niritya gopal das ji maharaj

संस्कार शब्द का अर्थ होता है दोषों का परिमार्जन करना। संस्कार का प्रमुख उद्देश्य यह है कि जीवात्मा के दोषों और अभावों को दूर कर उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इस पुरूषार्थ-चतुष्टक की प्राप्ति के योग्य बनाना ही है। जैसे आँवला के चूर्ण में आँवला के रस की भावना देने से वह कई गुना शक्तिशाली बन जाता है, ऐसे ही संस्कारों के प्रभाव के सम्बन्ध में ही समझना चाहिये।

शिक्षण का उद्देश्य सुसंस्कृत होना है। भारतीय मनीषियों ने संस्कारों को बहुत अधिक महत्व दिया है। उन संस्कारों का अध्यन बाल्यावस्था से होना प्रारम्भ होता है और उस समय के वे संस्कार सारे जीवन को प्रभावित करते रहते हैं। जन्म से मृत्यु-पर्यन्त सोलह संस्कारों द्वारा मानव को सुसंस्कृत करने का उल्लेख हमारे ऋषि प्रणीत ग्रन्थों में है। यथा-‘जातूकण्र्यः’ में कहा गया है-

आधानपंुससीमन्तजात नामान्न चैलकाः।
मैजिंजीतानि गोदान समावर्तविवाहकाः।
अन्त्यं चैतानि कर्माणि प्रोच्यन्ते षोडशेन वै।

संस्कार वास्तव में मानव-जीवन की सीढ़ियाँ हैं। खान से निकले हुए रत्नों पर काई की परतें जमीं रहती हैं, जिनमंे उनकी चमक छिपी रहती है। जब शाण पर रखकर वे खरादे जाते हैं, जब उनकी वह चमक निखर उठती है। उसी तरह मानव-शिशु में भी गर्भ एवं वीर्य सम्बन्धी तथा प्रक्तन कर्मजनित मलिनता आदि दोष विद्यमान रहते हैं। संस्कार उन दोषों को दूर करके उसकी चमक को निखार देते हैं।

जीवन के उषःकाल रूपी ‘बाल्य’ अवस्था का अधिक महत्व है। बचपन में जो संस्कार प्राप्त होते हैं, वे ही जीवन के अन्त तक बने रहते हैं। बालक ही राष्ट्र की भावी बुनियाद हैं, आधारस्तम्भ हैं। उनके विकृत हो जाने से सम्पूर्ण राष्ट्र विकृत एवं निकम्मा बन जाता है। अतएव उनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाकर, उन्हें सुशिक्षित, विचारवान्, चरित्रवान, बलवान् और नीतिज्ञ बनाकर ही राष्ट्र को समृद्धि-सम्पन्न बनाया जा सकता है।

सारांस प्रत्येक माता पिता को अपने पुत्र/पुत्री को बाल्यकाल में संस्कार दिया जाना अति आवश्यक है। भगवान की लीलाओं को सुनाना अति आवश्यक हैं। वह आगे राष्ट्र का गौरव जरूर बन जायेगा।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक- अनिल यादव।

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