nritya gopal das ji maharaj

श्री महाराजश्री का स्वरूप, अनन्त कोटि ब्राह्माण्ड नायक परम पिता परमात्मा की सृष्टि का सर्वोच्च सौन्दर्य बालक का है। ब्रह्मवेत्ता महर्षियों ने बालक को ब्रह्मरूप ही माना है। बालक जगत् की शोभा है, वह प्राणी का सबसे अधिक मनोहर स्वरूप है। माता-पिता के लिए तो बालक प्यारी वस्तु है ही, अन्य मानवों के हृदय में भी वह अपने प्रति बरबस प्रेम उत्पन्न कर देता है। अन्य पशु-पक्षियों के बच्चे भी कितने प्यारे लगते हैं? बालकों की बात निराली है। उनसे मिलने वाला आनन्द हर किसी को सुलभ है। बालक की मुस्कराहट से संसार मुस्कराता है। उसकी अस्पष्ट तोतली बोली में भी अद्भुद आनन्द है। बालक प्रकृति की अनमोल देन है, सुन्दरतम कृति है, सृष्टि की अनुपम रचना है।

अब लल्ला की उम्र आठ-नौ महीने की हो चुकी है। उनके मुँह के छोटे-छोटे दाँत मोती-जैसे चमक रहे हैं। लाल-लाल ओठ है। बालक कभी तो बचपना ठान लेता है और कभी मैया की नाक पकड़ने लगता है। कभी मैया का केश नोचने लगता है, तो कभी किलकारी भरकर माँ की गोद में मचलने लगता है। कभी लाला आँगन में घुटनों और हाथों के बल बकैया चल-चलकर सबका मन मोहने लगता है, तो कभी स्वाभाविक मुस्कान से माधुर्य की वृष्टि करता हैै। उसके काले-घुंघराले बाल, उन्नत ललाट, आजानु भुजाएं, सलोना श्याम वर्ण, ये सबके सब पुरजन एवं परिजनों को आनन्दित करते हैं। माँ की ममता उसे चूमना चाहती है, तो पिता धूलधूसरित शिशु को गोद में उठाकर अपने को कृतकृत्य मानते हैं। लल्ला का मनोज्ञ रूप सर्वजन सम्मोहक तथा सौन्दर्य सुकुमारता की पराकाष्ठा है।

सारांस श्रीमहाराज जी के बालस्वरूप के मानसिक दर्शन कीजिये। और गुरूपूर्णिमा के दिन आनन्दित होकर पूजन कीजिये।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक-अनिल यादव।

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