिखा है? जिसे आप सुख पूर्वक धारण किये हुए हैं। हनुमान्जी ने विश्वास पूर्वक गम्भीर स्वर में कहा-भाई! देखा तो मैंने भी नहीं है। आप ठीक कहते हैं यह मुझे देख लेना चाहिये जिस वस्तु में श्रीराम नाम न हों, वह देखने, छूने, रखने योग्य वस्तु नहीं हो सकती।

सभा ही की चाह अवगाह हनुमान गरे डारि दई सुधि भई मति अरबरी है।
राम बिन कौन फोरि मनि दीन्हे डारि खोलि त्वचा नाम ही दिखायो बुद्धिहारी है।।

महावीर हनुमान् जीने मणिमाला भूमि पर डाल दी और अपने सुदृढ़ वज्र नखों से पक्षःस्थल को विदीर्ण कर सबको दिखा दिया कि उनके दिव्य हृदय कमल में वे ही सिंहासनासीन श्रीसीताराम जी महाराज विराजमान हैं। उन्होंने त्वचाओं को उधेड़-उधेड़ कर रोम-रोम में श्रीराम नामाकिंत सबको दर्शन कराया।

‘‘खोलि त्वचा नाम ही दिखायो’’
हनुमत् को दिखे न, जब रत्नों में रघुबीर।
सीताराम दिखा दिया, तब निज उर को चीर।।
(भक्तमाल)

राममाथ मुकुटराम रामसिर नयन राम रामकान नासा ठोढ़ी रामनाम है।
रामकण्ठ कन्धराम रामभुजा बाजूबन्द रामहृदय अंलकार हार रामनाम है।।
रामउदर नाभिराम रामकटि कटिसत्र रामबसनजंघराम नाजु पैरराम है।
राममन वचनराम रामगदा कटकराम मारूति के रोम रोम व्यापक रामनाम है।।
श्रीराम जी ने सिंहासन से उठकर हृदय से आलिंगन किया। प्रभु का संस्पर्श होते ही उनका शरीर पूर्व से भी अधिक वज्र के समान सुदृढ़ हो गया।

तब प्रभु ने पूछा-हनुमान्! क्या तुमको हमसे भी अधिक हमारा नाम प्यारा है। इस पर हनुमान्जी ने तुरन्त उत्तर दिया-

राम त्वत्तोऽधिकं नाम इति में निश्चिता मतिः।

त्वया तु तारिताऽयोध्या नाम्ना तु भुवनत्रयम्।।

प्रभो! आपसे आपका नाम तो बहुत श्रेष्ठ है, ऐसा मैं बुद्धि से निश्चय पूर्वक कहता हूँ। आपने तो केवल अयोध्यावासियों को ताला है, परन्तु आपका नाम तो सदा-सर्वदा तीनों भुवनों को तारता ही रहता है।

नाम निष्ठ के रोम-रोम से भगवन्नाम की ध्वनि होने लगती है। नाम रोम-रोम में प्रतिष्ठित हो जाता है, अंग की तो बात ही क्या। हनुमान् जी इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। यथा-

नाम्नः पराशक्तिपतेः प्रभावं प्रजानते मर्कटराजराजः।
यद्रूपरागीश्वर वायु सुनुस्तद्रोमकूपे ध्वनिमुल्लसन्तम्।।

अर्थात् श्रीराम के नाम का प्रभाव वानरराज हनुमान् जी अच्छी प्रकार से जानते हैं अतः रूप् रागियों में प्रधान पवनपुत्र के रोम-रोम में राम नाम की ध्वनि होती रहती है।

इसी प्रकार अर्जुन जी के भी रोम-रोम से ‘‘जय-कृष्ण-कृष्ण’’ की ध्वनि निकलती थी। बहुत दूर की बात तो जाने दीजिए, वर्तमान युग में ही चोखामेला नामक हरिजन की निर्जीव हड्डियों से ‘‘विठ्ठल-विठ्ठल’’ की ध्वनि निकल रही थी। जिसकी ध्वनि परम सन्त शिरोमणि नामदेव जी महाराज ने सुनी थी।

विश्रामसागरकर पूज्य रघुनाथदास रामसनेही जी जो सन्त देवदास जी के शिष्य थे और रामसनेही घाट बाराबंकी (उ0प्र0) के गृहस्थ सन्त थे, उनकी चयन की गई अस्थियों से ‘‘राम-राम-राम’’ की घ्वनि तब तक निकलती रही जब तक वे अस्थियाँ प्रयागराज त्रिवेणी के धरातल जल में विलीन नहीं हो गई।

इस तरह सबने हनुमान्जी के रोम-रोम में बसे राम नाम की महिमा जानी। अतिशय आनन्द हुआ। हनुमान् जी की इस भगवन्नाम निष्ठा को देखकर सबकी बृद्धि चकित हो गई। सबने महावीर हनुमान् जी महाराज की बन्दना की। चारों ओर ‘‘जय सियाराम जय जय हनुमान् संकटमोचन कृपा निधान’’ की ध्वनि गूँजने लगी।

सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।।
प्रनवउँ पवन कुमार, खल बन पावक ग्यान धन।
जासु हृदय आगार, बसहिं राम सर चाप धर।।
सारांस रोम-रोम में रामनाम वस जाये हो गया उद्धार।

जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक-अनिल यदव।

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