श्रीगुरूदेव भगवान जिनका चित्त अपार संवित्सुख सागर परब्रह्म परमात्मा में लीन है, ऐसे भगवद्भक्त श्रीवैष्णव के जन्म से उनका कुल तो पवित्र हो ही गया हम लोगों के जीवन का उद्धार हो गया है। श्रीमहाराज जी की माता भी कृतकृत्य हो गयी है। और ऐसे स्थान की पृथ्वी पवित्र हो जाती है। महामाता रादेई पर यह उक्ति पूर्णतया चरितार्थ होती है।
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपरा संवित्सुखसागरेऽस्मिन्, लीनं परे ब्रह्माणि यस्यचेतः।
जहाँ सन्तों के चरण टिकते हैं, वहाँ की माटी पावन हो जाती है। उनके श्रीचरणकमलों से स्पर्श की हुई चरण-धूलि स्वयं पवित्र होकर दूसरों को तारने वाली बन जाती है। ऐसे सन्त जिस देश में जन्म लेते हैं और जहाँ पर अपना शरीर शान्त करते हैं, वे देश तीर्थ बन जाते हैं।
श्री गोवर्धननाथ, गिरिधारी भगवान् की अहैतु कृपा एवं शुभाशीर्वाद से श्रीमहाराज जी सम्वत् 1994 शाकः 1860 मासोत्मे ज्येष्ठमास कृष्ण पक्षे चतुर्दश्याम् 14 तिथौ शनिवासरे घटी 51 पलानि 21, अनुराध नक्षत्रे घ0 58 प037 सिद्धियोगे घ0 40।। 00 सूर्योदयादिष्टम् घ0 20।। 37।। 30 सूर्य 1।। 26 लग्न 5।। 16 अँगरेजी दिनांक 11 जून, 1938 ई0 अपराह्न 1।। 45 मि0 की शुभ वेला में परम
भक्त पण्डित श्रीगंगादान जी शर्मा की धर्मपत्नी भक्तिमयी परम सौभग्यशालिनी देवी श्रीमती रामदेई की परम पावन कोख से एक अभूतपूर्व होनहार नवजात शिशु का प्रदुर्भाव हुआ था।
सम्वत् उन्नीस सौ ऊपर चैरानबै को जेठ मास,
ग्यारह जून सनिवार सन् अड़तीस परîौ, 
घटी इक्कीस पर कन्या लग्न आई है। 
क्लि तापे जीवन को वृष कौतरनि तेज,
भक्ति सुख-सान्ति को सरस सुधा प्याई है।
नृत्य करन भूपर स्वयं गार्वित गोपाल आयौ,
‘दुर्लभ’ व्रजवासिन भयौ समै सुखदाई है।
सारासं श्रीमहाराजजी हम लोगों के सदगुरूदेव भगवान हैं। ऐसे महापुरूष का सनिध्य प्राप्त होना श्री सीतारामजी और हनुमानजी की अहैतु कृपा ही है।
जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।
लेखक-अनिल यादव।

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