श्रीराम के अनन्य भक्त के रूप में श्रीहनुमानजी का नाम प्रख्यात है। अत्याचार के प्रतिनिधि रावण तथा उसके सयोगियों के दमन में श्री हनुमानजी ने निस्संदेह अतुलित बल का परिचय दिया। इस कार्य में श्रीराम के नेतृत्व में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाही। उनको जो प्रभूत सम्मान प्राप्त हुआ, उसके मूल में यही तत्व विद्यमान है।

रावण की दुर्दान्त पाशविक शक्ति का उन्मूलन सहज सम्भव न था। इसके लिये श्री रामको वानरों तथा ऋक्षों का विशेष रूप से सहयोग लेना पड़ा। राक्षसों के साथ महायुद्ध में श्रीहनुमानजी का शौर्य तथा कौशल महान् था। उनके इन गुणों तथा अपने प्रति असीम निष्ठा के कारण ही श्रीराम उन्हें अपना अनन्य भक्त मानते थे। गोस्वामी तुलसीदासजी ने उनके महत्व को विशेष रूप से बढ़ाया। उनकी पूजा व्यापक-रूप में भारत के विभिन्न भागों में प्रचलित है।

प्राचीन भारतीय साहित्य और कला में श्री हनुमानजी का योगदान विविध रूपों में उपलब्ध है। संस्कृत, प्राकृत, हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में उनका गुणगान अनुपम श्रीराम-भक्त के रूपमें मिलता है। साथ ही उन्हें अत्याचार का विध्वंसक और असीम शक्ति वाला देव माना गया है; क्यों कि उनमें असम्भव को भी सम्भव बनाने की क्षमता है।

मूर्ति-कला में ईसवी 700 के लगभग वीरभाव में श्रीहनुमान की विशाल प्रतिमाएँ बननी प्रारम्भ हुईं। उनके मन्दिरोें का निर्माण पूर्वमध्यकाल से होने लगा। मध्य प्रदेश के गुना जिले में इंदौर (प्राचीन इन्द्रपुर) में श्री हनुमानजी के मन्दिर के अवशेष मिले हैं। वहाँ उनकी विशाल प्रतिमा सुरक्षित है। मूर्ति की चरण-चैकी पर उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होता है कि मूर्ति का निर्माण ई0 नवी शती में हुआ था। मूर्ति में दायाँ हाथ ऊपर उठा है और वायाँ भग्र है। उनका बायाँ पैर अपस्मार पुरूष के ऊपर रखा है। कमर का कटिबन्ध दर्शनीय है।

श्रीहनुमानजी की एक महाकाय मूर्ति मथुरा में मिली थी, जो अब वहाँ के संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें श्री हनुमानजी का वीरभाव बड़े प्रभावोत्पादक ढंग से प्रदर्शित हुआ है। यह मूर्ति लाल बलुए पत्थर की है और इसमें निर्माणकाल ई0 आठवीं शती है।

खजुराहो में श्री हनुमानजी की तीन उल्लेखनीय स्वतन्त्र प्रतिमाएँ मिली हैं। पहली महाकाय मूर्ति खजुराहो के पश्चिम मन्दिर-समूह से गाँव की ओर जाती हुई सड़क किनारे बनी हुई मठिया में प्रतिष्ठापित है। यहाँ पहले श्रीहनुमान का मन्दिर रहा होगा। यह प्रतिमा विशेष महत्व की है। इसकी चरण-चैकी पर वर्ष-संवत् 316 (922ई0)-का लेख उत्कीर्ण है। खजुराहो में उपलब्ध लेखों में यह सबसे अधिक प्राचीन माना जाता है। मूर्ति में वानरमुख श्री हनुमान का दायाँ पैर पादपीठ पर रखा है। कुछ ऊपर उठा हुआ बायाँ चरण पद्यपत्र पर टिका है। नीचे अपस्मार पुरूष दिया गया है। ऊपर उठा हुआ दायाँ हाथ सिर पर है, मुड़ा हुआ बायाँ हाथ वक्षःस्थल पर रखा है, लंबी लंगूल ऊपर मुड़ी हुई दिखाई गयी है। उनके गले में लंबी वनमाना सुशोभित है। उनकी दायीं ओर कटि के समीप अज्जलि-मुद्रा में हाथ जोड़कर बैठे हुए भक्त की लघु आकृति है। खजुराहो में श्रीहनुमान की दूसरी मूर्ति वर्तमान ‘वनखण्डी महादेव’-मन्दिर के भीतर है। इस मूर्ति का भी निर्माण-काल ई0 दसवीं शती है। पहली मूर्ति के समान यह भी वीरभाव में है। इसमें नीचे अपस्मार पुरूष सपत्नीक न होेकर अकेला है। मूर्ति में लंबी लांगूल नहीं दिखायी गयी है। उनका मुख सामने की ओर है और पृष्ठभाग नहीं दिखाया गया है। तीसरी प्रचाीन मूर्ति खाजुराहो गाँव के पास निनोरा ताल के किनारे पर बनी एक मठिया में सुरक्षित है। इसकी रचना पहली दोनों प्रतिमाओं-जैसी ही है। इन तीनों प्रतिमाओं की पूजा अभी भी होती है। उन पर चढ़ी हुई सिंदूर की परतों से इनकी प्रचाीनता का अनुमान लगाया जा सकता है। श्री हनुमान की इन स्वतन्त्र मूर्तियों के अतिरिक्त खजुराहो के शिलापट्ट पर श्रीराम तथा श्रीसीता जी के साथ श्रीहनुमान दिखाये गये हैं। यह शिलापट्ट मठिया के बहिर्भाग में लगा है। इसमें श्रीराम के पाश्र्वमें श्रीसीता खड़ी हैं। दायीं और खड़े हुए लक्ष्मणजी की लघु आकृति बनी है। वे करण्ड-मुकुट धारण किये हुए हैं। उनके मस्तक पर श्रीराम अपना दक्षिण कर पालित-मुद्र में रखे हुए हैं। इस शिलापट्ट का निर्माण-काल ईसवी दसवीं शती है।

