ऋक्षरजा के दो पुत्र थे-बाली और सुग्रीव। पिता अपने दोनों पुत्रों को समान रूप से प्यार करते थें। दोनों बालक अत्यन्त धीर, बीर, बलवान्, बृद्धिमान् एवं सुन्दर तो थे ही, दोनों में परस्पर अतिशय प्रीति थी। बाली सुग्रीव को प्राणतुल्य चाहते और सुग्रीव बाली के चरणों में पिता की भाँति श्रद्धा रखते। दोनों भाई भोजन, शयन, क्रीड़ा, आखेट आदि साथ ही करते-प्रायः सदा साथ रहते।
पिता के दिवंगत होने पर मन्त्रियों ने ज्येष्ठ होने के कारण बाली को वानर-समुदाय के राज्य-पद पर अभिषिक्त किया। वे समस्त वानर-जातिके प्राणाधिक प्रिय थे और अपनी प्रजा को भी पुत्रवत् प्यार करते। इस प्रकार बाली किष्किन्धा के विशाल राज्य का शासन करते और सुग्रीव श्रद्धा-भक्ति के कारण अत्यन्त विनीत भाव से दास की भाँति अपने अग्रज की सेवा में प्रस्तुत रहते।
उधर कपिराज केसरी अपनी सहधर्मिणी के साथ अपने प्राणप्रिय पुत्र हनुमान की विरक्ति एवं एकान्तप्रियता से अत्यधिक चिन्तित थे। वे कपियों के यूथपति थे और ऋक्षरजा के शासन में रहते थे। इस कारण उन्होंने हनुमानजी को राजनीति का ज्ञान प्राप्त करने के लिये पम्मपापुर भेजने का निश्चय किया। मातृ-पितृ-भक्त हनुमानजी ने माता-पिता का आदेश प्राप्त होते ही उनके चरणों में प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद लेकर वे पम्पापुर के लिये चल पडे़।

पवनकुमार के पम्पापुर में आगमन का समाचार प्राप्त होते ही सुग्रीव ने आगे जाकर उनका स्वागत किया। उनके देव-दुर्लभ गुणों से परिचित होने के कारण बाली ने भी उनका अत्यधिक सम्मान किया और उन्हें बड़े ही आदर से अपने पास रखा। हनुमान जी विद्धान, बुद्धिमान, बलवान्, धैर्यवान्, सदाचारणपरायण एवं सरलता की सजीव मूर्ति थे, इस कारण बाली इन्हें अपना अन्तरंग बनाना चाहते थे। किंतु विद्या-वारिधि केशरीकुमार को अपनी गुरू-दक्षिणा की स्मृति सदा बनी रहती। एतएव वे सुग्रीव के अभिन्न मित्र बन गये। सुग्रीव के हृदय में भी उनके लिये अतिशय प्रीति थी।

जिस समय वज्रांग हनुमान पम्पापुर पहुँचे, उस समय उस क्षेत्र के चारों ओर राक्षसों के राज्य थे। एक ओर शक्तिशाली खर-दूषणादि, दूसरी ओर विराध और तीसरी ओर देव-द्विजदोही वीरवर दशानन का निष्कण्टक राज्य था। वानरराज बाली अन्यत वीर एवं योद्धा थे; इस कारण असुर उनसे भयभीत रहा करते। सव उनके राज्यकी सीमा में उपद्रव करने का साहस नहीं कर पाते; किंतु राक्षसों की दृष्टता से अवगत होने के कारण बाली निश्चन्त होकर दुष्ट-दलन के लिये कहीं दूर जा भी नहीं सकते थे। परंतु केसरी-किशोर के पम्पापुर में प्रवेश करते ही उनकी यह चिन्ता प्रायः दूर हो गयी। माता अन्जना ने अपने आलौकिक पुत्र को राक्षसों की अनेक कथाएँ सुनायी थीं, इस कारण हनुमानजी के मन में बाल्यकालसे ही राक्षसों के प्रति रोष उत्पन्न हो गया था। अतः उनकी दृष्टि में पड़ जाने पर किसी राक्षस का सरुक्षित बच निकलना सम्म्भव नहीं था। वे असुरों को खोज-खोजकर उनका प्राण-हरण करते और असुर उनके नामसे ही काँपते थे। बाली हनुमानजी की सरलता और साधुता के साथ उनकी अनुपम वीरता, धीरता और पराक्रम को देखकर चकित होते रहते।

