niritya gopal das ji maharaj

जब श्री महाराज जी अनुपम बालक ‘लल्ला’ थे। उनकी की आयु लगभग छः महीने की हो गयी तो ‘षष्ठे मासेऽन्नप्राशनम्।’ इस मन्त्र के अनुसार बालका का विधिवत् अन्नप्राशन-संस्कार हुआ। अन्न्प्राशन संस्कार हेतु लल्ला को स्नान कराया गया। तत्पश्चात् माता-पिता ने स्नान किया। माताश्री पुत्र को गोद में लेकर पूर्वाभिमुख कम्बल पर बैठ गयी। ‘परमान्नं तु पायसम्।’ के आधार पर पायस (खीर) को चाँदी की कटोरी में रखकर बेटा को देवता के आगे करके समन्त्रक अन्नप्राशन कराया गया। अन्नप्राशन के बाद बालक के समक्ष सद्ग्रन्थ, शास्त्र, वस्त्र, अन्न और शिल्प वस्तुएँ रख दी गयीं। शिशु ने सद्ग्रन्थ को उठा लिया, (ग्रहण कर लिया)। इसका तात्पर्य यह है कि बालक की जीविका इन सद्ग्रन्थों के माध्यम से चलेगी। इसके बाद पिताश्री ने आवाहित देवताओं का विसर्जन कर ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा दिया, फिर उन्होंने स्वयं बहुत प्रसननतापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
सारांस यह है कि, बहुत ही प्रचलित कहावत है कि, ‘लालने के पैर पालने में ही दिख जाते हैं।’ अतएव श्रीमाहाराज जी आज संसार में महानतम् सन्त हैं। हम लोग धन्य हो गये श्रीमहाराजजी का सानिध्य पाकर।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक- अनिल यादव।

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