मध्यप्रदेश में मल्लार जिला बिलासपुर एक उल्लेखनीय कला-केन्द्र है। वहाँ शुंगकालसे लेकर तेरहवी शती तक विभिन्न धर्माें से सम्बन्धित कलाकृतियों का निर्माण बृहद् रूप में हुआ। श्रीहनुमानजी की एक विशेष प्रतिमा यहाँ से मिली है, जिसमें उनका भग्मिायुक्त वीरभाव दर्शनीय है। दायाँ हाथ अभयमुद्रा में ऊपर उठा हुआ है और बायाँ कमर में खोंसी हुई कटार के ऊपर स्थित है। उनका बायाँ पैर अपस्मार नारी की पीठ पर है और नारी-आकृति के नीचे अपस्मार पुरूष बैठा है। श्री हनुमानजी का नीचे गिरता हुआ उत्तरीय आकर्षक ढंग से दिखाया गया है। वे करण्ड-मुकुट, हार, एकावली, चैलड़ी, मेखला तथा दुहरे नूपुर पहने हैं। मेखला से लटकती हुई क्षुद्र घंटिकाए दिखायी गयी हैं। कानों में गोल कुण्डल तथा हाथों में अंगद और कटक हैं। मस्तक के पीछे दुहरा प्रभामण्डल दिखाया गया है। उनकी मूँछे विजयी योद्धा की तरह ऊपर तनी हुई हैं।

हाल में इन पड्क्तियों के लेखक को सागर जिला के कानगढ़ नामक स्थान में श्री हनुमानजी की एक विशाल मूर्ति देखने को मिली। मूर्ति-भज्जकों द्वारा तोड़कर इसके दो भाग कर दिये गये हैं। उनके बायें पैर के नीचे अपस्मार पुरूष है। श्री हनुमानजी का मुख खुला हुआ है, जिससे उनकी दुहरी दन्तपड्क्ति स्पष्ट दिखायी देती है। सिरपर मुकुट शोभाायमान है। दायाँ हाथ वक्षःस्थल के सामने है। मुकुट के अतिरिक्त वे अन्य अनेक आभूषण धारण किये है।

भारत के अन्य अनेक स्थलों में श्रीहनुमानजी की कला-कृतियाँ मिली हैं। ये पत्थर, हाथीदाँत, काँसा, चाँदी आदि की हैं। दक्षिण भारत में धातु, चन्दन तथा हाथीदाँत की बनी हुई श्रीहनुमान की बहुसंख्यक मूर्तियाँ पायी गयी हैं, जो देश के अन्य भागों में भी भेजी जाती थीं।

राजस्थान तथा पहाड़ी चित्रकला में श्रीरामचरित का अंकन प्रचुररूप में मिलता है। वहाँ श्री हनुमानजी को उचित स्थान प्रदान किया गया है।

श्री हनुमानजी की अनेक मूर्तियाँ भारत के बाहर स्याम, कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा आदि में मिली हैं। वहाँ के जिन प्रचीन मन्दिरों में श्रीरामकथा का अंकन मिलता है, उनमें श्रीहनुमानजी की आकृतियाँ निश्चित रूप में उत्कीर्ण है। उन देशों में होने वाली श्रीरामलीलाओं में श्रीहनुमान बनने वाले पात्र अपने को बहुत गौरवान्वित मानते हैं।

वीरभाव में श्रीहनुमानजी की पूजा-परम्परा आज तक व्यापक रूप में विद्यमान है। राक्षसों के संहारक, असम्भव कार्यों को भी पूरा करने की सामथ्र्यवाले, नैष्ठिक श्रीराम-भक्त श्रीहनुमान को भारतीय देवमण्डल में प्रमुख स्थान प्रदान किया गया। भीषण संकटों से भी त्राण प्रदान करने वाला उनका वीर रूप जन-मानस को विशेष मान्य हुआ। इसी कारण भातीय संस्कृति के प्रवल रक्षक के रूप में आदृत हुए। श्री हनुमान जी महाराज को मेरा दण्डवत् प्रणाम।

लेखक-अनिल यादव।

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