lord ram

(1)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!

भगवान कहते हैं, प्यारे! मुझमंे सम्भव-असम्भव की कुछ भी कल्पना न कर। मैं कमल-नाल से हाथी बाँध सकता हूँ, गौ के खुर के बराबर की जगह में पर्वत डुबा सकता हूँ। मेरी गति का निर्णय कर सके, ऐसी शक्ति किसी में भी नहीं है। तू देह-चिन्ता-सबका त्याग कर। मैंने उसकी व्यवस्था कर दी है। पुकार, मुझे पुकार, तेरी सब ज्वालाएँ दूर होंगी। डर मत, डर मत, डर मत प्राणीं!
 
 
तू नाम ले-जब तक स्थिर नहीं हो पाता, तब तक नाम ले। तेरे पैरों के नीचे से पृथ्वी खिसक जाय, सिर पर आकाश टूट पडे़ अथवा तेरा सर्वनाश ही क्यों न हो जाय, तू किसी ओर न देखकर दिन-रात नाम ले। तू यह निश्चित जान तू मेरी गोद में है, मैं तुझे छाती से लगाकर तेरी रक्षा कर रहा हूँ। नाम ले-नाम ले।
 
 
सर्वे नश्यन्ति ब्रह्माण्डे प्रभवन्ति पुनः पुनः।
न मे भक्ताः प्रणश्यन्ति निःशंकाश्च निरापदः।।
 
 
डर किस बात का! मेरा भक्त कभी भी नष्ट नहीं होता। सब कुछ चला जायगा, पर मेरा भक्त निःशंक एवं निरापद बना रहेगा। डर मत!
 
 
(2)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
मैं सत्य कह रहा हूँ-जो मेरा नाम लेते हैं, चाहे वह (पाषाण-काष्ठसदृश) कठोर हृदय वाला लकड़ी जैसा दिखने वाला ही क्यों न हो, मैं उन्हें मृत्युकाल में अभीष्ट प्रदान करता हूँ। नाम ले मेरा बिना रूके नाम ले- मैं सब भार ग्रहण करूँगा। तू एकदम निश्चिन्त हो जायगा। आ, संतप्त, तृषित, भोगलुब्ध! दौड़ आ, आ।
 
 
रोग-शोक-यन्त्रणा से व्याकुल, आ! बालक, बृद्ध, युवक, युवती-सब आओ, आओ। पापी-पुण्यवान् ब्राह्मण-चाण्डाल! आओ, आओ। मूर्ख-ज्ञानी, धनवान, निर्धन-सब मेरा नाम लो, नाम लो, नाम लो। तुम्हारे सब दुःख दूर होंगे, तुम सब आनन्द-सागर में डूब जाओगे।
 
 
नस-नस रक्त-प्रवाह में होय नाम-धुनि नित्य। 
राम-नाम अंकित रहें अस्थि-अस्थिमें सत्य।।
 
 
‘नस-नस में रक्तप्रवाह के साथ नाम-ध्वनि संचार करे। हड्डी-हड्डी में राम-नाम-महावाणी अंकित हो जाय।’
जितना ले सकते हो, नाम लो; जितना सुन सकते हो, नाम सुनो; मेरा चैतन्यमय नाम सुनना, लेना व्यर्थ नहीं जाता; जितना नाम उतना ही आनन्द!
 
 
श्रद्धया हेलया नाम रटन्ति मम जन्तवः
तेषां नाम सदा पार्थ वर्तते हृदये मम।।
 
 
‘हे पार्थ। श्रद्धा या अवहेलना से जो मेरा नाम रटते हैं; उन मनुष्यों के नाम मेरे हृदय में सदा वर्तमान रहते है।’
 
 
येन केन प्रकारेण नाममात्रस्य जल्पकाः।
श्रमं विनैव गच्छन्ति परे धाग्नि समादरात्।।
 
 
‘जिस-किसी भी तरह केवल नाममात्र का जप करने वाले बिना ही श्रम के बड़े आदर के साथ परमधाम को चले जाते है।’
अरे प्रियतम! मेरा नाम ले, निर्भय हो जायगा। डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(3)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
ओ प्रियतम! रोग-शोक-अभाव में रात-दिन जल रहा है? केवल रो रहा है? अब मत रो! मेरा नाम ले। तेरे सब दुःख दूर होंगे। संशय मत कर, चाहे भक्ति-श्रद्धा न हो, अविराम नाम लेने से तू कृतार्थ हो जायगा।
 