वीरवर बाली और सग्रीव की आदर्श प्रीति-कथा सर्वत्र प्रख्यात थी। वे दोनों प्रत्येक रीति से सुुखी थे; किंतु क्रूर नियति की निर्दयता की सीमा नहीं। उसने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे दोनों अपने सहज प्रेम को भूलकर एक-दूसरे के रक्त-पिपासु बन गये।
उस समय मय का पुत्र मायावी नाम दानव अपनी शक्ति एवं वीरता के गर्व से उन्मत्त होकर प्रतिभट ढूँढ़ता फिरता था। एक दिन की बात है कि अर्धरात्रि के समय वह बलवान् असुर किष्किन्धा के द्वार पर जाकर बाली को ललकारते हुए भयानक गर्जन करने लगा।

अप्रतिम वीर बाली शत्रु का आह्नान सुनते ही उसका मुख-मर्दन करने के लिये सदैव प्रस्तुत रहते थे। वे प्रगाढ़ निद्रा में थे, किंतु असुर की ललकार सुनते ही शय्या से उठकर तुरंत दौड़ पड़े। अग्रज को शत्रु के सम्मुख जाते देखकर सग्रीव भी उनके पीछे दौडे़। असुर ने जब बाली को और उनके पीछे सुग्रीव को भी आते देखा तो वह भयभीत होकर तीव्र गति से भागा। दोनों भाइयों ने भी उसी गति से उसका पीछा किया।

अत्यधिक दूर जाने पर उसे घास-फूस से ढका हुआ एक विशाल विवर (गुफा) मिला। असुर उसी विवर में प्रविष्ट हो गया। क्रोधोन्मत्त बाली सुग्रीव को वही द्वार पर सावधानी के साथ खड़ा रहने का आदेश देकर स्वय विवर में घुस गये।
बाली ने अपने भाई सुग्रीव को पंद्रह दिनों तक विवर द्वार पर सावधानीपूर्वक प्रतीक्षा करने का आदेश दिया था, किंतु सग्रीव एक माह तक वहाँ सजग होकर डटे रहे। वे विवर के द्वार पर कान लगाकर कुछ सुनने का प्रयत्न करते, पर बाली के स्थान पर राक्षसों की कोलाहल सुनायी पड़ जातर थी। सुग्रीव अपने अग्रज के लिये मन-ही-मन चिन्तित थे कि उसके सम्मुख विवर से फैनसहित रक्त की घारा निकली। भ्रातृ-स्नेह के कारण सुग्रीव व्याकुल हो गये। उनके मनमे बाली के लिये शंका होने लगी।
बहुत ध्यान देने पर भी जब उन्हें बाली का कोई शब्द सुनायी नहीं पड़ा, तब उन्होंने सोचा-‘इस विशाल विवर में असुरों ने मिलकर मेरे प्राणाधिक प्रिय अग्रज को मार डाला है और अब वे बाहर आकर मुझे भी जीवित नहीं छोड़ेंगे।’
अत्यन्त दुःखी सुग्रीव ने अपनी रक्षा के लिये पर्वत-तुल्य एक विशाल चट्टान से विवर का मुख बंद कर दिया और उदास-मन से बाली को जलाज्जलि देकर वे किष्किन्धा लौट आये।

सुग्रीव अपने अग्रज की मृत्यु का संवाद अप्रकट रखना चाहते थे, किंतु चतुर मन्त्रियों ने युवराज अंगद को छोटा देखकर सुग्रीव को राज्य पर अभिषिक्त कर दिया वे नीतिपूर्वक राज्य के दायित्व का निर्वाह करने लगे।

उधर वीरवर बाली असुर के समस्त साथियों का वध कर राजधानी लौटे। जब उन्होंने अनुज सुग्रीव को अपने स्थान पर राज्य-पद का उपभोग करते देखा, जब उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने सोचा-‘इसी स्वार्थी भाई ने मेरी स्त्री और राज्य का सुख प्राप्त करने के लिये विवर-द्वार पर विशाल चट्टान रख दी थी, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ और वहीं मेरा अन्त हो जाय।’
यह विचार मनमें आते ही प्रज्वलित अग्नि में घृताहुति पड़ गयी। बाली क्रोधोन्मत्त हो गये।

सुग्रीव ने क्रोधारूण-लोचन अपने बडे़ भाई को देखते ही उनका राज्य वापस कर दिया और वे उन्हें वस्तु-स्थिति समझाने का प्रयत्न करने लगे; किंतु अतिशय क्रुद्ध बाली सुग्रीव के कट्टर शत्रु हो गये थे। उन्होंने राज्य सहित सुग्रीव-पत्नी रूमा को अपने अधिकार में कर लिया। वे सुग्रीव का वध भी कर डालना चाहते थे। सुग्रीव प्राण-रक्षा के लिये मन्त्रियों सहित भाग खड़े हुए।
भयभीत सुग्रीव भागे जा रह थे और बाली उन्हें मार डालने के लिये उनके पीछे लगे थे। नद-नदियों, वनों, पर्वतों, समुद्रों एवं नगरों को छोड़ते सुग्रीव दौड़ते जा रहे थे। कहीं कुछ दिन भी रूकने का साहस उनमें न रह गया था- बाली जो प्राणघातक शत्रु की तरह पीछे लगे थे।

