saint

शब्दों और वाक्यों का हम लोग गलत अर्थ निकाल लेते हैं। ‘‘संतों की उलटी चाल’’ को लोग समझते हैं कि मनमाना या हटकर किये जाने वाला आचरण होता है, वे बुरा कर्म करते भी नहीं डरते। परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है। संतों की उलटी चाल का अर्थ है कि वे विषयी लोगों के मार्ग से उलटे मार्ग पर चलते हैं। विषयी पुरूष मान चाहते हैं, वे मान का त्याग करते हैं। विषयी लोग धन से लिपटे रहते हैं, वे धनको तुच्छ समझते हैं। विषयी लोग सांसारिक उन्नति को और शरीर के आराम को ही आराम मानते हैं, वे परमार्थ के सामने सांसारिक उन्नति को तुच्छ समझते हैं और दूसरे के आराम के लिये शरीर के आराम की बलि चढ़ा देते हैं। बात यह है कि विषयी पुरूष संसार में फँसा रहना चाहता है और वे उससे मुक्त होना चाहते। इसलिये उनकी उलटी चाल तो होगी ही। परन्तु यह बात साधक संतों की है। सिद्ध संत तो सर्वथा उलटे हुए हैं। वे तो जहाँ से आये थे, उलटे जाकर वहीं पहुँच गये हैं। इससे उनकी बात यदि उलटी हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। परन्तु वह उलटी भी सब संतो की नहीं होती। लोकसग्रही संत तो यह उलटापन बाहर प्रायः आने ही नहीं देते। हाँ, ब्रह्मचार की परवा न करने वाले-अवधूतों की बात दूसरी है।
सारांस यही है कि संत को संत की दृष्टि से ही देखना चाहिये। संत के लिये हृदय में सम्मान का दृष्टिकोण होना चाहिये। उलटे बिचार लाना घातक है।

जय सियाराम, जय हनुमान, जय संत भगवान।

लेखक- अनिल यादव।

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