महंत नृत्य गोपाल दास महाराजमहंत नृत्य गोपाल दास महाराज

श्री सीताराम नाम बैंक अयोध्या के मैनेजर श्री पुनीत रामदास जी महाराज ने अपने लेख जो “पुष्पवाटिका पत्रिका अप्रैल 2011” वर्णित किया गया है | जब मैने इस लेख को पड़ा तो भगवान श्री सीताराम जी के विवाह महोत्सव कार्यक्रम झाँसी, वर्ष 1979 का अद्भुद व्याख्यान किया गया था| वर्णित लेख पड़कर आनन्द आ गया | तभी मैने विचार किया कि लोगों के मंगल हेतु इस अद्भुद श्री सीतराम जी के विवाह महोत्सव आयोजन का पूरा लेख श्री पुनीत रामदास जी महाराज के शब्दों में लिखूंगा | क्योंकि श्रीसीताराम जी का विवाह जो भी प्रेम से गाता है, या सुनता है, उसका सदैव मंगल ही मंगल होता है |

यदि अपना सदैव मंगल चाहते हैं तो यह श्री सीतारामजी विवाह महोत्सव बार बार पढ़िए |

अब आगे का वर्णन श्री पुनीत रामदास जी महाराज की कलम से….

शब्दकोश के अनुसार लीला शब्द के अनेक अर्थ होते हैं- ईश्वरावतारों का अभिनय करना, केलि, क्रीड़ा और खेल इत्यादि ।

भगवान की सगुण लीलाएँ अत्यन्त गूढ़ होती हैं इसीलिए देवर्षि नारद जी, गरुड़ जी काकभुशुण्डि जी इत्यादि को प्रभु की लीला से मोह हो गया था प्रभु के अनुग्रह से उन लोगों का भ्रम, सन्देह और मोह दूर हुआ।

भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने भक्तों के लिए नर का शरीर धारण किया और साधारण मनुष्यों के समान अनेकशः परम पावन चरित्र किये। जैसे कोई खेल करने वाला नट अनेक वेश धारण करके नृत्य करता है और जैसा वेश होता है, उसी के अनुकूल वह भाव दिखलाता है पर स्वयं वह उनमें से कोई हो नहीं जाता।

श्री काकभुशुण्डि जी कहते हैं-

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज विमोहनि जन सुखकारी ॥

हे गरुड़ जी! ऐसे ही श्री रघुनाथ जी की यह लीला है, जो राक्षसों को विशेष मोहित करनेवाली और भक्तों को सुख देने वाली है। (रा.च.मा. 7/73 (क)/1) .

शिशु रूप श्रीकृष्ण ने पूतना जैसी राक्षसी को स्तन

-पान कराते ही मार डाला। कहाँ सुकोमल श्रीबालगोपाल और कहाँ वह भयंकर प्रौढ़ा राक्षसी ऐसी अद्भुत घटनाएँ संसार में और कहीं देखने या सुनने को कम मिलती हैं। जैसे भगवान् की लीलाएँ अत्यन्त दुरूह होती हैं; वैसे ही उनके भक्तों की लीलाएँ अत्यनत रहस्यमयी और चमत्कारपूर्ण होती हैं नामदेव जी तुकाराम जी ज्ञानदेव जी, गुरु नानकदेव जी, गो. तुलसीदास जी इत्यादि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।

वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध हुआ है कि तीव्र लाल प्रकाश में जब कुछ लोगों को दूध पिलाया गया तो उन्हें उल्टी हो गयी। केवल एक-दो मनुष्य उसे पचाने में समर्थ हुए किन्तु उनके भी पेट में गड़बड़ी रही। इसका प्रमुख कारण यह था कि तीव्र लाल प्रकाश में दूध खून के समानलाल दिखायी पड़ता था। दूध में तो कोई खराबी नहीं थी. सिर्फ उनके भाव ने ही यह परिणाम उत्पन्न किया ।। बन्धुओं! तात्पर्य यह है कि भाव जितना गहरा होगा, पदार्थ में उतना ही प्रभाव आयेगा।

