mahant shri nritya gopal das ji maharaj

निष्क्रमण-संस्कार-जब महाराज जी लगभग चार महीने के हो गये थे तब उनके निष्क्रमण संस्कार को सम्पन्न कराने के लिए उनका स्नान कराया गया। माता ने भी स्नान किया। उसके पश्चात् बालक को सुन्दर नूतन वस्ताभूषण पहनाकर माताश्री ने उन्हें अपनी गोद में लिया। फिर पिताश्री ने बालक को उनकी माँ की गोद से अपनी गोद मंे लिया और शुभ मुहूर्त में उन्हें निकाल कर ‘ऊँ तच्चक्षुर्देवहितम्।’ मन्त्र का उच्चारण करते हुए उन्हें भगवान श्री सूर्यनारायण के दर्शन कराए। तत्पश्चात् पिताश्री ने करहला ग्राम के स्थानीय प्रभुख देवमन्दिर में बालक को ले जाकर देवदर्शन कराकर साष्टांग प्रणाम कराया। फिर वे अपने घर वापस आकर सौभाग्यवती स्त्रियों के द्वारा आरती कराकर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराये, दक्षिणा दिये तथा उनसे आशीर्वाद लिये। उसी दिन रात्रि की शुभवेला में पिताश्री ने ‘चन्द्रार्कयोर्दिगीशानम्’ इस पौराणिक श्लोक को कहते हुए बालक को श्री चन्द्रदेव भगवान का दर्शन कराए।

निष्क्रमण-संस्कार में बालक को श्रीसूर्यदेव भागवान् का सम्यक् दर्शन कराने से निश्चित ही बालक की आयु वृद्धि होती है। इस संस्कार का फल मनीषियों ने शिशु की आयु तथा लक्ष्मी की वृद्धि बतलाया।

भूम्युपवेशन-संस्कार-महाराज जी (बालक) को सर्वप्रथम भूमि पर बैठाने की क्रिया को भूम्युपसवेशन-संस्कार’ कहते हैं? जब लल्ला की उम्र पाँच मास की हो गयी तो उनके भूम्युपवेशन-संस्कार को सुसम्पन्न करने के लिये माता-पिता ने शुभ मुहूर्त में बालक के साथ स्नानादि क्रिया को सम्पन्न किया और शुभासन पर बैठे। तत्पश्चात् गणेशाम्बिका का पूजन करके बाराह, कूर्म तथा अनन्त भगवान् का एवं पृथ्वी का सविधि पूजन किया। अनन्त गोबर से लीपी हुई पवित्र भूमि पर रंग से मण्डप बनाया गया। फिर उस पर दश किलो गेहूँ की ढेरी रखकर उसी पर शिशु को मंगलगीत गाते हुए बैठा दिया गया और लाला को पकडे़ हुए ‘रक्षैनम्’ इन्त्यादि पौराणिक मन्त्र-चतुष्टय के द्वारा उनके कल्याणार्थ भूमि-माता से प्रार्थना की गयी। उसके पश्चात् सौभाग्यवती स्त्रियों के द्वारा आरती कराकर ब्राह्मणों को भोजन, दक्षिणादि से सन्तुष्ट करके, उनसे आशीर्वाद ग्रहण किया गया। उसके बाद दश किलो गेहूँ की ढेरी को माता-पिता ने अपने गुरू को दान कर दिया।

इस संस्कार को करने से बालक की जीवन-पर्यन्त सर्व प्रकार से पृथ्वी-माता रक्षा करती हैं। और उस पुरूष की मृत्यु के पश्चात् पृथ्वी देवी उसे अपनी गोद में धारण करती हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर मृत्यु होने से मनुष्य की सद्गति होती है और पृथ्वी के अतिरिक्त पलंग आदि पर मृत्यु होने से उसकी असद्गति होती है। दुर्भाग्यवश जो लोग उक्त संस्कार के तत्वको न समझकर बालक के इस संस्कार को सम्पन्न नहीं करते हैं, वे पृथ्वी-माता के कोप भाजन बनते हैं। ऐसे लोग अचेतनावस्था में पलंग आदि पर ही काल कवलित हो जाते हैं। फलतः उनकी सद्गति भी नहीं हो पाती है।

सारांस माता-पिता को अपने बालक के समपूर्ण संस्कार कराने चाहिए। बालक के लिये बरदान बन जाते हैं।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक-अनिल यादव।

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