 
तन्नास्ति कर्मजं लोके वाग्जं मानसमेव वा।
यन्न क्षपयते पापं कलौ गोविन्दकीर्तनम्।।
 
 
‘संसार में ऐसा कोई मन-वचन-कर्मजनित पाप नहीं, जो कलियुग में मेरे नाम-कीर्तन से नष्ट न हो जाय; नाम ले, नाम ले!’
उठते-बैठते, खाते-सोते, सुख में, दुःख में, अभाव में, भाव में, बाहुल्य में, उपेक्षा से, श्रद्धा से, भक्ति से, अभक्ति से, कोलाहल में, एकान्त में, स्वप्न में, जागरण में मेरा नाम ले। मैं प्रतिज्ञा करके कह रहा हूँ-तेरा सब भार मैंने ग्रहण कर लिया। तुझे कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं। मेरा प्रेम प्राप्त कर; तू सदा के लिये निश्चिन्त हो जायगा, तू नाममय हो जायगा। तेरी सात पीढ़ियाँ जो आयेंगी उनका उद्धार हो जायगा।
 
 
तस्मान्नामानि कौन्तेय भजस्व दृढमानसः।
नामयुक्तः प्रियोऽस्माकं नामयुक्तो भवार्जुन।।
(आदिपुराण)
 
‘अर्जुन! अतएव तू दृढ़चित्तसे नाम-भजन कर; नामयुक्त, मेरे प्रिय! तू नामयुक्त हो। अरे, कलियुगमें मैं नामरूप से आया हूँ।’
नाम ले, नाम ले। डर मत, डर मत, डर मत।
 
 
(4)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे भक्त! तुझे कोई भय नहीं, तू केवल मेरा नाम जप। मैं भयका भय, भीषणका भीषण, सब विपत्तियों का नाश करने वाला सदा तेरी विपत्तियों का नाश करता हूँ और ‘मैं तेरा’-कहकर जो मेरी शरण में आता है, उसे अभयदान करना मेरा व्रत है। आकाश टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े, प्रलयकी अग्नि जल उठे, साथ ही कोटि वज्रपात होने लगें, भयंकर महाझंझावात से विश्व-ब्रह्माण्ड काँप उठें, सातों समुद्र उमड़ पडें़; तथापि, तथापि, रे प्रियतम! डर नहीं। मैं तुझे छाती से लगा कर तेरी रक्षा कर रहा हूँ। यह बात मत भूल-‘मैं हूँ तेरा, अरे मैं हूँ तेरा, अरे मैं हूँ तेरा।’ डर मत।
 
 
अरे तापित, तृषित, क्षुभित, श्रान्त, क्लान्त, आत्म-विस्मृत संतान! स्ंासार-स्वप्न देखकर और हाहाकार न कर। संसार केवल स्वप्न है। सत्य केवल-एकमात्र मैं हूँ। मेरा नाम ले। नामानन्द-सागर में डूबकर तू भी नाममय हो जा। अरे! मेरे सिवा जगत्में कुछ है ही नहीं। पूर्ण में पूर्ण का प्रकाश, शान्त में शान्त का अवस्थान, आकाश में आकाश का उदय-मुझमें मैं ही हूँ। नाम लेते-लेते आँखों के जलसे आँखें धो डाल और एक बार देख, जगत् आनन्दमय हो उठा है!
 
 
ब्रह्माण्डानि विनश्यन्ति देवा इन्द्रादयस्तथा।
कल्याणभक्तियुक्तश्च मद्भक्तो न प्रणश्यति।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण)
 
 
‘समस्त ब्रह्माण्ड तथा इन्द्रादि देवगण विनष्ट होते हैं, कल्याणभक्तियुक्त मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।’
 
 
सत्वशुद्धिकरं नाम नाम ज्ञानपप्रदं स्मृतम्।
मुमुक्षूणां मुक्तिप्रदं कामिनां सर्वकामदम्।।
(सात्वत-तन्त्र)
 
 
‘नाम अन्तःकरणकी शुद्धि करता है, नाम ज्ञान प्रदान करता है। नाम मुमुक्षुको मुक्ति-नामसे मुक्ति चाहनेवालों को मुक्ति और कामनावालों को समस्त काम्य वस्तुओं का दान करता है।’
 
 
नाम ही परम तीर्थ है, नाम ही पुण्यप्रद क्षेत्र है; नाम ही परम देव है, नाम ही परम क्रिया है; नाम ही परम धर्म है, नाम ही अर्थ है; नाम ही भक्त का काम है, नाम ही परम गति है; नाम ही परम जाप्य है और नाम सर्वश्रेष्ठ है।
 
