hanuman ji aur sursa

श्रीहनुमान जी महाराज एवं वानर भालुओं को गृध्रराज सम्पाति के द्वारा श्री जनकदुलारी जानकी माता का पता लग जाने पर वानर-भालुओं का विशाल समुदाय हर्षातिरेक से उछलने-कूदने लगा; किंतु जब वे लोग महान् जलधि के तट पर पहुँचे, तब उस (समुद्र) का रोमांचकारी स्वरूप देखकर सहम उठे। ‘भयानक गर्जन करते हुए उत्तुंग लहरों वाले असीम सागर के पार कैसे जाया जाय?’ समस्त वानर-भालुओं को चिन्तित, उदास और विषाद में पड़ा देख युवराज अंगद ने उन्हें अनेक युक्तियों से समझाकर आश्वस्त किया। सच तो यह है, महासागर-तुल्य वीर वानर-भालुओं की महान् सेना को अंगद और श्री हनुमान ही सुस्थिर रख सकने में समर्थ थे।

वालिकुमार अंगद ने समस्त वीर वानर-भालुओं से कहा-‘बन्धुओ! आप सब अन्यतम वीर हैं और आप लोगों में से कभी किसी की गति कहीं नहीं रूकती। आपमें ऐसे कौन-कौन महान् वीर हैं जो जगन्माता जानकी का पता लागने के लिये इस अपार समुद्र को लाँघकर लंका पहुँच जायँगे?’

अंगद का बचन सुन पहले तो समस्त वानर-भालू चुप हो गये, किंतु कुछ देर बाद गज नामक वानर ने कहा-‘मैं दस योजन की छलाँग मार सकता हूँ।’ इसी प्रकार गवापक्ष ने बीस, शरभ ने तीस, ऋषभ ने चालीस, गन्धमादन ने पचास, मैन्द ने साठ, द्विविद ने सत्तर और सुषेण ने अस्सी योजन तक छलाँग मारने की बात कही। वयोवृद्ध ऋक्षराज जाम्बवान् ने कहा-‘पहले यौवनकाल में मैं भी बहुत लंबी छलाँग मार सकता था, किंतु अब वह शक्ति मुझमें नहीं रही; तथापि वानराज सुग्रीव और कौसल्याकिशोर के कार्य की उपेक्षा सम्भव नहीं। इस वृद्धावस्था मैं केवल नब्बे योजन दूर तक छलाँग मार सकता हूँ। पूर्वकाल में जब भगवान् त्रिविक्रम ने अवतार लिया था, तब मैंने उनके प्रभु के प्थ्वी के बराबर परिणाम वाले चरण की इक्कीस बार परिक्रमा कर ली थी; परंतु अब इस महान् समुद्र को लाँघ जाना मेरे वश की बात नहीं।’

अंगद बोले-‘मैं समुद्र तो पार कर सकता हूँ, किंतु लौट पाऊँगा कि नहीं, यह कहना सम्भव नहीं।’

अंगद के बचन सुनकर वाक्यकोविद वृद्ध जाम्बव्ान ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा-‘अंदग! यद्यपि तुम इस कार्य के करने में पूर्ण समर्थ हो, किंतु तुम हम सबने नायक हो; अतः तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है। तुम तो प्रत्येक रीति से रक्षणीय हो।’
अंगद ने उदास होकर कहा-‘तब तो समुद्रोल्लघन सम्भव नहीं प्रतीत होता। फिर हम लोग प्रायोपवेशन का संकल्प करके बैठ जायँ।’

