nritya gopal das ji maharaj

चरित्रनायक बालक सन्त भगवान् का मंगलमय चरित्र और उनकी बाल-लीलाएँ इतनी मधुर और चित्त को आकृष्ट करने वाली हैं कि उनका श्रवण एवं कथन करने से ही हृदय में साधु-भाव उत्पन्न हो जाते हैं। सन्त भी भगवान् की तरह अपने सच्चरित्रों एवं लीलाओं के द्वारा सबको सुख देने के लिए और सबका कल्याण करने के लिये जन्म लेते हैं। सृष्टि के समस्त प्राणी लीलाधारी हैं-

‘चरित बहुत विधि कीन्ह चहै।’

इस समय तक (श्रीमहाराजजी) प्रिय लल्ला लगभग डेढ़ वर्ष के हो चुके थे। कभी माताश्री उनका हाथ पकड़कर उन्हें चलना सिखाती थीं तो वे ठुमुक-ठुमुक चलने लगते थे। कभी वे शरीर में धूल लपेटे हुए पिताश्री की गोद में बैठ जाते थे तब पिताश्री उन्हें बोलना सिखाते थे। सर्वप्रथम सीताराम, राधेश्याम इत्यादि श्रीभगवन्नामों के उच्चारा से ही बोलना सिखाते थे। वे अपने प्रिय पुत्र को उत्तम-उत्तम बातों का उपदेश देते थे। माताश्री उन्हें रामायण एवं माहाभारत की छोटी-छोटी कथाएँ सुनाती थीं। लल्ला उन कथाओं को बडे़ ध्यान से सुनते थे और समझने का प्रयत्न भी करते थे। इन कथाओं का यही महात्म्य है कि जिन बालको को माताओं ने ये कथाएँ सुनायीं होंगी, वे ही बच्चे संस्कारी होंगे। शैशव यौवन का जनक है। दूसरे शब्दों में आप यों कह सकते हैं कि आप जो बचपन में बोयेंगे वही आप जवानी में काटेंगे (पायेंगे)।

सामान्य कोटि के बच्चों से लल्ला की चाल-ढाल कुछ विलक्षण ही मालूम पड़ती थी। स्वभाव भी सीधा-सादा, सरल और शान्त प्रतीत होता था। बच्चों में चंचलता स्वाभाविक होती है। बच्चों की चंचलता कोई दुर्गुण नहीं होता। किन्तु अन्य बच्चों की अपेक्षा बालक नृत्यगोपाल में चंचलता कहीं कम थी। उनमें उद्दण्डता नाम की कोई वस्तु दिखती नहीं। हाँ, वे कुछ नटखट अवश्य थे।

लाला अपनी तोतली बोली में गुनगुनाता हुआ माताश्री के ‘श्रीसीताराम सहस्र नाम’ की पुस्तिका पर उँगलियों के माध्यम से पन्ना पलट देता था। ऐसा प्रतीत होता था कि मानों वह पाठ कर रहा हो। कभी-कभी माताश्री पूछतीं कि बेटा! इधर देखो यहाँ पर बहुत सारे चित्रपट (फोटो) रक्खे हुए हैं। बताओ, इनमें भगवान् श्रीकृष्ण का चित्र कहाँ पर है? उस पर उँगली रखकर संकेत करो और दिखलाओ। वहाँ पर देखने वाले सब यही कहते कि आश्यर्च की बात है एक नन्हा-सा बालक चूकता नहीं है। उसका हाथ बराबर भगवान् श्रीकृष्ण के चित्र पर ही टिकता है जबकि बड़े-बड़े सयाने लोग भी कभी-कभी श्रीरामलला और श्रीकृष्णलला के चित्र में भ्रम कर बैठते हैं।

लाला बचपन से ही स्वाभावतः जूठा खाना पसन्द नहीं करते थे। बचपन में जूठा खाने के अनेक प्रसंग आये किन्तु प्रत्येक बार वह कोई न कोई बहाना करके अस्वीकार कर देते। यहाँ तक कि जूठे पात्र में प्रसाद लेना, जूठे जल-पात्र में जल पीना वे अस्वीकार कर देते। बैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एक थाली या पत्तल में कई लोगों का भोजन करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। अतः छोटे बच्चों को भी जूठा भोजन नहीं कराना चाहिये।

स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात् पिताश्री जब तिलक स्वरूप करते तो लल्ला भी तिलक लगाने के लिये संकेत करते। ज्योंही पिताश्री उनके मस्तक पर तिलक लगाते, त्योंही शीशे में वे अपना सुकुमार चेहरा देखकर खूब मुस्कराते और प्रसन्न होकर कभी-कभी नाचने लगते थे।

कभी-कभार गाँव में बन्दरों के झुण्ड आ जाया करते थे। उन्हें देखकर यह बालक अत्यन्त हर्ष के साथ किलकिला उठता था। हाथ में रोटी का टुकडा लेकर अपनी ओर आकृष्ट करने के लिय इशारा करता। बन्दर कब चूकने वाले होते हैं? चुपके से आकर उस साहसी बालक के हाथों से रोटी का टुकड़ा झपटकर खा जाते, पर काटते नहीं थे। बालक के इस प्रकार साहस को देखकर परिवार के अन्य लोग घबरा जाते थे कि कहीं बन्दर बच्चे को काट न ले। ऐसा सोचकर वे लाड़ला को तत्काल गोद में उठा लेते थे।

