sadguru nritya gopal das ji maharaj

श्री महाराज जी की आयु जब तीन वर्ष की हो गयी थी तब उनका कणवेध संस्कार सम्पन्न हुआ था। श्रीगणेशाम्बिका आदि के पूजन के पश्चात् बालक नृत्यगोपाल को वस्त्राभूषणों से सुशोभित कर उन्हें कम्बल पर पूर्वाभिमुख बैठा दिया गया। तदनन्तर पुत्र के हाथ में भोजनार्थ कुछ मिष्ठान देकर ‘ऊँ भद्रं कर्णेभिः।’ इस मन्त्र का उच्चारण करके बालक के दाहिने कान का और ‘ऊँ वक्ष्यन्ती वेदागनी गन्ति।’ इस मन्त्र का उच्चारण करके बायें कान का अभिमन्त्रण किया गया। उसके बाद सूत के डोरे सहित सुवर्ण की बनी हुई सूई से एक सुलक्षणा सधवा के द्वारा पुत्र के कानों में छिद्र करा दिया गये। पुत्र थोड़ा-सा रोकर चुप हो गया। तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दक्षिणा देकर आवाहित देवताओं का विर्सजन किया गया।

‘श्रीरामनाम’’ महिमा। ‘श्रीरामनाम से महापूरण।’

कर्णवेध-संस्कार का महत्व- ‘कर्णवेधं प्रशंसन्ति पुष्ट्यायुः श्रीविवृद्धये।’ (गर्गः) अर्थात् दीर्घायु और श्री की वृद्धि के लिये कर्णवेध-संस्कार की शास्त्रों में विशेष प्रशंसा की गयी है। कर्णवेध-संस्कार को यथा समय करने से बालकों को नपुंसकत्व (सही तरीके से सहवास न कर पाना) और बालिकाओं को बन्ध्यत्व (विवाह के दो वर्ष तक यदि गर्भधारण न हो तो बन्ध्यत्व दोष मान लिया जाता है) दोष नहीं होता। कर्णवेध से अन्त्रवृद्धि (हार्निया) का निवारण शक्य है। इसी प्रकार इस संस्कार से उन्माद, मृगी और मानसिक रोगों की उत्पत्ति भी नहीं होती।

सारांस यही है कि माता-पिता को अपने बालक-बालिकाओं के समस्त संस्कार समय से किये जाने अति आवश्यक है जिससे बड़े होने पर किसी प्रकार की कोई समस्या से न घिरें और उनका भविष्य उज्जवल हो सके।

जय सियाराम, जय हनुमान, जय गुरूदेव।

लेखक- अनिल यादव।

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