‘नहीं बेटा! भगवान् श्रीरामजी का कार्य अवश्य होगा।’ अंगद को आश्वस्त करते हुए जाम्बवान्जी ने श्री अंजनानन्दन की ओर देखा। वे सर्वथा मौन बैठे थे। ऋक्षराज को विदित था कि ये वज्रांग श्रीहनुमान शाप के कारण भस्माच्छादित अग्रितुल्य शान्त हैं। इन्हें अपनी अपरिमेय शक्ति की स्मृति नहीं है, अन्यथा ये अपने स्वामी सुग्रीव को संकटग्रस्त देखकर भी चुप कैसे रहते; ये निश्चय ही वाली को दण्डित करते। जाम्बावान् ने श्रीहनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण दिलाते हुए कहा-‘भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त वज्रांग हनुमान! श्रीराम के कार्य के लिये ही तुमने अवतार धारण किया है, फिर चुप क्यों बैठे हो? महावीर! तुम पवन के पुत्र हो। तुमने माता अन्जना का दुग्ध पान किया है। बाल्यकाल में ही तुम सूर्यदेव को अरूण फल समझकर उन्हें भक्षण करने के लिए एक ही छलाँग में उनके पास पहुँच गये थे। ब्रह्मादि देवताओं ने तुम्हें अलौकिक वरदान प्रदान किये हैं। महावीर केसरीकिशोर! तुम अपरिमित शक्ति-सम्पन्न हो। तुम्हारी गति अव्याहत है। यह विशाल जलधि तो तुम्हारे लिये नगण्य है। उठो और समुद्र को लाँघकर लंका पहुँच जाओ। वहाँ माता सीता के दर्शन कर तुरंत लौट आओ। हम वानर-भालुओं के जीवन की रक्षा कर लो। विवेक और ज्ञान के निधान वायुपुत्र! देखो, ये चिन्तित और उदास असंख्य वानर-भालू तुम्हारी ओर देख रहे हैं।’
जाम्बवान्जी के वचन सुनते ही भगवान् की स्मृति में तल्लीन हनुमानजी को अपने बल और पराक्रम का स्मरण हो आया। तत्क्षण उनका शरीर पर्वताकार हो गया। उन्होंने अपने में अपार शक्ति का अनुभव कर भयानक गर्जना की। उस गर्जना से धरती, आकाश तथा समस्त दिशाएँ काँप उठीं।

कनकभूधराकार पवनकुमार ने गरजते हुए कहा-‘वानरो! मैं भगवान की कृपा से आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदि को लाँघकर आगे बढ़ जाने के लिये तैयार हूँ। मैं चाहूँ तो समुद्रों को सोख लूँ, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँ और कूद-कूदकर पर्वतों को विचूर्ण कर डालूँ। यह तुच्छ समुद्र मेरे लिये कुछ नहीं है। बताओ, मुझे क्या करना है? कहो तो मैं लंका में जाकर उसे उठाकर समुद्र में डुबो दूँ और माता सीता को यहाँ ले आऊँ या कहो तो रावणसहित समूची लंका को जलाकर राख कर दूँ अथवा कहो तो राक्षसराज रावण के कण्ठ में रस्सी बाँधकर उसे घसीटते हुए यहाँ लाकर भगवान् श्रीरामके चरणों में पटक दूँ या केवल जगन्माता जानकी को देखकर ही लौट आऊ?

परम शक्तिशाली पवनकुमार के वचन सुन जाम्बवान् ने प्रसन्न होकर कहा-‘तात! तुम सर्वसमर्थ हो, किंतु तुम भगवान् के दूत हो। तुम केवल सीता-माता का दर्शन कर उनका समाचार लेकर चले आओ। इसके अनन्तर भगवान् श्रीराम वहाँ जाकर असुर-कुल का उद्धार करेंगे। उनकी पवित्र कीर्ति का विस्तार होगा और हम सभी प्रभु-कार्य में सहायक होकर कृतार्थ होंगे। हम समस्त वानर-भालुओं के प्राण तुम्हारे अधीन हैं। हम सब आतुरतापूर्वक तुम्हारी प्रतीक्षा करते रहेंगे। तुम शीध्र जाओ। आकाशमार्ग से जाते हुए तुम्हारा कल्याण हो!’

वृद्ध वानर-भालुओं के आशीर्वाद से प्रसन्न होकर महा-पराक्रमी, शत्रुमर्दन श्रीरामदूत हनुमान उछलकर महेन्द्र पर्वत के शिखर पर चढ़ गये। उनके चरणों के आधात से पर्वत नीचे धँसने लगा और वृक्षोसहित पर्वत-श्रृंग टूट-टूटकर गिरने लगे। उस समय समस्त प्राणियों को वायुपुत्र महात्मा हनुमानजी महान् पर्वत के समान विशालकाय, सुवर्ण-वर्ण अरूण (बाल-सूर्य)-के समान मनोहर मुखवाले और महान् सर्पराज के समान दीर्घ भुजाओं वाले दिखायी देने लगे।

