माता-पिता अपने सुपुत्र का बड़े ही लाड़-प्यार से पालन-पोषण करते थे। माताश्री अपने लाड़ले को नहलाती-धुलातीं और छोटी-सी पीली झंगुलिया पहनातीं। उनके बालों मेें फूल सजातीं, काजल का टीका देतीं, माखन-मिसरी खिलातीं। बच्चे की मधुर-मधुर मुस्कान तथा तोतली बोली सुनकर वे मन्त्र मुग्ध हो जातीं। माताश्री उन्हें कभी गोद में लेकर हिलाती-डुलातीं और कभी पालने में लिटाकर झुलाती थीं। ‘माता पुत्र पालनैं झुलावै।’ धीरे-धीरे पालना झुलाते हुए लोरियाँ सुनाने लगतीं, फिर माताश्री पुचकार कर थपकी दे-देकर उन्हें सुलातीं। माताश्री प्रिय पुत्र पर महासती मदालसा की तरह शैशवकाल में ही भगवद्-भक्ति का संस्कार डालतीं, ताकि भविष्य में लाला धर्मनिष्ठ बन सके।

बालक का सबसे प्रथम आदर्श माता है। माता यदि चाहे तो बालक को मदालसा की तरह शैशवकाल में ही ब्रह्मनिष्ठ अथवा धर्मनिष्ठ बना सकती है। मदालसा का उल्लापन (लोरी) ही तीन पुत्रों को ब्रह्मनिष्ठ बनाने में समर्थ हुआ था।

प्रात भयौ जागौ नृत्य गोपाल।’ जब लल्ला बड़ी देर तक सोया रहता था तो माताश्री उससे मीठी-मीठी सुहवनी बाते करके प्रातः काल जगा देती थीं। उसके सुन्दर मुख को धोकर कलेऊ करातीं। उसके हाथ में झुनझुनियाँ थमा देतीं। बच्चा झुनझुनियाँ के साथ खूब मचल-मचल कर खेला करता था। उसकी आवाज को सुनकर लाला खूब मुस्कराता, किलकारी भरता था। बेटे की ये सब लीलाएँ देखकर माता-पिता, भाई-बहन सब लोग अत्यन्त प्रसन्न होते थे।

बालक स्वभाव से ही प्रिय और मन की वस्तु है। उसका क्रोध, उसका रोना, उसका हँसना और उसका हठ, ये सबके सब आनन्ददायक होते हैं। उसका धूल-धूसरित शरीर, उसका नंग-धड़ंग बदन और निराली चाल-ढाल किस मनुष्य को नहीं भाती? यहाँ तक कि बालक के सम्मुख क्रूर हिंसक प्राणी भी अपनी क्रूरता और हिंसा को छोड़ देते हैं।

सारांस श्रीसदगुरूदेव भगवान के बालस्वरूप का वर्णन करना सुखद अनुभव प्रदान करता है। इस मानसिक यात्रा में अत्यधिक सुख मिलता है। प्रातः स्मरणीय सदगुरूदेव को बारम्बार साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करता हूँ।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक- अनिल यादव।

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