 
अरे प्रियतम! नाम लेने से तुझे वर्तमान एवं परकालकी कोई भी चिन्ता नहीं करनी होगी। मैं तेरा मृत्यु-संसार-सागर से उद्धार करूँगा। डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(5)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे प्रियतम! तू क्यों डरता है? अविराम नाम ले, तुझे कोई चिन्ता नहीं। मेरे ही डरसे अग्नि प्रज्वलित होती है, सूर्य ताप देता है; इन्द्र, वायु, मृत्यु अपना-अपना कार्य करते हैं। मेरे शरणागत भक्त की छाया स्पर्श करने की शक्ति किसी में भी नहीं है। अधिक क्या, नित्यदेहधारी भक्तको मैं भी नाश नहीं कर पाता। मेरा सुदर्शन चक्र भक्तकी सर्वदा रक्षा करता है। कोई बात न सुन; किसी के लिये मत सोच; निर्भय होकर उच्च कण्ठसे नाम ले। कलियुगमें मैं नामरूप से आया हूँ। नाम ले। तेरा सब भार मैंने ले लिया। डर मत, डर मत, डर मत! 
 
 
(6)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे प्रियतम! मैं तुझे कितना प्यार करता हूँ? तेरी आकांक्षा पूर्ण करके तुझे निराकांक्षी बनाने के लिये तू जो चाहता है, मैं वही बनकर तेरे पास आता हूँ। तूने कामिनी की चाह की, मैं नारी बनकर आ गया। ये सब तुच्छ कामनाएँ करके तू जन्म-जन्मान्तर केवल रोता है इसीलिये तो पुकार रहा हूँ, अरे लौट आ! लौट आ, अमृतसंतान! जड़ देह की ममता त्यागकर अपने सच्चिदानन्दमय आत्मस्वरूपमें लौट आ। कैसे लौटेगा? नाम-कीर्तन करते-करते। 
 
 
नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः।
पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वान्नामनामिनोः।।
(पद्यमपुराण)
 
 
‘नाम ही चिन्तामणिस्वरूप चैतन्यरसविग्रह, पूर्ण शुद्ध, नित्यमुक्त स्वयं कृष्ण है; क्योंकि नाम और नामी में भेद नहीं।’ समझा? मुझमें और मेरे नाम में भेद नहीं; नाम का आश्रय लेना और मुझे प्राप्त करना एक ही बात है।
 
 
केवल नाम ले; तेरे रोग, शोक, दुःख, ज्वाला, अभाव-कुछ भी नहीं रहेगा। तू परमानन्दमय हो जायगा। मेरा पुण्य-नाम-संकीर्तन महापातक का नाश करता है, कामी को सर्वकाम और भक्त को प्रेम प्रदान करता है।
 
 
जो अनन्य-गतिहीन, भोगी, परद्रोही, ज्ञान-वैराग्य-विहीन ब्रह्मचर्यादिवर्जित और समस्त धर्माचारशून्य हैं, वे एकमात्र मेरे नामके द्वारा जिस गति को पाते हैं, उस गति को सभी धार्मिकगण नहीं पाते। अरे प्रियतम! तू बड़ा ही मीठा नाम लेता है, मुझे बड़ा अच्छा लगता है; इसीलिये मैं तेरे पास रहता हूँ और कहता हूँ-नाम ले, नाम ले।
 
 
अरे निश्ंिचत मन से उच्च कण्ठ से नाम ले। 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(7)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
प्रियतम! ओ मेरे प्रियतम! तेरे सब दुःख दूर करने के लिये मैं नाम-रूप में आया हूँ। नाम ले, तुझे अब कोई चिन्ता नहीं करनी पडे़गी। मैं तेरे भीतर-बाहर आनन्द और प्रकाश भर दूँगा। मेरे सरस स्पर्श से अनुक्षण तू पुलकित रहेगा। तेरी आँखें दूसरे जगत् नहीं देखेेंगी। केवल देखेंगी आनन्दमय मुझको।
 
 
मैं सत्य कह रहा हूँ मेरा नाम मृत्यु-संजीवन है।
न भयं यमदूतानां न भयं रौरवादिकम्।
न भयं प्रेतराजस्य गोविन्देति च जल्पनात्।।
 
 
‘नाम-कीर्तन से यमदूतों का भय, रौरवादि नरक का भय, यमदण्ड का भय नहीं रहेगा।’ नाम ले, केवल नाम ले; नाम-कीर्तन ही परम ज्ञान, परम तपस्या और परम तत्व है। कोटि जन्म की साधना द्वारा प्राप्त परम् पद भी नाम-कीर्तनकारी अनायास ही पाता है।
 
 
वह देख, सारे जगत् में दुःख की आग धू-धू करके जल उठी है। आ! आ! तू अब देर मत कर। नामामृत-सागर में डुबकी लगाकर निर्भय होकर परमानन्द से मेरे हृदयमें सदा के लिये विराज।
डर मर, डर मत, डर मत!
 