समुद्र पार करने के लिये प्रस्तुत आन्जनेय ने पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता वायुदेव को प्रणाम किया; फिर उन्होंने भगवान् श्रीराम का स्मरण कर वानर-भालुओं से कहा-‘वानरगण! मैं परमप्रभु श्रीराम की कृपा से उनके अमोघ वाणकी गति से लंका जाकर जगज्जननी के दर्शन कर पुनः लौट आऊँगा। प्राणान्तकाल में प्रभु के नाम का स्मरण कर मनुष्य संसार-सागर से पार हो जाता है, फिर मैं तो उनका दूत हूँ। उनकी अँगुली की दिव्य अँगूठी मेरे पास है और मेरे हृदय में उनकी मूर्ति तथा वाणी में उनका नाम विराजित है; फिर मैं इस तुच्छ समुद्र को लाँघकर कृतकार्य होऊँ, इसमें कौन बड़ी बात है? आप लोग मेरे लौटने तक कंद-मूल का आहार करके यहीं मेरी प्रतीक्षा करें।’

उस समय श्रीवायुनन्दन में तेज, बल और पराक्रम का अद्भुद आवेश था। देवगण जय-जयकार और ऋषि शान्तिपाठ करने लगे। श्रीआन्जनेय ने दक्षिण की ओर अपनी दोनों भुजाएँ फेलायीं और बडे़ वेग से आकाश में ऊपर की ओर उछलकर गरूड की भाँति तीव्रता से उड़े। उनके वेगसे आकृष्ट होकर कितने ही वृक्ष उखड़कर अपनी डालियों-समेत उड़ चले। पुष्पित वृ़क्षों के पुष्प उनके ऊपर गिरे, जैसे वे वायुपुत्र की पूजा कर रहे हों।

पवनपुत्र श्रीहनुमान को पवन की गति से श्रीराम-कार्य के लिये जाते देखकर सागर ने सोचा-‘इक्ष्वाकुवंशीय महाराज सागर के पुत्रों ने मुझे बढ़ाया था और ये अभय वज्रांग हनुमान इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न श्रीराम के कार्य से लंका जा रहे है; अतः इन्हें मार्ग में विश्राम देने का प्रयत्न करना चाहिये।’

समुद्र ने मैनाक पर्वत से कहा-‘शैलप्रवर! देखो, ये कपिकेसरी हनुमान इच्वाकुवंशीय श्रीराम की सहायता के लिये तीव्र वेगसे लंका जा रहे हैं। इस पावन वंश के लोग मेरे पूजनीय हैं और तुम्हारे लिये तो परम पूज्यनीय हैं अतएव तुम श्रीहनुमान की सहायता करो। तुम तुरंत जलसे ऊपर उठ जाओ, जिससे ये कुछ देर तुम्हारे शिखर पर विश्राम कर सकें।’

मैनाक अपने अनेक सुवर्ण एवं मणिमय शिखरों सहित समुद्र से अत्यधिक ऊपर उठ गया और एक श्रृंगपर मनुष्य के वेष में खड़े होकर उसने हनुमानजी से प्रार्थना की-‘कपिश्रेष्ठ! आप वायु के पुत्र हैं और उन्हीं की भाँति अपरिमित शक्तिसम्पन्न हैं। आप धर्म के ज्ञाता हैं। आपकी पूजा होने पर साक्षात् वायुदेव का पूजन हो जायगा। इसलिये आप अवश्य ही मेरे पूज्यनीय हैं। पहले पर्वतों के पंख होते थे। वे आकाश में इधर-उधर वेगपूर्वक उड़ा करते थे। इस प्रकार उनके उड़ते रहने से देवताओं, ऋषियों एवं समस्त प्राणियों के मन में भय व्याप्त हो गया। इस कारण कुपित होकर सहस्त्राक्ष ने लाखों पर्वतों के पंख काट डाले। वज्र लिये क्रुद्ध सुरेन्द्र मेरी ओर भी चले, किन्तु आपके पिता महात्मा वायुदेव ने मुझे इस समुद्र में गिराकर मेरी रक्षा कर ली।’

मैनाक ने अत्यन्त आदर एवं प्रीतिपूर्वक हनुमानजी से आगे निवेदन किया-‘वायुनन्दन! आपके साथ मेरा यह पवित्र सम्बन्ध है और आप मेरे माननीय हैं। दूसरे, समुद्रने भी आपको विश्राम देने के लिये मुझे आज्ञा प्रदान की है। आप मेरे यहाँ विविध प्रकार के मधुर फल ग्रहण करें; कुछ देर विश्राम कर लें। तदनन्तर अपने कार्य के लिये चले जायँ।’

