संत श्री समर्थ रामदास स्वामी

भारतीय संतों में राष्ट्रगुरू श्री समर्थ रामदास स्वामी का स्थान बहुत विशिष्ट है। वे एक ऐसे सन्त हैं, जिन्होंने मन की साधना के साथ-साथ तन की साधना का भी समर्थन और प्रचार किया था। आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ शारीरिक शक्ति का संचय भी उनकी उपासना-पद्धति का एक आवश्यक अंग कहा जा सकता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वयं श्रीहनुमानजी ही श्री समर्थ के गुरू थे-

आदिनारायणं विष्णुं ब्राह्मणं च वसिष्ठकम्।
श्रीरामं मारूतिं वन्द्र रामदासं जगदगुरूम्।।

श्री समर्थ-सम्प्रदाय की यह गुरू-परम्परा है। श्रीहनुमानजी की श्री समर्थ पर प्रत्यक्ष और असीम कृपा थी। श्री समर्थ के चरित्र-लेखकों ने ऐसा संकेत किया है कि श्रीराम-नाम का गुरू-मन्त्र देकर श्रीहनुमानजी ने श्री समर्थ को उनकी बीस वर्ष की अवस्था में ही प्रभु श्रीरामचन्द्र जी का साक्षात्कार करा दिया था।

नसिक-क्षेत्र के निकट गोदावरी के तटपर ‘टाकली’ गाँव स्थित है। यहाँ श्री समर्थ ने बारह वर्ष तक श्रीराम नाम का तेरह करोड़ जप करते हुए अग्र तपश्चर्या की थी। ऐसा कहा जाता है कि उस अविधि में उनके प्रवचनों को सुनने के लिये स्वयं श्रीहनुमानजी भी वामनरूप में उपस्थित रहा करते थे। टाकली की तपश्चर्या उन्हें फलदायी हुई और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की उनपर कृपा हो गयी। बारह वर्ष की तपश्चर्या पूरी करने के बाद टाकली में वे जिस कुटी में निवास कर तप करते थे, उसमें गोबर की श्रीहनुमान-मूर्ति स्थापित करके अपने शिष्य श्री उद्धवजी गोस्वामी को वहाँ की देखभाल के लिये नियुक्त कर वे तीर्थाटन करने निकल पड़े। कहा जाता है कि तीर्थाटन के पूर्व उनकी और बालक शिवाजी की भेंट नासिक में हुई थी।

तीर्थाटन के बाहर वर्षों की अवधि में उन्होंने प्रायः समस्त भारत में पैदल ही भ्रमण कर सामाजिक जीवन का दीन-हीन चित्र निकट से देखा। यवनों द्वारा दलित होते हुए हिंन्दुओं के ‘त्राहि-त्राहि’-स्वर से उनका तन-मन तिलमिला उठा था। हिन्दू-धर्म और हिन्दू-समाज का दुर्दषामय चित्र देखकर उन्होंने श्रीहनुमानजी की उपासना का संजीवन-महामन्त्र प्रवर्तित किया और इसके द्वारा हिन्दुओं में आत्मविश्वास की भावना जाग्रत् की एवं उन्हें हिन्दू-धर्म के संरक्षण करने की प्रेरणा प्रदान की। उनकी प्रेरणा से धर्म-संरक्षणार्थ हजारों स्थानों पर शक्ति के प्रतीक श्रीहनुमानजी की भव्य मूर्तियों की स्थापना हुई तथा स्थान-स्थान पर उनकी उपासना चल पड़ी। श्रीहनुमानजी केवल शारीरिक शक्ति के ही प्रतीक नहीं थे, अपितु उससे भी अधिक वे श्रीराम-‘कार्य’ के प्रतीक थे। श्रीराम-कार्य का अर्थ है-रावणत्व पर रामत्व की विजय, अधर्म के स्थान पर धर्म की स्थापना तथा देवत्व द्वारा असुरता का दमन। स्वामी समर्थ श्रीरामदासजी द्वारा स्थापित मूर्तिंयों में पाँवतले राक्षस को दबाकर खड़े हुए विजयी वीर श्रीहनुमानजी का रूद्ररूप ही प्रदर्शित किया गया है। उनके द्वारा स्थापित मूर्तियों की यह एक पहचान सी बन गयी है।
भारत के सुदूर प्रान्तों में भी स्वयं श्रीसमर्थ के द्वारा स्थापित श्रीहनुमान-मन्दिर प्रसिद्ध हैं, जिनमें काशी के हनुमानघाट पर स्थापित मूर्ति, दिल्ली के कनाॅट-प्लेस तथा शिमला के मन्दिर विशेष उल्लेखनीय हैं। उनके कार्यांे का विशेष प्रचार महाराष्ट्र में हुआ। सारे महाराष्ट्र में उनके शिष्यों की संख्या-वृद्धि द्रुतगति से हुई तथा स्थान-स्थान पर उनकी प्रेरणा से शक्ति देवता वीर हनुमान की स्थानपा और उपासना बढ़ने लगी। ‘जय जय रघुवीर समर्थ’ का घोष सारे महाराष्ट्र के गाँवों-गाँवों गूँज उठा। आज महाराष्ट्र की ऐसी स्थिति है कि पूरे महाराष्ट्र में एक भी गाँव ऐसा नहीं है, जिसमें श्रीहनुमान-मन्दिर न हो।