 
(8)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे अपने को भूलने वाले मेरे आनन्द के लाल! तू पागल की तरह कहाँ दौड़ रहा है? लौट आ, लौट आ-अपने आनन्द-साम्राज्य में! यहाँ रोग, शोक, दुःख, ज्वाला, यन्त्रणा, अभाव कुछ भी नहीं है। है केवल आनन्द, परमानन्द । लौटने का उपाय भी अति सहज, सरल, सुगम-केवल नाम-कीर्तन। नाम-रूपी मुझमें अनन्य भाव से आश्रय ले। फिर तुझे कुछ भी चिन्ता नहीं करनी पडे़गी! मैं सब कर दूँगा। और देख, नाम में भक्ति श्रद्धा की अपेक्षा नहीं है। जिस-किसी प्रकार मेरा नाम-श्रवण या कीर्तन करने से तू कृतार्थ होगा। 
 
 
सदाचारी का क्या कहना, दुराचारी भी मेरे नाम-भजन से सालोक्य मुक्ति प्राप्त करता है।
 
 
मदुक्तं सत्यमेतक्तु वाक्यं मे श्रृणुताधुना।
सकृदुच्चार्य मन्नाम मे तुल्यो जायते नरः।।
 
 
‘वर्तमान में मेरा यह सत्य-वाक्य श्रवण कर-मानव, एक बार मेरा नाम लेने से ही मेरे तुल्य हो जाता है।’
नाम-कल्पतरू-मूल से भोग-मोक्ष-जो भी चाहता है, उसे मिलता है। सतत मेरे नाम-कीर्तन से भक्त मुझमें ही लीन हो जाता है। नाम ही मैं, मैं ही नाम हूँ।
 
 
इस कलिकाल में नाम-संकीर्तन ही प्रेमलाभ करने का परम उपाय है। आ, आ! रे तापित, तृषित, क्षुभित अमृत संतान! नाम लेते-लेते मृत्युलोक के उस पार आ। प्रेमभक्ति लाभ करके मेरा हो जा।
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(9)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
इसी से तो पुकार रहा हूँ-प्रियतम! त्रिताप की ज्वाला से बहुत जल रहा है! जन्म-जन्मान्तर रोते-रोते शेष हो गया! इसीलिये बुला रहा हूँ-आ, आ, आ रे अनन्त केे लाल! मेरे हृदय में आ जा; नाम ले। नित्य नूतन विभीषिका देखकर सिहर उठा है? न, न, डरना नहीं।
 
 
जगतः प्रलये प्राप्ते नष्टे च कमलोभ्दवे।
मभदक्ता नैव नश्यन्ति स्वेच्छाविग्रहधारिणः।।
(सौरपुराण) 
 
 
‘जगत् के प्रलय होने पर, ब्रह्मा के नाश होने पर भी, मुझ लीला-विग्रहधारी के भक्त नष्ट नहीं होते।’
नाम और मैं भिन्न नहीं हैं। नाम लेना और मेरे साथ-साथ विचरण करना एक ही बात है। अविराम नाम ले। रोग, शोक, दुःख, दैन्य-सब आनन्द-रूप धारण करके तेरे पास नाचते रहेंगे। तू आनन्द के महाप्लावन से नश्वर विश्व में निश्चिन्त हो जायगा। तू सर्वत्र मुझको आनन्दमय ही देखेगां।
 
 
सहज, सरल, सुगम पथ है-नाम-संकीर्तन। मेरे नाम की प्रभा वेद-वेदान्त की पारगामिनी है। जो सर्वदा नाम लेते हैं, वे त्रिजगत् में पूज्य होते हैं। उनकी कृपा से भी कितने पापी-तापीगण का उद्धार हो जाता है।
 
 
अब और अवहेलना न कर; समय जा रहा हैै। नाम ले, अखण्ड नाम लेने का अभ्यास कर। जब तक एक शब्द भी उच्चारण करने की शक्ति रहे, तब तक नाम लेना मत छोड़। शुचि-अशुचि-कुछ भी देखने की जरूरत नहीं हैै। भक्ति-श्रद्धा हो, न हो, प्रतिक्षण नाम ले। नाम से ही प्रेम लाभ होगा। नाम-जप के द्वारा ही मेरा तुझे साक्षात् प्राप्त होगा। नाम ले, नाम ले, नाम ले।
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(10)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे आनन्द के लाल! तुझे कोई भय नहीं है। अविराम नाम ले, सब दुःख दूर होंगे। मेरे भक्तों को कहीं भी भय नहीं रहता। उन लोगों को जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि का भय भी नहीं रहता।
 
