यदि हमने अपने आपको भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया तो फिर आपका अधिकार स्वयं आपके पास नहीं रह जाता। जैसे दान के बाद पैसा, अन्न, द्रव्य, वस्तु आदि आपकी नहीं रह जाती। अब आपके ऊपर सिर्फ भगवान का अधिकार है। यानि जैसी प्रभु की आज्ञा हो वैसा ही करना चाहिये।
एक समय की बात है महाप्रभु वल्लभाचार्य के यहाँ भगवान के राजभोग के लिये अभाव हो गया। यह बात सुनकर महाप्रभु आश्चर्यचकित हो गये कि भगवद्-विग्रह के राजभोग के लिये द्रव्य (भोग) का अभाव हो चला है।
महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य ने तुरन्त आदेश दिया कि ‘सोने की कटोरी गिरवी रख दी जाय’। महाप्रभु के  आदेश का तुरंत पालन हुआ। भगवान् श्रीनाथजी के समक्ष राजभोग प्रस्तुत किया गया, पर महाप्रभु के भक्तों ने इस बात की बड़ी चिन्ता प्रकट की कि आचार्य ने स्वयं प्रसाद नहीं ग्रहण किया। केवल इतना ही नहीं- महाप्रभु ने दो दिन तक उपवास भी किया, अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वैष्णवों ने कारण पूछने का साहस नहीं किया।
दो दिनों के बाद द्रव्य आने पर उन्होंने प्रसाद स्वीकार किया। वैष्णवों द्वारा कारण पूछने पर आचार्य ने कहा कि ‘सोने की कटोरी पहले से ही भगवत्सेवा में अर्पित थी; उस पर भगवान् का ही अधिकार था; उसके बदले में लाया गया भोग भगवान् तो ग्रहण कर सकते हैं, पर उनके इस भोग का प्रसाद लेना मेरेे लिये महापातक था।’ आचार्य ने व्यवस्थ कर दी कि मेरे वंश में या मेरा कहलाकर जो कोई भगवद्द्रव्य (महाप्रसाद) का उपयोग करेगा उसका नाश हो जायगा।
सारांस यही है कि समर्पण की मर्यादा अवश्य होनी चाहिये।
जय सियाराम जय हनुमान।
लेखक-अनिल यदव।

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