ऐसी मान्यता है कि श्री समर्थ-भक्तों की प्रार्थना पर श्रीहनुमनस्वामीजी महाराज ने प्रवचन के रूप में श्री समर्थ चरित्र का वर्णन चाफल में किया था। उनके इन प्रवचनों को किसी ने ‘श्रीहनुमंतस्वामिकृत श्री समर्थाची बखर’ नामक ग्रन्थ में संगृृहीत किया है। इस बखर का संशोधन तथा प्रकाशन धुलिया के ‘समर्थ वाग्देवता-मन्दिर’ के द्वारा किया गया है। इस ग्रन्थ में श्री समर्थ रामदास स्वामी द्वारा स्थापित श्रीहनुमानजी के अनेकोें मन्दिरों का विवरण है, जिनमें महाराष्ट्र के ग्यारह मारूति-मन्दिर अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। ये ग्यारह विग्रहस्थल श्री समर्थ-सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण तीर्थस्थान माने जाते हैं। तत्कालीन धर्म-संरक्षण के कार्य में उनका असाधारण महत्व रहा है। कहा जाता है कि श्री समर्थ के संकेत पर श्रीछत्रपति शिवाजी महाराज ने इन मन्दिरों के व्यवस्था-हेतु प्रत्येक मन्दिर के लिये ग्यारह एकड़ जमीन पुरस्कार स्वरूप में प्रदान की थी।

महाराष्ट्र में श्री स्वामी समर्थ रामदासजी द्वारा स्थापित 11 मारूति मन्दिर इस प्रकार है-
(1) शहापुर, चुन्याचा मारूति (वर्ष1566)
(2) मसूर, महारूद्र हनुमान (वर्ष1567)
(3) चाफल, दास मारूति प्रताप मारूति (वर्ष1570)
(4) चाफल, प्रताप मारूति (वर्ष1570)
(5) उम्ब्रज, उम्ब्रज मारूति या माथतिल मारूति (वर्ष1571)
(6) शिराले, वीर मारूति रूख (वर्ष1576)
(7) मनपाडले, मनपदाले चा मारूति (वर्ष1573)
(8) पारगाँव, पारगाँव चा मारूति (वर्ष1574)
(9) मानेगाँव, मानेगाँव च मारूति (वर्ष1571)
(10) शिगणवाडी, खडीचा मारूति या बाल मारूति (वर्ष1571)
(11) बहेषोरगाँव, बहेषोरगाँव च मारूति (वर्ष1573)

