बाबा विश्वनाथ शिवशंकर भोले नाथ के मुँह पर सदा ‘राम-नाम’ विराजित रहता है। स्वयं माता पार्वतीजी कहती हैं-

‘आध्यात्मरामायण’ आदि में वे स्वयं भी कहते हैं-
अहं भवन्नाम गृणन् कृतार्थो वसामि काश्यामनिशं भवान्या।
मुमूर्षमाणास्य विमुक्तयेऽहं दिशामि मन्त्रं तव रामनाम।।
(आध्यात्मरामायण)

‘तव नाम जपामि नमामि हरी।’ इत्यादि
काशी मुक्ति का कारण भगवन्नाम

श्रीरामोत्तरतापिनीय उपनिषद् तथा श्रीनारदीय महापुराण आदि में भी भगवान् राम-शंकर के संवाद से इसका पोषण होता है-

क्षेत्रेऽस्मिन् तव देवेश! यत्र कुत्रापि वा मृताः।
कृमिकीटादयोऽप्याशु मुक्ताः सन्तु न चान्यथा।।
मुमूर्षोदक्षिणे कर्णे यस्य कस्यापि वा स्वयम्।
उपदेक्ष्यसि मन्मन्त्रं स मुक्तो भविता शिव।।

अर्थात् देवेश! आपके इस कशीक्षेत्र में कहीं भी प्राणत्याग करने वाले कृमि-कीट आदि भी तत्काल मुक्त हो जायँगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। आप यहाँ के मरने वाले जिस किसी भी प्राणी के कान में मेरे मन्त्र का उपदेश कर देंगे, शिवजी! वह अवश्य ही मुक्त हो जायगा।

बेद बिदित तेहि पद पुरारिपुर कीट पंतंग समाहीं।

-इस विनयपत्रिका के बचन से गोस्वामी जी ने इसी श्रुतिमन्त्र का निर्देश किया है।

गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज ने अपने मानस में तथा अन्यत्र भी यही लिखा है-
कासीं परत जीव अवलोकी। जासु नाम बल करौं बिसोकी।।
सोई प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।

महिमा राम नाम कै जान महेस। देत परम पद कासीं करि उपदेस।।
(बरवै रामायण, उत्तरकाण्ड)

आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।।
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेस करत करि दाया।

‘जाहि जपत त्रिपुरारि।’ ‘संतत जपत संभु अविनासी।
सिव भगवान ग्यान गुन रासी। नाम प्रसाद संभंु अबिनासी।
…………….साज अमंगल मंगल रासी।।’

श्रीवामदेवजी के उपदेश के अनुसार पराम्बा भगवती श्रीपार्वती प्रतिदिन श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करके ही भोजन करती थीं। एक दिन भगवान् शंकर ने परम मनोहर कैलासशिखर पर भगवान् विष्णु की आराधना करने के बाद पार्वतीजी को भोजन के लिये बुलाया। देवी ने कहा कि ‘मैं तो विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ कर रही हूँ। आप अभी मुझे क्षमा करें और स्वयं भोजन करें। पाठ समाप्त होने पर मैं आकर भोजन कर लूँगी।’

इस पर भगवान् सदाशिव ने कहा-‘देवि! तुम्हारी वैष्णवी भक्ति बहुत श्रेष्ठ है। भगवान् विष्णु के सभी नाम वेदों के पाठ- श्रवण-फल से अधिक फलप्रद कहे गये हैं; किंतु श्रीराम-नामकी महिमा विष्णुसहस्त्रनाम के तुल्य ही कही गयी है। अतः देवि! मैं तो सहस्त्रनाम के सदृश ‘राम, राम, राम’-इस प्रकार जप करता हुआ परम मनोहर श्रीराम-नाम में ही निरन्तर रमण किया करता हूँ। पार्वति! जिन-जिन दूसरे नामों के आदि में भी ‘र’ कार आता है, उन्हें सुनकर रामनाम की आशंका से मेरा मन अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है; अतः महादेवि! तुम इस श्रीराम-नाम का ही उच्चारण करके इस समय मेरे साथ भोजन कर लो-

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।
रकारादीनि नामनि श्रृण्वतो सम पार्वति।
मनः प्रसन्नतां याति रामनामाभिशंकया।।
रामेत्युक्त्वा महादेवि! भुड्क्ष्व सार्धं मयाधुना।।

ऐसा कहने पर देवी पार्वती ने श्रीरामनाम का जप करके शंकरजी के साथ भोजन किया। इस पर प्रसन्न होकर भगवान् सदाशिव ने उन्हें आधे शरीर में स्थान दिया और अर्धनारीश्वर-विग्रह धारण कर लिया-

