maharaj ji

सन्तसिरोमणि अनन्तविभूषित सदगुरूदेव महन्त श्री नृत्यगोपालदास जी महाराज, सहजता, सरलता और सात्विक साधना के समन्वित स्वरूप हैं। आपके विलक्षण व्यक्तित्व की अपनी मौलिक विशेषताएँ हैं। चमत्कारिम आकर्षण से युक्त आपका अनावृत्त वहिःरंग साधना से सना हुआ, आराधना से आवृत आपका परम उदार अन्तरंग सन्तत्व का चरमोत्कर्ष है। स्वामी जी महाराज को साकेत-सन्त, कर्मयोगी, समाजसेवक, राष्ट्र-भक्त, त्याग-तपोनिष्ठ, कमशील युग-पुरूष जैसे अनेक विशेषण एक साथ निःसंकोच प्रदान किये जा सकते हैं फिर भी आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। महाराजश्री सचमुच अनुपमेय एवं अतुलनीय है। ऐसे महामानव सन्त का दर्शन करना उनका प्रवचन सुनना, उनका स्नेह सान्निध्य प्राप्त करना और कौन नहीं चाहेगा?

दशकों से श्रद्धालु स्वामी जी महाराज का जीवन-चरित्र जानने के लिये अत्यन्त आकुल और समुत्सुक हैं। प्रभु की असीम अनुकम्पा से भक्तों की भावना अब सजीव और साकार होने जा रही हैं। पूज्यपाद महाराजश्री का जीवन-चरित्र की कतिपय रश्मियाँ में अब आपके समक्ष समुपस्थित है।

व्रज क्षेत्र के कविवर ‘दुर्लभ’ जी ने, जो श्रीमहारजश्री के अग्रज भी हैं, प्रारम्भ में चार छन्दों के द्वारा स्वामी श्री महाराज के जन्म-स्थान, वंश-परिचय, व्यक्तित्व विभा पर प्रकाश डाला है।

ब्रज बरसाने की पूरब तरहटी माँहि,
‘करहला प्रदेश’ जाकी कीरति बखनिए।
जहाँ श्री वल्लभाचार्य बिट्ठलनाथ गोस्वामी,
भगवत पारन, की बैठक महा मानिए।
महात्मा घमण्डदेव सर्व प्रथम याही ठौर,
रूपक कृष्ण-लीला कियौ स्नेह सुख सानिए।
यादवन के बामन गामन वारी जहाँ गादी तहाँ,
नृत्यगोपालदास जू की जन्म भूमि जानिए।
द्वारिकाधीश आये ललिता तें मिलिबे कौं आये यहीं,
खीर खायौ मगन मन कंकन बंधायौ है।
ल्लिता के कुण्ड दोऊ नवका-बिहार कियौ,
फेरि संग झूलिबे को मन हुलसायौ है।
पस कदम खण्डी मैं महारास लीलाकरी,
बैठि बुर्जायै जिन माखन को खायौ है।
नित्य गोपाल जहाँ करहला में लीला करी,
नृत्यगोपाल तहाँ जन्म फल पायौ है।
लावानियाँ स्वामी कुन्दनलाल जी के तीन पुत्र,
नारायण, गंगादान, गोवर्धन अभिराम हैं।
श्री गंगादान जी की पूज्या रामदेई के,
पुत्र दुल्हैराम, नृत्यगोपाल जिनके नाम हैं।
‘दुर्लभ’ ने जन्म-भू करहला से अध्ययन करि,
व्यौसाय हेतु कोसी सुस्थिर कियौ ठाम है।
नृत्यगोपालदास जू अवध-धाम राम सेयौ,
छावनी की गद्दी पै महन्त निष्काम हैं।
नित्य गोपाल जाके हिरदै मैं नृत्य करैं,
साँवरे की सुषमा लुनाई तन छाई है।
माखन-मलाई की मसृणता मन माहिं बसी
राधा सुघराई मुस्कान मंजु पाई है।
नृत्य गोपाल की सरलता लखि नाचैं सबै,
साँवरी सलोनी ब्रज-छटा औध आई है।
‘दुर्लभ’ अवध कौ सीताराम-धाम सुलभ करîौ,
नृत्यगोपालदास जू को बधाई है।।

इस तरह पण्डित श्रीगंगादान जी शर्मा की धर्मपत्नी श्रीमती रामदेई जी की कोख से दो पुत्र और दो पुत्रियाँ कुल चार सन्तानें पैदा हुई, जो क्रमशः आयु भेद से इस प्रकार हैं- पं0 दुल्हैराम जी शर्मा ‘दुर्लभ’, श्रीमती यशोदा देवी, श्रीमती श्यामकला देवी और श्री नृत्यगोपाल जी। महामाता श्रीमती रामदेई जी की कोख सचमुच धन्य हो गई। गोस्वामी जी ने मानस में लिखा है-

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।
सकल सृकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।
(अभिजात शिशु का जन्म स्थान)

जन्मभूमि के सम्बन्ध में भगवान् श्रीरामजी ने इस पुण्य भूमि को भारत का स्वर्ग से भी श्रेष्ठतर मानते हुए भैया लक्ष्मण जी से कहा है-

नेयं स्वर्णपुरी लंका रोचते मम लक्ष्मणः।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।

श्रीमहाराजजी का जन्म स्थल जो बरसाने के निकट करहला गाँव में है। इसी स्थान पर ‘श्रीसदगुरूदेव सदन’ बनाया गया है।

सारांस यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि बरसाना श्रीराधारानी के दर्शन हेतु जा रहा है, तो श्रीसदगुरूदेव सदन, महाराज जी के जन्म-स्थल ग्राम करहला पहुँच कर श्री महाराज की जन्म स्थली के दर्शन लाभ प्राप्त करके अपने कोे धन्य कर सकता है।

जय सियाराम, जय हनुमान, जय गुरूदेव।

लेखक- अनिल यादव।

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