प्रातः काल माताश्री जब दही बिलातीं तो लाला चारपायी से उतरकर आलमारी की ओर कुछ माँगने का संकेत करता। माताश्री रात की बची हुई बासी रोटी के टुकड़े पर मक्खन लपेटकर उसमें भूरा बुरक देतीं। उसे वह बालक कुतर-कुतर कर खा जाता और खकर पुनः सो जाता था। किन्तु हाँ, पिताश्री के मन्दिर जाने के पूर्व तुरन्त ही उठ जाता और तत्काल स्नान करके पिताश्री के साथ मन्दिर चला जाता था। मन्दिर में पिताश्री जब कथा-प्रवचन करते थे, उस समय बालक नृत्यगोपाल पालथी मारकर बैठ जाते और ध्यानपूर्व श्रीभगवत्कथामृत का पान किया करते। अन्य श्रोतागण इसे देखकर कहते थे कि दादा! यह बच्चा तो कोई महात्मा जान पड़ता है।

इस समय लल्ला की उम्र दो-ढाई वर्ष की हो चुकी है। बचपन से ही उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट और तन्दुरूस्त है। बोल-चाल में, खेल-कूद में, अब लाला काफी सक्षम हो चुके थे। गाय के बछड़ों को आपस में क्रीड़ा करते हुए देखकर आनन्दमग्न भाव-विभोर हो जाते थे। हरी-भरी दूबा को हाथ में लेकर उन बछड़ों को खिलाते थे। उनकी पीठ को दोनों अथेलियों से थपथपाते थे। कभी-कभी तो उनकी पूँछ पकडकर पीछे-पीछे चला करते थे। जब बछडे़ कभी पू़छ पकड़ने से दौडने लगते तो ये जमीन में गिरकर लुढ़क जाते और जोर-जोर से रोने लगते थे।

लाला भोजन करते समय अपनी छोटी थाली, छोटा गिलास और छोटी कटोरी का प्रयोग करते थे। बदल जाने पर अन्य थाली गिलास, कटोरी आदि में भोजन करना स्वीकार नहीं करते थे। बाल-हठ के सामने तो माता-पिता को झुकना पड़ता है। दूसरी बात यह है कि जब तक भोजन का सारा सामान नहीं मिल जाता तब तक लल्ला भोजन करना प्रारम्भ नहीं करते थे। वैसे तो आमतौर बच्चे चपल होते हैं। थाली उनके सामने आयी नहीं कि भोजन करना शुरू कर देते हैं। पिताश्री जिस तरह ‘पंच-कवल’ की विधि अपनाते थे ठीक उसी तरह देखा-देखी बालक नृत्यगोपाल भी करने लगते थे।

पिताश्री ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करते थे। लल्ला की भी प्रातः काल स्नान करने की आदत पड़ गयी थी, क्योंकि स्नान किये बिना पिताश्री बालक को मन्दिर नहीं ले जाते थे। कड़ाके की ठण्ड पड़ने पर भी लाला माताश्री से आग्रह करके स्नान कर लिया करते थे। इस तरह बाल्यावस्था से ही इनका भगवान् के मन्दिर जाने का नियम भंग नहीं हुआ। मन्दिर में पिताश्री झूलाविहारी श्रीद्वारकाधीश भगवान् को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया करते थे। उसी अनुरूप लाला भी श्रीभगवान् को दण्डवत् प्रणाम किया करते थे। जब पिताश्री भगवान् के सम्मुख पद्मासन लगाकर ध्यान करते तो उन्हें देखकर प्रिय पुत्र भी पालथी मोड़कर बैठ जाते और आँखें बन्द कर यथाशक्ति ध्यान करने लग जाते थे। जब पिताश्री मन्दिर में बैठकर गौमुखी में हाथ डालकर माला फेरते तो कभी-कभी लाला उनसे गौमुखी को छीन लेते और अपने हाथ को गौमुखी में डालकर माला फेरते हुए जोर-जोर से ‘सीताराम-सीताराम’ की रट लगाते अथवा कभी-कभी राधेश्याम-राधश्याम का जप करने लगते थे।

घर में जब कभी भी बाजार से फल-फूल अथवा मिष्ठान आदि खरीद कर लाया जाता तो लल्ला माताश्री की साड़ी खींचते हुए श्रीठाकुर जी को भोग लगाने के लिए इशारा करते थे। इस सब अद्भुत लक्षणों को देखकर ताऊश्री नारायण जी तथा गाँव के अन्य सभी गणमान्य पुरूष यही कहते थे कि यह कोई असाधारण होनहार बालक है। यह तो कोई महान् ऋषि-मुनि का अवतार मालूम पड़ता है।

बालक नृत्यगोपाल की भक्ति बचपन से ही श्रीहनुमान्जी महाराज में है। पिताश्री ने अपने प्रिय लाड़ले को श्रीहनुमान् चालीस का पाठ कण्ठस्थ करवा दिया था; जिसका पाठ बालक हनुमान् जी महाराज को सुनाया करत थे। श्रीहनुमान् जी महाराज के श्रीविग्रह का श्रद्धा-भक्ति पूर्वक दर्शन किया करते एवं श्री हनुमान् जी महाराज का चोला (सिन्दूर) दाहिनी आँख के ऊपर धारण कर वे अत्यन्त प्रसन्न हो जाते थे।

लल्ला घर के आँगन में तुलसी-चैरा की परिक्रमा किया करते और जब तक वे थक नहीं जाते तब तक बराबर परिक्रमा करते रहते थे। थक जाने पर वहीं भूमि पर लेट जाते। ज्यों ही थकावट दूर होती त्योंही उठकर पुनः परिक्रमा करने लगते और तुलसीदल उतार-उतार कर पिताश्री को श्रीठाकुर जी की पूजा के लिए दिया करते थे।

सारांस यदि परिवार के माता-पिता भक्त हैं और नियम पक्के हैं तो उनके बालक अवश्य ही सन्त होंगे। श्रीसीताराम जी सदैव कृपा करें। श्री हनुमानजी सदा सहाय रहें।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक -अनिल यादव।

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