सहसनाम सम सुनि सिवबानी। जपि जेई पियसंग भवानी।।
हरखे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।।

एक बार अमृत के लिये देवता तथा असुर समुद्रमंथन में प्रवृत्त हुए। उसमें वासुकि सर्प के तीक्ष्ण विष आदि के प्रभाव से समुद्र से हलाहल विष निकला और उससे सारा संसार ही दग्ध होने लगा।

उत्पपाताग्निसंकाशं हालाहलमहाविषम्।
तेन दग्धं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्।।

हालाहल से विकल होकर देवता लोग भगवान् सदाशिव की शरण गये। भगवान् विष्णु ने भी वहाँ प्रकट होकर प्रभु शिव से अग्रभाग ग्रहण करने का विनोद किया और प्रभु ने भी उनका ‘रामनाम’ लेकर उसे तत्काल ग्रहण कर लिया-

अथ देवा महादेवं शंकरं शरणार्थिनः।
जग्मुः पशुपतिं रूद्रं त्राहि त्राहीति तृष्टुवुः।।
(वाल्मीकि रामायण)

नाम प्रभाव जान सिव नीकें। कालकूट फल दीन्ह अमी कें।।
यच्चकार गले नीलं तच्च साधोर्विभूषणम्।
(श्रीमद् भाग0)

प्रगटी उदधि मथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भए बिहाला।।
कीन्हि दया तहँ करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई।।

एक बार कैलास पर्वत पर भगवान् शिव के यहाँ रामकथा का आयोजन हुआ। श्रीवाल्मीकि जी महाराज ने सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत कथा सुनायी। सभी देवता, गन्धर्व, विद्याधर, यक्ष, सिद्ध, असुर, किंनर आदि बड़े उत्साह से भाग ले रहे थे। कथा के अन्तमें वे उसे अपने लोकों में ले जाने के लिये माँगने लगे और लड़ पड़े। ऊध्र्वलोकवासी देवताओं का कथन था कि ‘हम भोगी- राजस स्वभाव के प्रणियों के लिये इसकी परम आवश्यकता है।’ पातालवासी असुर-दानवों का आग्रह था कि ‘वे तमःप्रधान माया-मोहित जीव हैं, बिना श्रेष्ठ उपदेश के उनके आचरण में सुधार होने की आशा नहीं की जा सकती।’ भूलोकवासियों का आग्रह था कि ‘देवता-असुरादि योनियाँ स्वयं सबल तथा कृतार्थ हैं। दीन-हीन-दुर्बल प्राणियों के लिये भगवत्-कथा की तो उन्हें ही परम अपेक्षा है।’

भगवान् भोलेनाथ ने कहा कि ‘लड़ने की कोई बात नहीं, हम इसे बिलकुल तीन भागों में ठीक-ठीक बाँट ही देते हैं। 100 करोड़ के तीन भाग करने पर 33-33 करोड़ हुए, किंतु 1 बाकी रह गया और उसके भी पूरे भाग करते-करते अन्त में भी एक श्लोक पड़ा रह गया। अनुष्टुप् छन्द के 32 अक्षर होने से भगवान् ने उसके भी तीन भाग कर दिये-दस-दस अक्षर तीनों को मिले; किंतु पुनः दो अक्षर बच निकले। भगवान् ने देखा ये ‘रा’ और ‘म’ थे। उन्होंने सबसे प्रार्थना की कि ‘इनके तीन भाग नहीं हो सकते और दो अक्षरों के लिये झगड़ा व्यर्थ है, वे उन्हें मेरे लिये छोड़ देने का अनुग्रह करें।’

द्वऽक्षरे आचमानाय मह्यं शेषे ददौ हरिः।
उपदिश्याम्यहं काश्यामन्तकालीे नृणां श्रृतौ।
रामेति तारं मन्त्रं तमेव विद्धि पार्वति।।
(आनन्दरामायण)

ब्रह्म राम ते नाम बड़ बर दायक बर दानि।
राम चरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।
(रामचरित मानस)

सतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि लियो काढ़ि वामदेव नाम घृत है।
(विनयपत्रिका)

वास्तव में भगवान् शिवशंकर के नाम प्रेमका वर्णं नहीं हो सकता। बस-
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।।

सारांस यही है कि जब शिवशंकर दिन रात राम ‘राम राम राम राम राम’ रटते रहते हैं तो हम सभी को दिन रात सिर्फ ‘राम राम राम राम राम राम’, ‘सीताराम सीताराम सीताराम सीताराम सीताराम सीताराम’ नाम जप कराना है। इससे अपने कल्याण के साथ-साथ कई पीढियों का कल्याण होगा। ये परम सत्य है।

जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक- अनिल यादव।

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