ये स्थान श्री समर्थ-सम्प्रदाय के नितान्त श्रद्धास्थान हैं।

श्री समर्थ रामदासजी श्री हनुमानके महान् उपासक थे। उनके साहित्य में श्रीहनुमानजी ब्रह्मचारी, प्रतापी, बुद्धिमान्, ज्ञानी, आदर्श श्रीराम-भक्त के रूप में चित्रित हुए हैं। श्रीसमर्थ द्वारा रचित ‘मनोबोध’ के श्लोक 78 में, श्री ‘दासबोध’ के सोलहवें दशक के छठे समास में तथा किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड और युद्धकाण्ड में श्रीहनुमानजी के विविध एवं सरस वर्णन प्रस्तुत किये गये हैं। उपरिनिर्दिष्ट ग्यार मन्दिरों की श्रीहनुमान-उपासना हेतु उन्होंने अलग-अलग ग्यारह स्त्रोत लिखे हैं। इनमें पहला और पाँचवाँ स्त्रोत अत्यन्त प्रसिद्ध और प्रचलित हंै। श्रीहनुमानजी के वर्णन में उनके चैदह अभंग, ग्यारह पद और कई सवाइयाँ उपलब्ध हैं, जिनमें कुछ हिंदी-भाषा में भी हैं। श्रीसमर्थ द्वारा रचित श्रीहनुमानजी की चार आरतियाँ भी हैं, उनमें से दो का प्रचलन आज भी महाराष्ट्र में प्रायः सर्वत्र दिखायी देता है। उनकी सरस शैली, प्रवाहपूर्ण वाक्य-रचना तथा ओजस्वी भाषा के कारण श्रीहनुमानजी का श्रीरघुवीर-सेवा-परायण, परमप्रतापी वीरतायुक्त सर्वांगीण चित्र आँखों के सामने अनायास खिंच जाता है। श्रीसमर्थ-सम्प्रदाय में इस समूचे साहित्य का बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ पठन-मननन होता है।

विजय तथा सफलता की प्रप्ति के लिये कवच के रूप में ताबीज को भुजा पर या गले में धारण करने की प्रथा भी उन्होंने आरम्भ की थी। इस ताबीज को पहले सिद्ध करना पड़ता है, जिसके लिये विधि-मन्त्र श्रीसमर्थजी ने बताया है।
श्री समर्थ द्वारा संचालित उपासना में श्री हनुमानजी का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। यह तथ्य इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि नित्यकर्म के अन्तमें श्री ‘दासबोध’ का पाठ करने के पश्चात् छः अन्य श्लोकों के कहने की प्रथा रही है। इन श्लोकों का भावार्थ यह है कि ‘हमारी वंश-वेलि’ श्रीहनुमानजी से प्रस्फुटित हुुई है, जो प्रभु श्रीरामरूपी मण्डप तक पहुँच गयी है। इस वेलि में श्रीराम-भक्ति के फल लगे हैं। श्रीहनुमान ही हमारे कुल-पुरूष हैं। वे ही हमारे मुख्य देवता हैं। उनके बिना हमारा परमार्थ सिद्ध नहीं हो सकता। श्रीहनुमानजी ही हमारे सहायक हैं और प्रभु श्रीरघुनाथजी हमारे परमाराध्य हैं। जब हमें श्रीहनुमानजी-जैसे समर्थ गुरू की कृपा प्राप्त हुई है, तब हम दासों को किस बात की कमी है? जब श्रीरघुनन्दन-जैसे दाता हैं, तब अन्य कोई हमें इनसे बढ़कर क्या दे सकता है? अतः इन्हें छोड़कर हम लोग किससे क्या माँगें? इसलिये हम श्रीराम के दास हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्र के चरणों में ही हमारा विश्वास है। यदि आकाश भी टूट पडे़ तो भी हम किसी और के पास नहीं जायँगे। श्रीराम स्वरूप हमारा सम्प्रदाय है, अयोध्या हमारा मठ है माता जानकी तथा श्रीरघुनाथजी हमारे देवता है और श्रीहनुमानजी की उपासना ही हमारा नियम है। इस प्रकार श्रीसमर्थ रामदास परमार्थ सिद्ध करते हैं।

सारांस यही है कि चाहे जितनी विपत्ति आ जाये हम सभी को अपने परम आराध्य श्रीसीतारामजी की शरण में रहकर श्री हनुमानजी की अपासना करना चाहिये। बड़ी से बड़ी बाधा यूँ चुट्की बजाते दूर हो जायेगी। यह गारंटी है।

लेखक- अनिल यादव।

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