भगवान की भक्ति भाव प्रधान, इसीलिए भगवद्भक्त अपनी भावना के अनुरूप श्रीठाकुर जी को भोजन कराते हैं. जल पिलाते है, पंखा चलाते हैं, सुलाते हैं, जगाते हैं, जयन्ती मनाते हैं। वैसे ही, दो श्रीविग्रहों या दो स्वरूपों के माध्यम से विवाह महोत्सव भी मनाते हैं।

भगवान् के श्रीविग्रह साक्षात् भगवद्रूप ही हैं। वे निरे प्रतीक नहीं हैं। अर्चा विग्रह एक प्रकार का अवतार है। उसमें भाव दृढ़ होने पर समस्त भगवत्-शक्ति आविर्भूत होती हैं आप जानते हैं कि मार्गशीर्ष (अगहन) शुक्ल पंचमी को ‘विवाह पंचमी’ कहते है, क्योंकि इसी दिन जनकपुर में दूल्हा सरकार भगवान् श्रीराम जी का विवाह भगवती दुलहन श्रीसीता जी के साथ त्रेतायुग में सुसम्पन्न हुआ था। वहीं परम्परा आज भी चली आ रही है, जो प्रति वर्ष विवाह पंचमी महोत्सव के रूप में मनायी जाती है।

भगवान् श्रीसीताराम जी का विवाह महोत्सव अलौकिक है, दिव्य है, चाहे अर्चा श्रीविग्रहों के रूप में हो। अथवा स्वरूपों के रूप में इसकी तुलना लौकिक, सांसारिक विवाह से नहीं की जा सकती है। इसीलिए जो श्रीमणिरामदास छावनी में जहाँ सैकड़ों की संख्या में विरक्त साधु रहते हैं वहाँ भी प्रतिवर्ष यह विवाह महोत्सव बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं इसके अतिरिक्त यहाँ पर तीन दिव्य विवाह सुसम्पन्न हो चुके हैं। जिसमें दूल्हा सरकार भगवान् श्रीरामचन्द्र जी की बारात श्री मणिरामदासछावनी सेवा ट्रस्ट, श्री अवधनरेश महाराजा चक्रवर्ती श्री नृत्यगोपालदास जी (श्रीदशरथ जी के यहाँ से गयी थीं। विवाह महोत्सव की इस दिव्य लीला में महाराजश्री चक्रवर्ती महाराज दशरथ का अभिनय किये थे। प्रथम विवाह की बारात ग्राम जगनेवा (जनकपुर), श्रीमती कैलासी देवी (सुनयना) के घर गयी थी। दूसरे विवाह की बारात श्री कुंजविहारी मन्दिर झाँसी (जनकपुर) म. श्री विहारीदास जी महाराज (जनकपुर) श्री टाटम्बरी जी महाराज, श्रीरामहरि जी ओमर (जनक जी) के यहाँ गयी थी।

यहाँ पर संक्षेप में झाँसी जाने वाली बारात का उल्लेख है क्योंकि इस बारात में मैं स्वयं भी सम्मिलित था। युगल सरकार की यश-लीला सुधा-सलिल सरिताहै। भगवान् को जब लीला करनी होती है, तो वे सर्वप्रथम लीलानुरूप पात्रों का चयन करते हैं। भक्तजन ही उनकी लीला के सुपात्र बनते हैं और वे ही लीलामृत सुधा के सहभागी होते हैं। भगवान् की दिव्य लीलाओं का अभिनय करना, मंचन करना अथवा प्रदर्शन करना, यह सब भक्तों के लीलामृत हैं। श्रीअर्चा विग्रह की विवाह-लीला में महाराजश्री चक्रवर्ती श्रीदशरथ जी की भूमिका निभाये थे। वैसे ही साकेतवासी म श्रीगंगादास जी महाराज श्रीवसिष्ठ जी का साकेतवासी म श्रीविश्वम्भरदास जी महाराज श्रीविश्वामित्र जी का और हम लोग दुल्हा सरकार के बाराती बने थे। झाँसी जाने वाली बारात में कम से कम एक सौ बाराती थे, जिसमें श्री अयोध्या जी के बड़े-बड़े महन्त और अन्यान्य सन्त महात्मा सम्मिलित हुए थे। भगवान् के प्रमुख बाराती इस प्रकार थे जगत्गुरु श्री शिवरामानन्दाचार्य जी महाराज, श्रीनाना जी महाराज, पं. श्री अखिलेश्वरदास जी महाराज, परमहंस श्रीरामचन्द्रदास जी महाराज, वेदाचार्य पं. श्रीधरणीधर जी पुजारी श्री बल्देवप्रसाद जी चतुर्वेदी, पुजारी श्री बजरंगदास जी. साकेतवासी श्री अनन्तरामदास जी, श्री तुलसीदास जी तथा पुनीतरामदास इत्यादि ।

