gurudev

ऊँ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्य करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ।। 1।।
ऊँ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!!!
सीतानाथसमारम्भां रामानन्दार्यमध्यमाम्।
अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरूपरम्पराम्। ।। 2।।
गुरूब्र्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः। ।। 3।।
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया।
चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः। ।। 4।।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः। ।। 5।।
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मुक्तिमूलं गुरोः कृपा। ।। 6।।
चिन्तामणिर्लोकसुखं सुरद्रुः स्वर्गसम्पदम्।
प्रयच्छति गुरूः प्रीतो वैकुण्ठं योगिदुर्लभम्। ।। 7।।
नृदेहमाद्यं संुलभं सुदुर्लभं, प्लवं सुकल्पं गुरूकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा। ।। 8।।
भक्ति भक्त भगवन्त गुरू चतुर नाम बपु एक।
इनके पद वन्दन किये नासै विध्न अनेक। ।। 9।।

अर्थात् हे परब्रह्म परमात्मन्! (आप) हम दोनों (गुरू-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें; हम दोनों का साथ पालन करें। हम दोनों साथ-साथ ही शक्ति प्राप्त करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजोमयी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।। 1।। (कठोपनिषत्)

भगवान् सीतापति श्रीराम से प्रारम्भ होने वाली, भगवत्पाद श्रीरामानन्दाचार्य जिसके बीच में हैं अपने आचार्यपर्यन्त आने वाली गुरूपरम्परा की मैं वन्दना करता हूँ।। 2।।

श्रीगुरू ही ब्रह्मा हैं, श्रीगुरू ही विष्णु हैं, श्रीगुरू ही महेश हैं और श्रीगुरू ही परब्रह्म हैं, उन श्रीगुरूदेव को प्रणाम है।। 3।। (गुरू गीता-58)

अज्ञान रूपी अन्धकार-रोग से ग्रस्त मनुष्य के नेत्र को जो ज्ञान रूपी अन्जनशलाका से खोलते हैं, उन श्रीगुरूदेव को प्रणाम हैं।। 4।।

अखण्ड मण्डल के आकार वाला चराचर जगत् जिससे व्याप्त है, उस परमात्मा के धाम को दिखने वाले श्रीगुरूदेव को प्रणाम है।। 5।।

गुरू की मूर्ति ध्यान का मूल है, गुरू-पद पूजा का मूल है, गुरू-वाक्य मन्त्र-मूल है और गुरू-कृपा मुक्ति का मूल है।। 6।।

चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक से अधिक स्वर्गीय सम्पत्ति दे सकता है; परन्तु श्रीगुरूदेव प्रसन्न होकर भगवान् का योगिदुर्लभ नित्य वैकुण्ठ धाम दे सकते हैं।। 7।। (श्रीमद भागवत )

यह मनुष्य शरीर समस्त शुभ फलों की प्राप्ति का मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होने पर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसार सागर से पार जाने के लिए यह एक सुदृढ़ नौका है। शरण-ग्रहणमात्र से ही श्रीगुरूदेव इसके केवट (मल्लाह) बनकर पतवार का संचालन करने लगते हैं और स्मरण मात्र से ही मैं (परमात्मा) अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होने पर भी जो इस शरीर के द्वारा संसार-सागर से पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपनी आत्मा का हनन (अधःपतन) कर रहा है।। 8।।

भक्त, भक्ति, भगवान् और गुरू, ये अलग-अलग चार नाम और चार शरीर हैं; परन्तु वास्तव में इनका महात्म्य एक ही है। इनके श्रीचरण-कमलों की वन्दना करने से सम्पूर्ण विघ्नों का पूर्णरूपेण नाश हो जाता है।। 9।। (भक्तमाल)

सारांस सच्चे मन से सदगुरूदेव के चरणों में शरणागति ही प्रभु प्राप्ति है इसलिये नित्य सदगुरू वन्दना करना चाहिये।

श्री सदगुरूदेव भगवान के चरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम। जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक अनिल यादव।

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