लोग कहते हैं भगवान् का नाम लेने से पाप कटते हैं; परन्तु इसमें युक्ति क्या है? महामना पं. मदनमोहन जी मालवीय ने एक बार अपने व्याख्यान में कहा था कि हम जिस समय किसी वस्तु का नाम लेते हैं, तो तत्काल हमे उसकी आकृति और गुण आदि का भी स्मरण हो जाता है जब हम कसाई शब्द का उच्चारण करते हैं, तो हमारे मानसिक नेत्रों के सामने एक ऐसे व्यक्ति का चित्र अंकित हो जाता है जिसकी लाल-लाल आँखें हैं, काला शरीर है, हाथ में छुरा है और बड़ा क्रूर स्वभाव है | वेश्या कहते ही हमारे हृदय पटल पर वेश्या की मूर्ति अंकित हो जाती है। इसी प्रकार जब हम भगवान् का नाम लेते है, तो सहसा हमारे चित्त में भगवान् के दिव्य रूप और गुणों की स्मृति जाग्रत हो जाती है। भगवन्नाम जप से चित्त अनायास ही भगवदाकार हो जाता है। भगवदाकार चित्त में भला पाप ताप के लिए स्थान कहाँ है ? इसीलिए नाम स्मरण, जपादि पाप नाश की अमोघ औषधि है।

दूसरी बात यह है कि शब्द (ध्वनि) अथवा नाम में उसकी अपनी एक अन्तर्निहित शक्ति होती है। कुछ लोग कहते हैं जैसे- ‘दवा’ का नाम लेने’ मात्र से रोग दूर नहीं होता, रसगुल्ला’ कहने से ही मुँह मीठा नहीं होता। बन्दूक का उच्चारण करने से ही शरीर में गोली नहीं लग जाती। उसी प्रकार भगवान् का नाम लेने मात्र से पापक्षय नहीं हो सकता। फिर नाम जप क्यों किया जाये? इसके उत्तर में कई बातें कही जा सकती हैं। पहली बात यह है कि दवा, रसगुल्ला, बन्दूक, आदि जड़ वस्तु का नाम है, अतः नाम लेने से उसकी उपस्थिति देखी जाती है। जैसे लोक में देवदत्त शर्मा कहकर पुकारने से देवदत्त शर्मा नाम वाला व्यक्ति उपस्थित होता है और आवश्यक कार्य पूर्ण करता है। उसी प्रकार भगवान् का नाम लेने से या जप करने से भगवान् की उपस्थिति हो जाने के कारण पापक्षय हो जाता है, कार्यों की सिद्धि हो जाती है। इसके अतिरिक्त देवदत्त शर्मा तो अन्यत्र एक स्थान में रहता है। अतः पुकारने से आता है, परन्तु भगवान् तो सर्वत्र हैं और सर्वदा उपस्थित रहते हैं नाम लेने से उनकी कृपा-दृष्टि मात्र होती है। तो प्रश्न उठता है कि क्या भगवान् अपने नाम का प्रशंसक है ? नहीं, क्योंकि जैसे कल्पवृक्ष सब पर समान रूप से छाया करता है, समान रूप से सबकी कामनाएँ पूर्ण करता है, जो उसके पास जाता है, वही उससे लाभ उठाता है। उसी प्रकार भगवान् की तो सब पर समान रूप से कृपा है; किन्तु जो नाम जप कीर्तनादि के द्वारा भगवान् का सहारा लेता है, वही उनकी कृपा का अनुभव करता है। यदि सामने मूसलाधार वर्षा हो रही हो और कोई सन्तप्त पुरुष मोहवश उसमें स्नान न करे तो वर्षा का क्या दोष है ?

तीसरी बात यह है कि रोग दूर करने में दवा ही कारण है, दवा का नाम नहीं, परन्तु पाप क्षय में भगवान् का नाम ही मुख्य कारण है। यदि कहें कि नाम तो केवल शब्द (ध्वनि) मात्र है, उससे क्या कार्य सिद्ध होगा, तो ठीक नहीं; क्योंकि गाली और निन्दा शब्दों द्वारा होती है, जिससे प्राणों के लेने-देने की कडवाहट आ जाती है और स्तुति, प्रशंसा भी शब्दों द्वारा की जाती है, जिसे सुनकर कितने ही अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं। जैसे आप किसी को अपने मन का प्रेम प्रकट करने वाले मधुर शब्दों में पुकारते हो और उसे ‘भैया’ कहते हैं, तो वह कैसा प्रफुल्लित हो जाता है। तब आप उससे कोई भी सेवा करवा सकते हैं, परन्तु यदि उसी आदमी को कटु शब्द में पुकारा जाये और उसे ‘मूर्ख’ कहा जाये, तो वह उससे असन्तोष प्रकट करेगा और आप जो भी उससे काम कराना चाहेंगे, उसे करने से मना कर देगा। जब किसी को ‘भैया’ कहकर पुकारा जाता है, तो वह वस्तुतः भैया ही नहीं हो जाता; इसी प्रकार जब उसे मूर्ख कहा जाता है, तो वह मूर्ख भी नहीं हो जाता; परन्तु कठोर एवं कटुतापूर्ण शब्द चाहे कितने ही निरर्थक हों अपमान प्रकट करते हैं। इसीलिए वे क्रोध की भावना उत्पन्न करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि शब्द अथवा नाम में एक आन्तरिक शक्ति निहित होती है।

सबसे मीठा बोलिये सुख उपजै चहुँ ओर ।

वसीकरन यह मन्त्र है तज दे वचन कठोर ।।

“A man who has control over his word can easily save his soul.” (Bible) अर्थात् जो मनुष्य अपनी वाणी का संयम रखता है, वह अपनी आत्मा को ऊँचा उठा सकता है।

काव्य रचना भी शब्दों द्वारा होती है, जिससे नौ प्रकार के रसों का आस्वादन होता है। विद्वानों ने शब्दों में अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शक्ति ढूँढ़ निकाली है। इन शक्तियों से एक ही शब्द के अनेक चमत्कारजनक अर्थ प्रकट होते हैं। तान्त्रिक दृष्टि के अनुसार प्रत्येक शब्द और वर्ण चैतन्य शक्ति स्वरूप ही हैं। परमात्मा का सृष्टिविषयक संकल्प “एकोऽहं बहुस्याम्” । इस वेदवाणी द्वारा ही व्यक्त हुआ। अतः अनेक विद्वान् शब्दब्रह्म से ही जगत् की सृष्टि मानते हैं। ऋषियों के शाप और वरदान वाणी द्वारा ही प्रकट होकर तत्काल कार्य सार्थक होते देखे गये हैं,

अतः शब्द से क्या नहीं हो सकता ?

सभी पाठक बंधुओ को जय जय सियाराम|

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