बनइ न बरनत बनी बराता ।होहिं सगुन सुन्दर शुभदाता ।।

बारात ऐसी बनी कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। अयोध्यानगरी से दिनांक 18.6.79 को लगभग 12 बजे मध्य को दूल्हा सरकार भगवान् श्रीराम जी की बारात झाँसी (जनकपुर) के लिए रवाना हुई। उरई में बारातियों का खूब स्वागत-सत्कार हुआ। दिनांक 19.6.79 को झाँसी (जनकपुर) पहुँची। ‘जानी सिय बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई ।।’ (रा.च.मा. 1/306/7) जहाँ पर आद्याशक्ति श्रीकिशोरी जी विराजमान हैं वहाँ पर क्या कोई कमी हो सकती है ? भव्य स्वागत-सत्कार के बाद बारातियों को डिग्री कालेज में ठहराया गया। दूल्हा सरकार भगवान् श्रीराम जी की रात्रि में भव्य शोभायात्रा निकाली गयी। झाँसी (जनकपुर) के लोग दूल्हा सरकार का दर्शन करके कृतकृत्य हुए। पुरवासियों ने म. श्रीविहारीदास जी महाराज (जनक जी) और म. श्री नृत्यगोपालदास जी (दशरथ जी) की भूरि-भूरि प्रशंसा की। वे लोग कहने लगे- ‘इन दोनों समधियों के सत्प्रयास से ही आज हम लोगों के नयन यह दिव्य दर्शन कर सफल हो रहे हैं।

”मंगल मूल लगन दिनु आवा।’ (रा.च.मा. 1/312/5) मंगलों का मूल दिनांक 20.6.79 आ गया। अवधनरेश महाराजश्री का भाग्य और वैभव देखकर पुरवासीलोग सराहना करने लगे। लोगों ने देखा, महाराजश्री मन ही मन बड़े प्रसन्न है, उनके साथ परम हर्षयुक्त साधुओं और ब्राह्मणों की मण्डली विराजमान है। म. श्री विहारीदास जी (जनक जी) ने सब बारातियों का समधी महाराजश्री (दशरथ जी) के समान ही सब प्रकार से आदरपूर्वक पूजन-अर्चन किया। श्रीअर्चा विग्रह दूल्हा श्रीराम जी और दुलहन श्री जानकी जी को विवाह मण्डप में पधराया गया। कन्यापक्ष के पुरोहित शतानन्द जी रहे। मुनिराज बहुत प्रसन्न होकर शान्ति पाठ किये। दोनों कुलों की रीति-रिवाज के अनुसार विवाह की प्रक्रिया शुरू हुई।

‘लागे पखारन पाँव पंकज प्रेम तन पुलकावली |”

दूल्हा के श्रीचरणकमलों का प्रक्षालन म श्रीविहारीदास जी (जनक जी) ने किया आज वे अत्यन्त बडभागी है क्योंकि जिन श्रीचरणकमलों का मकरन्द रस गंगा जी के रूप में शिवजी के मस्तक पर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रता की सीमा बताते हैं, उन्हीं चरणों को वे धो रहे हैं। दोनों कुलों के गुरु वर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर शंखोच्चार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ | म.श्रीविहारीदास जी (जनक जी) ने लोक और वेद की रीति से कन्यादान किया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी गयी और भाँवरे होने लगीं जय ध्वनि हुई। मंगलगान हुआ। फलों की वर्षा की गयी। मुनियों ने आनन्दपूर्वक भाँवरें फिरादी और नेग सहित सब रीतियों को पूरा किया। श्रीरामचन्द्र जी ने श्री जानकी जी के सिर में सिन्दूर दिया। यह शोभा किसी प्रकार भी वर्णित नहीं हो सकती। फिर म. श्रीगंगादास जी (वसिष्ठ जी) महाराज की आज्ञानुसार दूल्हा और दुलहन एक आसन पर बैठाये गये।

“बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए ।’

श्रीराम और श्रीजानकी जी को श्रेष्ठ आसन पर बैठे देखकर महाराजश्री (दशरथ जी मन में बहुत आनन्दित हुए। अब सब पुरवासियों ने कहा कि श्रीसीताराम जी का विवाह हो गया। मुनीश्वर की आज्ञा पाकर पुरवासी सुन्दर सखियाँ मंगलगान करती हुई श्रीराम जी और श्रीसीता जी को लिवाकर कोहबर (कुल देवता का स्थान) को चलीं। दोनों अर्चा श्रीविग्रहों की शोभा अद्वितीय है। श्रीरामजी के माथे पर मनोहर मौर सोह रहा है। तदनन्तर वर-कन्या को सब सुन्दर सखियाँ जनवासे को लिवा चलीं।

पुनि जेवनार भई बहु भाँती । पठए जनक बोलाइ बराती ।

फिर बहुत प्रकार की रसोई बनी, बारातियों को बुलाया गया। चतुर रसोइये स्वादिष्ट और पवित्र भोजन सब बारातियों को फेरने लगे, अर्थात् भोजन परोसने लगे।

पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे ।। भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहीं जाहिं बखाने ।।(रा.च.मा. 1/32/1-2)

अब सब लोग पंचकौल करके भोजन करने लगे। नारियों द्वारा गाली गीत सुनकर सभी बारातीगण प्रेममग्न हो गये अनेक प्रकार के अमृतोपम स्वादिष्ट पकवान परसेगये, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।

अयोध्यानाथ महाराजश्री (दशरथ जी ) अब चलना चाहते हैं, ऐसा समझकर मं. श्री विहारीदास जी (जनक जी) ने अपरिमित दहेज दिया। बारातियों सन्त-महात्माओंका आदर-सत्कार करते हुए उनकी भरपूर भेंट-विदाई की।

जगत् जननी श्रीकिशोरी जानकी जी, जो अभी एक दुलहन के रूप में हैं, उनकी विदाई का क्षण जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे झाँसी (जनकपुर) के नर-नारियों का हृदय धड़कने लगता है। भावना के अनुरूप अपनी लाड़ली पुत्री का, बहन का सखी का स्मरण कर वे विलख-बिलख कर रो रहे थे। वे एक-दूसरे को ताक रहे थे कोई किसी से बात नहीं कर पा रहा था। सबकी आँखों में आँसू भरे थे। श्रीकिशोरी जी का वियोग उनसे देखा नहीं जा रहा था।

सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।। ब्याकुल कहहिं कहाँ वैदेही सुनि धीरजु परिहरइ न केही ।।(रा.च.मा. 1/338/1 )

जब पशु और पक्षी इस तरह विकल हो गये, तब झाँसी (जनकपुर) के नर-नारियों की दशा कैसे कही जा सकती है ? म श्रीविहारीदास जी (जनक जी) अपनी भाव जगत् की पुत्री लाड़ली वैदेही के विरह जनित दुःख का स्मरण कर विलख-बिलख कर इतना अधिक रोये कि हम सब बारातियों का भी हृदय पिघल गया। अन्त में समस्त पुरवासियों एवं म. श्रीविहारीदास जी (जनक जी) ने श्री अवधनरेश महाराजश्री (दशरथ जी) से क्षमा याचना की और अपने हृदय का टुकड़ा लाडली श्री सीता जी को समर्पित करते हुए, ‘शुभस्ते पन्थाः’ कहा।बारात अयोध्या जी आ गयी। दूल्हा-दुलहन के दर्शन के लिए दशरथ भवन श्रीमणिरामदास छावनी में लोग उमड़ पड़े। वर-वधू का भव्य स्वागत हुआ। नैवेद्य चढ़ाया गया, आरती उतारी गयी, पुष्प वर्षा की गयी।

सिय रघुवीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं ।

तिन्ह कहूँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु ।।

(रा.च.मा. 1/361)

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