भागते-दौड़ते सुग्रीव हिमालय, मेरू और उत्तर समुद्र तक जाकर भी बाली से अपना पीछा न छुड़ा सके; उन्हें कहीं शरण नहीं मिली। तब उनके साथ निरन्तर छाया की भाँति रहने वाले ज्ञानिनामग्रगण्य हनुमानजी को दुन्दुभि-वध की घटना स्मरण हो आयी।
उन्होंने भयभीत सुग्रीव से कहा-‘राजन्! मुझे महामुनि मतंग द्वारा वीरवर बाली को दिये शाप की स्मृति हो आयी है। कुपित होकर महामुनि ने शाप दिया था-‘यदि बाली इस आश्रम मण्डल में प्रवेश करेगा तो उसके मस्तक के सैकड़ों टुकडे़ हो जायँगे। अतः वहीं निवास करना हमलोगों के लिये सुखद और निर्भय होगा।’

सुग्रीव तुरंत अपने प्राणप्रिय सचिव हनुमान जी के परामर्श के अनुसार ऋष्यमूकपर्वत पर मतंगश्रम में चले गये। मतंग-मुनि के शाप-भय से बाली वहाँ नहीं जा सकते थे; विवश होकर वे लौट गये।

राजनीति ‘विशारद कपिराज बाली पववनकुमार को अत्यन्त सम्मानपूर्वक अपने साथ रखना चाहते थे; किंतु आन्जनेय सुग्रीव के सच्चे शुभचिन्तक थे। सुख के दिनों में तो सभी घेरे रहते हैं-उस समय क्षुद्र चाटुकारों का अभाव नहीं रहता, किंतु आपत्ति-काल में वे साथ छोड़कर चले जाते हैं। सच्चे सुहृदय और सच्चे सेवक ही विपत्ति में भी अपनी प्रीति एवं भक्ति से विचलित नहीं होते।
अन्जनानन्दन सुख के दिनों में सुग्रीव के साथ रह चुके थे, वे भला विपत्ति में उन्हें कैसे छोड़ देते? वे सदा सुग्रीव के साथ रहते, उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखते और उसकी व्यवस्थ करते, उन्हें सत्परामर्श देते और धैर्य बँधाते रहते। महावीर हनुमानजी के साथ एवं उनके सुनिश्चित आश्वासन पर सुदृढ़ विश्वास के कारण सुग्रीव आपदा में भी सुखानुभूति करते रहते थे। पवन कुमार उन्हें अपने मन्त्री ही नहीं, अन्तम मित्र, सखा, सहोदर भ्रातातुल्य प्रतीत होते थे।

बाली के द्वारा सर्वस्व छीन लिये जाने पर भी वहिष्कृत सुग्रीव अपने अनुपम सचिव हनुमानजी के कारण ऋष्यमूकपर्वतपर राजाकी भाँति सुखपूर्वक रहते थे।

ऋष्यमूकपर्वत पर शाप के कारण स्वयं बाली तो आ नहीं सकता था, किंतु अपने दूसरे वीरों को भेजकर वह सुग्रीव को मरवा डालने का प्रयत्न कर सकता था, इसे सुग्रीव भलीभाँति जानते थे; किंतु हनुमानजी की शक्ति, पराक्रम एवं विलक्षण बुद्धि पर सुदृढ़ विश्वास के कारण वे कुछ निश्चिन्त रहते। महावीर हनुमान सुग्रीव की सेवा एवं उनकी आज्ञा के पालन में सदा तत्पर रहते। सर्वगुणसम्पन्न पवनकुमार को अपने सखा एवं सचिव के रूप में सुग्रीव सदा ही अपने भाग्य की सराहना किया करते।

सारांस श्री हनुमानजी महाराज की कृपा जिस पर हुई उसका कोई बाल-बाँका नहीं कर पाया। इसलिये हम सभी को श्री हनुमानजी की अनन्य भक्ती करनी चाहिये। अपने को श्री हनुमानजी के चरणों में समर्पित कर देना चाहिये। बाली से सुग्रीव को कैसे बचा दिया जबकि सुग्रीव के पास कोई जगह नहीं बची थी अपने प्राण बचाने की। इतनी विषम परिस्थिति में श्रीहनुमानजी सुग्रीव के साथ छाया की तरह रहे हमेशा।

समस्त पाठकबन्धुओं को मेरा-जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक-अनिल यादव।

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