मैनाक के बचन सुनकर श्रीआन्जनेय ने अत्यन्त प्रेमपूर्वक उत्तर दिया-‘मैनाक! आपसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरा आतिथ्य हो गया। मुझे अपने प्रभु के कार्य की शीघ्रता है, अतएव मेरे लिये विश्राम करना सम्भव नहीं।’

श्री केसरीकिशोर ने हँसते हुए मैनाक का स्पर्श किया और तीव्रता से आगे बढ़ गये। उस समय शैलप्रवर मैनाक और तीव्रता से आगे बढ़ गये। उस समय शैलप्रवर मैनाक और जलधि-दोनों ने उनकी ओर से अत्यन्त आदर और प्रीतिपूर्ति देखकर उन्हें बार-बार आशीर्वाद प्रदान किया।

श्रीकेसरीकिशोर को श्रीरामचन्द्रजी के कार्य के लिये वेगपूर्वक लंका की ओर उड़कर जाते देख देवताओं ने उनके बल और बुद्धि का पता लागाने के लिये नागमाता सुरसा को भोजा। देवताओं के आदेशानुसार सुरसा ने अत्यन्त विकट, बेडौल और भयायनक रूप धारण किया। उसके नेत्र पीले और दाढ़ें विकाराल थी। वह आकाश को स्पर्श करने वाला विकटतम मुँह बनाकर श्रीहनुमानजी के मार्ग में खड़ी हो गयी।

श्रीहनुमान को अपनी ओर आते देख नागमाता ने कहा-‘महामते! मैं तीव्र क्षुधा से व्याकुल हूँ। देवताओं ने तुम्हें मेरे आहार के रूप में भेजा है। तुम मेरे मुख में आ जाओ मैं अपनी क्षुधा शान्त कर लूँ।’

श्री अंजनानन्दन ने उत्तर दिया-‘माता सुरसा! मेरा प्रणाम स्वीकार करो। में आर्तत्राण-परायण श्रीरधुनाथजी के कार्य से लंका जा रहा हूँ। इस समय माता सीता का पता लगाने के लिये तुम मुझे जाने दो। वहाँ से शीघ्र ही लौटकर तथा श्रीरघुनाथजी को माता सीता का कुशल-समाचार सुनाकर मैं तुम्हारे मुखमें प्रविष्ट हो जाऊँगा।’

किंतु श्रीराम दूत के बल-बुद्धि की परीक्षा के लिये आयी सुरसा उन्हें किसी प्रकार आगे नहीं जाने देती थी; तब श्रीहुनमानजी ने उससे कहा-‘अच्छा, तू मुझे भक्षण कर।’

सुरसा ने अपना मुँह एक योजन विस्तृत फैलाया ही था कि श्रीवायुनन्दन ने तुरंत अपना शरीर आठ योजन का बना लिया। उसने अपना मुँह सोलह योजन विस्तृत किया, तब श्री पावनकुमार तुरंत बत्तीस योजन के हो गये। सुरसा जितना ही अपना विकराल मुँह फैलाती, बृहत्काय श्रीहनुमान उसके दुगुने आकार के विशाल हो जाते थे। जब उसने अपना मुँह सौ योजन का बनाया तब श्रीवायुपुत्र अँगूठे के समान अत्यन्त छोटा रूप धारण कर उसके मुख में प्रविष्ट हो गये।

सुरसा अपना मुँह बंद करने ही जा रही थी कि महामति श्रीआन्जनेय उसके मुख से बाहर निकल आये और विनयपूर्वक कहने लगे-‘माता! में तुम्हारे मुँह में जाकर निकल आया। तुम्हारी बात पूरी हो गयी। अब मुझे अपने प्रभु के आवश्यक कार्य के लिये जाने दो।’

सुरसा तो श्रीरामदूतकी केवल परीक्षा करना चाहती थी। उसने कहा-‘वायुनन्दन! निश्चय ही तुम ज्ञाननिधि हो। देवताओं ने तुम्हारी परीक्षा के लिये मुझे भेजा था। मैं तुम्हारे बल और बुद्धि का रहस्य समझ गयी; अब तुम जाकर श्रीराघवेन्द्र का कार्य करो। सफलता तुम्हें निश्चय वरण करेगी। मैं हृदय से तुम्हें आशिष देती हूँ।’