 
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या अन्य जाति के लोग भी भक्ति के द्वारा पवित्र होकर परम पद प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। भक्त मेरे प्राण का भी प्राण, मन का मन, सर्वस्व का सर्वस्व है। प्राण से प्रियतर! तू अनुक्षण नाम लेकर दुर्लभ प्रेमभक्ति प्राप्त करके कृतार्थ होगा। 
 
 
नाहं वेदैर्न तपसा नेज्यया नापि तीर्थतः।
संतुश्यामि द्विजश्रेष्ठ यथ नाम्रां प्रकीर्तनात्।।
गनेन गुणनाम्नोमें मयि सायुज्यमाप्नुयात्।।
 
 
‘मेरा नाम-संकीर्तन करने से मैं जैसा संतुष्ट होता हूँ, वैसा निखिल वेदाध्ययन, तपस्या तथा यज्ञ-तीर्थादि द्वारा संतुष्ट नहीं होता। नाम-गुण-कीर्तन के द्वारा भक्त मेरा सायुज्य-(मेरे साथ अभेदभाव) प्राप्त करता है।’
 
 
साधुओं के परित्राण, दुष्कृतकारियों के विनाश एवं धर्म की संस्थापना के लिये ही मैं नाम-रूप में अवतीर्ण हुआ हूँ। नाम ही मैं, मैं ही नाम हूँ। नाम और मुझमें कोई भिन्नता नहीं है। नाम ले, केवल नाम ले। ऐसा करने से व्यक्त-तेरे इष्ट रूप में; अव्यक्त-जगद्रूप में एकमात्र मैं ही हूँ। यह प्रत्यक्ष कर सकेगा। मेरे नाम का स्मरण, कीर्तन, श्रवण, लिखन, दर्शन किंवा धारण करने से मैं अखिल इष्ट दान कर देता हूँ।
 
 
आओ, आओ, अरे पथभ्रान्त, श्रान्त, क्लान्त पथिको! आओ, आओ; अरे रोगी, शोकी, पापी, तापी! आओ, आओ, मूर्ख-विद्वान्, ब्राह्मण-चाण्डाल! आओ, आओ, बालक-वृद्ध, युवक-युवती-सब मेरे नाम की शान्त शीतल छाया में दौड़कर चले आओ। तुम लोगों की सारी व्यथा दूर कर मैं तुम्हें हृदय में रखूँगा। निद्र में, स्वप्न-जागरण में, जन्म-मरण में, मेरी गोद में तुम परमानन्द से खेलोगे। नाम लो, नाम लो! तुम सब मत डरो, मत डरो, मत डरो!
 
 
(11)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
प्यारे! आ, आ, मेरे पास आ। देख! एक बार नहीं, युग-युगान्तर से पुकारता आ रहा हूँ- आ, आ,। उपनिषद्, रामायण, महाभारत एवं पुराण के द्वारा पुकार रहा हूँ। साधु-संत-महापुरूष के रूप में पुकार रहा हूँ। जन्म-जन्म अनुक्षण स्वयं आत्मा के आत्मारूप से पुकार रहा हूँ। आ, आ। अपना दृष्टि-भ्रम दूर करके देख तो सही-यह सारा दृश्य-जाल मैं ही हूँ।
 
 
तूने इस संसार में रोग-शोक-अभाव आदि कितने ताप भोग किये हैं। आहा पापित! आ, आ! यही तो मैं, यही तो मेरा खुला हुआ विशाल वक्ष तुझे हृदय लुकाकर तेरे सब दूर कर देगा। 
 
