mahant shri nritya gopal das ji maharaj

‘चूड़ाकरन कीन्ह गुरू जाई।’ जब दुलारा लड़का (श्रीमहाराजजी) लगभग एक वर्ष के हो गये थे, तब उनका विधिवत् चूड़ाकरण-संस्कार सुसम्पन्न हुआ। चूड़ाकर्म-संस्कारार्थ बालक के साथ-साथ माता पिता भी स्नानादि क्रिया से निवृत होकर कुश के आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये। तदनन्तर पूर्वाभिमुख हुए बेटे के सिर के दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में तीनों ओर केशों के तीन जूड़े बाँध दिये गये। सर्वप्रथम दाहिनी ओर के जूड़ा को ‘ऊँ सवित्रा प्रसूता’ इस मन्त्र को पढ़कर घृत और जल से बालक के केशों को भिगो दिया गया। फिर ‘ऊँ अक्षिण्वन् परिवप’ इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए पिताश्री ने नाई के हाथ में छुरा दे दिया। नाई ने बालक के कुल-परम्परानुसार शिखा रखकर सिर का मुण्डन किया। बाद में कटे हुए केशों को गोमय-पिण्ड में रखकर उसे वस्त्र लपेट कर प्रवाहयुक्त नदी यमुना जी में प्रवाहित कर दिया गया। तत्पश्चात् ब्राह्मणें को भोजन कराकर दक्षिणा दिया गया। ‘विप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।’

चूडाकरण संस्कार हिन्दुओं के लिए अनिवार्य है। यज्ञोपवीत के बिना शूद्रो का सब काम चल सकता है किन्तु शिखा के बिना उनका भी कार्य अपूर्ण ही माना जाता है अर्थात् अधूरा ही रहता है। एकमात्र शिखा ही हिन्दू की पहचान है। ध्यान रहे कि चूड़ाकरण-संस्कार में शिखा धारण की जाती है, न कि शिखा का कर्तन होता है। ‘बलायुर्वर्चोवृद्धिश्च चूडाकर्मफलं स्मृतम्।’ (स्मृति संग्रह) अर्थात् चूड़ाकरण से बल, आयु और तेज की वृद्धि होती है।

सारांस श्रीमाहाराज जी के बाल्यकाल में किये गये संस्कारों को पढ़कर आनन्दमय होते हुये अपने बालकों के समस्त संस्कार अवश्य करायें जिससे बालक का संपूर्ण ग्रोथ हो सके, और वह विश्वपटल पर अपना नाम रोशन करे।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।.

लेखक – अनिल यादव।

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