सुरसा देवलोक के लिये प्रस्थित हुई और उग्रवेग श्रीमारूतात्मज गरूड की भाँति आगे चले। मैनाकवन्दित वानर-शिरोमणि श्रीरामदूत पवन के वेग से उड़ते हुए जा ही रहे थे, मार्ग में सिंहिका राक्षसी समुद्र में मिली। वह आकाश से उड़कर जाने वाले प्राणियों को उनके प्रतिबिम्ब के द्वारा खींचकर मार डालती थी। उस छायाग्रहिणी सिंहिका आसुरी ने समुद्र से श्रीपवनपुत्र की भी छाया पकड़ ली। हनुमानजी की गति अवरूद्ध हो गयी। आश्चर्य में पड़े श्रीरामदूत ने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी पर उन्हें कहीं कोई दीख न पड़ा जब उन्होंने नीचे दृष्टि डाली तो जल के ऊपर स्थूल शरीर वाली विकराल राक्षसी दीख पड़ी। बस, विशालकाय हनुमानजी वेगपूर्वक-सिंहिका के ऊपर कूँद पड़े। भूधराकार, महातेजस्वी, महाशक्तिशाली पवनपुत्र का भार वह राक्षसी कैसे सह पाती? पिसकर चूर्ण-चूर्ण हो गयी।

हनुमानजी का यह भयानक कार्य देखकर खेचर प्राणियों ने उनका स्तवन करते हुए कहा-‘कपिवर! इस विशालकाय प्राणी को मार डालने का अद्भुत कर्म कर लेने पर अब आप निरापद आगे जा सकते हैं। वानरेन्द्र! जिस पुरूष में आपके समान धैर्य, समझ, बृद्धि और कुशलता-ये चारों गुण होते हैं, उसे अपने कार्य में कभी असफलता-नहीं होती।’

आकाश में विचरण करने वाले प्राणियों के वचन सुनते हुए श्रीपवनपुत्र दक्षिण दिशा की ओर अत्यन्त वेगपूर्वक जा रहे थे। कुछ ही देर में वे निर्विघ्न लंका के उस समुद्र-तटपर पहुँचे, जहाँ विविध प्रकार के सुगन्धित पुष्पों और फलों से लदे वृक्षों के सुन्दर बगीचे थे। वे भौरों के गुज्जार एवं अनेक प्रकार के सुन्दर पक्षियों के कलरव से निनादित थे। वहाँ मृग-शावक क्रीडा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक इधर-उधर दौड़ रहे थे। शीतल बयार बह रही थी। बड़ा ही मनोरम दृश्य था। वहाँ से त्रिकूट-पर्वत के शिखर पर बसी हुई चतुर्दिक् परकोटों एवं खाइयों से घिरी रावण की लांकापुरी स्पष्ट दीख रही थी।

आन्जनेय ने एक बार चारों ओर देखा। फिर वे लंका में प्रविष्ट होने के लिये विचार करने लगे। उन्होंने सोचा-‘दुर्धर्ष दशानन से युद्ध अनिवार्य है। अतएव यहाँ अपरिमित वानर-भालुओं की सेना के साथ प्रभु के ठहरने के स्थान और जल-फल के सुपास का भी पता लगा लेना चाहिये। यह दुर्ग अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है। अतएव आक्रमण की दृष्टि से यहाँ की एक-एक बात जान लेना नितान्त आवश्यक है। किंतु इस विशाल वेष में दिन के प्रकाश में तो असुरों को मेरे आगमन का रहस्य विदित हो जायगा; अतएव रात्रि में सूक्ष्म वेष में इस दुरूह दुर्ग के भीतर मेरा प्रवेश करना हितावह होगा।’

आंजनेय उछलकर एक पर्वत पर चढ़ गये और वहीं से लंकापुरी को देखने लगे। वह पुरी अत्यन्त सुदृढ़ दुर्ग थी और उसकी सुन्दरता अनिर्वचनीय थी। उसके चारों ओर समुद्र थे और उसके परकोटे सोने के बने थे। उसके सभी द्वार सुवर्ण निर्मित थे। प्रत्येक द्वार पर नीलम के चबुतरे बने थे। वहाँ के सुविस्तृत पथ स्वच्छ एवं आकर्षक थे। रावण द्वारा पालित लंकापुरी में स्थान-स्थान पर सुरम्य वन एवं निर्मल जलपूरित जलाशय विद्यमान थे। उसके निर्माण में जैसे विश्वकर्मा ने अपनी समस्त बुद्धि व्यय कर दी थी।