 
मेरे पास कोई भी ताप फटकने तक नहीं पाता। यहाँ प्राण शीतल करने वाले उजाले से सब भरा है। वेणु-वीणा, मुरज-मुरली की ध्वनि से यह स्थान नित्य मुखरित है। आकाश से सतत झरझर सुधाधार बह रही है। यहाँ का सब कुछ आनन्द से निर्मित है। यहाँ आनन्द मूर्तिमान् होकर नृत्य कर रहा है। दौड़ आ, देखते ही बनेगा। कैसे आयेगा? नाम और मैं पृथक् नहीं हूँ। जिव्हापर, श्वास में, मनमें, प्राणमें नाम रखकर नाममें डूबा रह; ऐसा करने से मेरे वक्षः स्थल पर तेरी सारी ज्वालाएँ दूर हो जायँगी। 
बहु-दर्शन से डर गया है? भय नहीं है। सभी मैं हूँ। अरे लाल! अरे प्रियतम! नाम ले, नाम ले। 
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(12)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे प्रियतम! आत्मविस्मृत संतान! अभयदान करना ही तो मेरा व्रत है। कोई भी क्यों न हो; यदि वह शरणागत है तो मैं उसे हृदय में बैठाकर अपना बना लेता हूँ। तू केवल एक बार-‘मैं तेरा हूँ‘ कहकर जीवन-मरण में निश्चिन्त हो जा।
 
 
जिस दिन गुरू बनकर मैंने नाम दिया है, उस दिन तो मैंने आत्मदान ही कर दिया। मुझे ही तो पाया था, ओर प्रिय! कण्ठहार कण्ठ में ही है! बाहर मत दौड़; तेरा हृदय-कमल ही मेरा सुकोमल आसन है। मैं वहाँ बैठकर नित्यप्रति पुकार रहा हूँ-आ, लौट आ; अपने घर लौट आ। सुन, प्रियतम! नाम ही भक्ति है, नाम ही भाव है, नाम ही प्रेम है; मैं ही नाम हूँ, नाम ही मैं हूँ; नाम-रूप में तूने मुझे ही पाया है। अब डर काहेका। नाम ही ध्येय है; नाम ही ध्यान है; नाम ही साध्य है, नाम ही साधन है; नाम ही उपाय है, नाम ही प्राप्य है; नाम ही प्रापक है, नाम ही पूज्य है, नाम ही पूजा है और नाम ही उपचार है। अरे देख, पुलक-माला-भूषित विगलित-प्राण भक्त के नेत्रों का जल मुझे बहुत प्रिय है। तू नेत्रों के जलसे नाम-उपचार में पूजा करता और नाम लेता रह। नाम लेता रह। डर मत, डर मत, डर मत। 
 
 
(13)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे प्रियतम, आनन्द के लाल! केवल तू मेरा आश्रय ग्रहण कर, तेरे सब क्लेश दूर कर दूँगा।
 
 
त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेव जनार्दन।
इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम्।।
 
 
तू अन्नाभाव में, जलाभव में, अर्थ-कष्ट में, रोग में, शोक में, रो रहा है? अरे, यह मेरा ही आव्हान है-मैं ही तुझे बुला रहा हूँ। अविराम नाम ले, तेरी स्वप्न की अश्रुधाराओं को भी पोंछकर मैं सत्य, परम आनन्दधाम को ले चलूँगा।
 
 
तू दिशा-दिशा में महाकाल का विभीषिकामय ताण्डव देखकर काँप उठा है?  सुन-गिरिपात, भूकम्प, बाढ़ आदि उत्पात लोक-छय के कारण नहीं हैं। इन सब रूपों में मैं ही ध्वंसलीला करता हूँ। जिस प्रकार ‘अनेक बनूँगा‘,‘जन्म धारण करूँगा।’ (यह सृजन) मेरी इच्छा है; उसी प्रकार नाश (संहार) भी मेरी इच्छा है। आज इसकी भी आवश्यता है। मिथ्या प्रकाश के पीछे दौड़नेवाली विपथगामी हाहाकार-परायण संतान, लौट आ! लौट आ! इस अत्यन्त उज्जवल प्रकाशमाला से सुशोभित शान्तिमय शास्त्र-मार्ग पर। अरे, मेरी सनातन शास्त्रविधि का त्याग करने पर कभी किसी तरह सिद्धि, सुख और परम शान्ति नहीं मिल सकती। देख, नाम लेने वाले भक्त का किसी प्रकार भी अशुभ नहीं होता। जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि का उसे भय नहीं रहता। श्रद्धा-अश्रद्धा-जैसे भी मेरा नाम लेने पर मैं तेरे कोटि-कोटि अपराध क्षमा कर दूँगा। नाम ले-नाम ले। 
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(14)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे प्रियतम! पापी के लिये तो मेरा नाम ही अवतार है। असंयमी लोगों पर-काम-क्रोध-लोभ-मोहादि के खरीदे गुलामों पर कृपा करने के लिये ही तो मैं नाम के रूप में अवतीर्ण हुआ हूँ। तू कितना भी पापी, कितना भी विषय-लोलुप क्यों न हो, तुझे कुछ भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं तेरे सारे पाप लेकर तुझे आनन्दमय बना दूँगा। तू केवल मुझे पकड़े रखने की चेष्टा कर। यह कर लेने पर तुझे और कुछ भी नहीं करना पड़ेगा। मैं ही तुझे आत्मसात् करके तेरे अंदर-बाहर नृत्य करता रहूँगा। केवल बोल-‘हरे कृष्ण राम।’ बस, तेरे अहं रोग, शोक, अभाव, दुःख, ज्वाला, नरक के तीनों द्वार-काम, क्रोध, लोभ सदा के लिये खो जायँगे। चारों ओर से आनन्द के फौवारे निकल पडें़गे, आकाश से आनन्दकी धारा फूट पड़ेगी। तू जिस गाँव, जिस नगर, जिस देश में रहेगा, वहाँ के नर-नारी आनन्दसागर में तैरते रहेंगे। मैं श्रद्धादि कुछ भी नहीं चाहता-कुछ भी नहीं चाहता। मेरे भंडारे में अक्षुण्ण श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, प्रेम-सब है। तू केवल नाम ले, नाम ले।
 