लंका में सर्वत्र सशस्त्र विकराल सैनिकों की कठोर सुरक्षा-व्यवस्था थी। श्री विदेहनन्दिनी को हरकर लाने के बाद रावण ने वहाँ की रक्षा-व्यवस्था और सुदृढ़ कर दी थी। उसके चारों ओर विशाल धनुष-बाण धारण किये अनेक भयानक राक्षस सजग होकर अहर्निश घूमते रहते थे।

राक्षसराज रावण की पुरी लंका का यह दृश्य देखते हुए महावीर हनुमान सायंकाल की प्रतीक्षा कर रहे थे। धीरे-धीरे सूर्यास्त हुआ। श्रीपवननन्दन ने अणिमा-सिद्धि के द्वारा अत्यन्त छोटा रूप धारण कर मन-ही-मन श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रणाम किया और उनकी पावनतम् मूर्ति को हृदय में धारण करके लंका में प्रविष्ट हुए।

हनुमानजी के अत्यन्त लघु रूप धारण करने पर भी लंका की अधिष्ठात्री देवी लंकिनी ने उन्हें देख लिया। उसने उन्हें डाँटते हुए कहा-‘अरे तू कौन है, जो चोर की तरह इस नगरी में प्रवेश कर रहा है। अपनी मृत्यु के पूर्व तू अपना रहस्य प्रकट कर दे।’

कपिश्रेष्ठ श्रीहनुमान ने सोचा-‘पहले ही इससे विवाद करना उचित नहीं। यदि और राक्षस आ गये तो यहीं युद्ध छिड़ जायगा और माता सीता का पता लगाने के कार्य में विघ्न पड़ेगा।’ बस, उन्होंने उसे स्त्री समझकर उस पर बाये हाथ की मुष्टि से धीरे से प्रहार किया; पर वज्रांग श्रीहनुमान का मुष्टि-प्रहार! ल्ंकिनी के नेत्रों के सम्मुख अँधेरा छा गया। वह रूधिर वमन करती हुई पृथ्वी पर गिरकर मूच्र्छित हो गयी; किंतु कुछ ही देर बाद वह पुनः सँभली और उठकर बैठ गयी। अब लंकिनी ने उन अम्भोधिलड्घक वानरशिरोमणि से कहा-‘‘श्रीरामदूत हनुमान! तुमने लंकापुरी पर विजय प्राप्त कर ली। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो! अब सीता के कारण दुरात्मा रावण के विनाश का काल अत्यन्त निकट आ गया है। बहुत पहले चतुर्मुख ब्रह्मण ने मुझसे कहा था कि ‘त्रेतायुग में साक्षात् क्षीरोदधिशायी अविनाशी नारायण दशरथकुमार श्रीरामरूप में अवतीर्ण होंगे। उनकी सहधर्मिणी महामायारूपिणी सीतादेवी का रावण हरण करेगा। उन्हें ढूँढ़ते हुए जब रात्रि में एक वानर लंका में प्रवेश करेगा और उसके मुष्टि-प्रहार से तू व्याकुल हो जायगी, तब समझना कि अब असुर-वंश के ध्वंस होने में विलम्ब नहीं।’ पर मेरा परम सौभग्य है कि दीर्घकाल के अनन्तर आज मुझे उन भवाब्धिपोत श्रीराम के प्रिय भक्त का अति दुर्लभ संग प्राप्त हुआ है। आज मैं धन्य हूँ। मेरे हृदय में विराजमान दशरथनन्दन श्रीराम मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।’’

परम बृद्धिमान् वानरशिरोमणि वायुनन्दन ने अत्यन्त छोटा रूप धार कर लिया और फिर वे करूणामय प्रभु का मन-ही-मन स्मरण कर विकट असुरों से सुरक्षित दुर्भेद्य लंका में प्रविष्ट हुए।

श्रीकेसरी-किशोर के समुद्रोल्लंघन एवं लंका-प्रवेश के साथ ही जगज्जननी जानकी एवं लंकाधिपति रावण की बायीं भुजा और वायें नेत्र तथा समस्त सुरवन्दित दशरथकुमार श्रीराम के दायें अंग फड़क उठे।

सारांस यही है कि लीलाधारी प्रभु श्रीसीताराम जी के चरणों में अपने को समर्पित करके श्री हनुमानजी की आराधना करने पर व्यक्ति परमानन्द प्राप्त कर सकता है। इस मायारूपी अंधकार से निकलकर सुखदायी भक्ति को प्राप्त करने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।

जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक-अनिल यादव।

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