 
(15)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
प्रियतम! आनन्द के लाड़ले! मेरा आश्रय ले लेने पर अब तुझे किस बात की चिन्ता है? मैने ही तो तेरा सारा भार ग्रहण कर लिया है। तूने क्या सुना नहीं?
 
 
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते।।
 
 
मेरे भक्तों के लिये किसी तरह का भी अशुभ टिक नहीं पता। वह जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि के भय से मुक्त है। तू और कोई भी चिन्ता मत कर। केवल मेरे नाम की रट लगा और मेरा ही चिन्तन कर। मैं अपने भक्तों के कोटि-कोटि अपराध क्षमा किया करता हूँ। सुन-सुन, मेरी आखिरी बात सुन।
 
 
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिश्येत सोऽस्म्यहम्।।
(श्रीमद्भागवद्)
 
 
पहले एक मात्र मैं था। सत्-असत्-ऐसा कुछ भी नहीं था। इसके बाद यह विश्व-संसार, जो भी कुछ बना है, सब मैं ही हूँ। अन्तमें जो कुछ शेष रहेगा, वह भी मैं ही हूँ।
 
 
तेरा रोग, शोक, अभाव भी मैं ही हूँ। तेरा दुःख, तेरी ज्वाला-यन्त्रणा सब मैं ही हूँ। तेरा मान, अपमान, सुख-दःुख, शान्ति-अशान्ति भी- सब मैं ही हूँ। मेरे सिवा और कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड में व्याप्त एकमात्र मैं ही हूँ। बहुरूपी मैं जगत्रूप में अनन्त खेल किया करता हूँ। नाम-कीर्तन करते-करते मुझे पकड़ रख। पुरूषार्थ का श्रेष्ठ रूप है- मेरा नाम-कीर्तन।
 
 
तू इसे निश्चय जान। मत्स्य, कूर्म, नृसिंह, वामन, राम, कृष्ण आदि अवतारों की भाँति मेरा नाम भी अवतार है। मैं ही कलिपीड़ित जीवों का उद्धार करने के लिये नाम-रूप में अवतीर्ण हुआ हूँ। नाम-कीर्तन करना और मुझे प्राप्त करना-एक ही बात है। तू कितना ही बड़ा दुर्बल, महापापी, नारकीय, कामकिंकर क्यों न हो, मुझे किसी बात का भय नहीं। तू केवल नाम लिया कर। मैं मृत्यु-संसार-सागर से तेरा उद्धार करूँगा, करूँगा, करूँगा। तू मुझे प्राप्त करेगा-करेगा, निश्चय ही प्राप्त करेगा। नाम-कीर्तन कर-नाम-कीर्तन कर-नाम-कीर्तन कर।
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
(16)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। 
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
(गीता)
 
 
प्रियतम। मैं तो तुझे सतत पुकार रहा हूँ। तेरे रोग-शोक-दुःख ज्वाला-यन्त्रणा, सारे अभाव दूर करके मैं तूझे परमानन्द-सागर में सर्वदा डुबाये रखने के लिये अन्तर के अन्तस्तल से ‘आ! आ!’ कहकर प्रतिक्षण आव्व्हान कर रहा हूँ।
 
 
अरे मेरे आनन्द के लाड़ले! अब मुझे भूले मत रहना। अरे प्राणाधिक! संसार-तापकी मनोवेदनामें तू अकेला नहीं रो रहा है-मैं भी तेरे साथ रो रहा हूँ और कहता हूँ कि ‘तू मुझे पुकार’- मैं तेरे सब दुःखों का अवसाद कर दूँगा, कर दूँगा कर दूँगा! मैं जन्म-मरण में सदा ही तेरा प्राण के समान नित्य सहचर हूँ, तेरा हृदयकमल ही तो मेरा नित्य निकेतन है। तेरा हृदय छोड़कर मैं क्षणमात्र भी नहीं रहता।
 
 
पुकार, पुकार-नाम ले, नाम ले, मेरा नाम तेरे भीतर-बाहर सब कुछ आलोक से, पुलक से, आनन्द से भर देगा- मेरे नूपुर एवं वंशीध्वनि सुनता हुआ तू मेरा दर्शन प्राप्त करेगा-तू मुझमें डूब जायगा। 
मैं हूँ, नामजापक मुझे देख पाता है, मैं भक्तों को आत्मसात् कर लेता हूँ-यह ध्रुव सत्य है। केवल नाम ले-नाम ले-नाम ले।
डर मत, डर मत, डर मत!
 
 
खात-सोत-बैठत-उठत जपै जो मेरो नाम।
नियत, सपदि सो तरै भव, पावै मेरौ धाम।।
 
 
(उठते-बैठते, खाते-सोते, जो सदैव मेरा नाम लेता है, वह तुरंत ही मुक्त हो जाता है।)
 
 
(17)
भगवान! कह रहे हैं, डर मत, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप, मेरा नाम जप!
 
 
अरे वांच्छिततम-आनन्द के दुलारे, प्यारे! पोंछ डाल, आँख के आँसू सब पोंछ डाल। तेरे रोग-शोक-दुःख, ज्वाला-यन्त्रणा, सारे अभाव दूर करने के लिये ही मैं नामरूप में अवतीर्ण हुआ हूँ; मैने ही मत्स्यरूप से वेदोद्वार, कूर्मरूप से मन्दरगिरि-धारण, वाराहरूप से हिरण्याक्षवध और धरा-उद्धार, नृसिंहरूप से हिरण्यकशिपु-संहार, वामनरूप से बलि-बन्धन, परशुरामरूप से इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय, रामरूप से रावण-वध, बलराम-रूप से प्रलम्ब एवं द्विविद का विनाश और कृष्णरूप से धर्मसंस्थापन किया था। मेरी शरणागत-प्राणा द्रौपदी की लज्जा निवारण करने के लिये ही मेरा वस्त्रावतार हुआ था। असुर-मोहन के लिये मैंने बुद्ध-देह परिग्रह किया था। मैं ही जगन्नाथ, विश्वनाथ, बैजनाथ एवं रंगनाथ-रूप से धरा में अवस्थन करके कोटि-कोटि पातकियों का उद्धार कर रहा हूँ। वही मैं नामावतार-रूप में अवतीर्ण हुआ हूँ; आ-आ, कलिपीडित जीव! तेरे ही लिये मैं नामरूप से आया हूँ। ले-ले, नाम ले। त्याग, संयम, शुद्धाशुद्ध-विचार, देश-काल किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करनी होगी। जहाँ-तहाँ, जब-तब, जिस-किसी प्रकार से भी नाम लेने पर तेरे रोग, शोक, अभाव कुछ भी नहीं रहेेंगे-तू परमानन्द में डूब जायगा। 
अरे, अरे प्रियतम! अरे, अरे आत्मविस्मृत! जैसे जल एवं जलकी तरंग, सूर्य और सूर्यरश्मि, चन्द्र एवं चन्द्रकी किरण अभिन्न हैं, उसी प्रकार तद्रूप तुझमें एवं मुझमें कोई भेद नहीं है- तू मेरे हृदय पर ही खेल रहा हैै। ले-ले, नाम ले, नाम-कीर्तन करता लौट आ-अपने ही सच्चिदानन्द परमस्वरूप में नाम ले, नाम ले, नाम ले।
डर मत, डर मत, डर मत।
 
 
सारांस यही है कि रामनाम की महिमा अपरम्पार है। प्रत्येक व्यक्ति को हर समय सीताराम, सीताराम, सीताराम, सीताराम, सीताराम, सीताराम का नाम जप करना चाहिये। यदि नामजप अनवरत करते रहते हैं तो इस संसार-सागर से परमानन्द के साथ पार जा पायेंगे। यही रामनाम की महिमा है।
 
 
समस्त पाठकों को सादर जय सियाराम जय हनुमान। 
 
लेखक- अनिल यादव।

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