hanuman ji

कर्पूरगौर शिव और नील-कलेवर श्रीराम में अनन्य प्रीति है। सच तो यह है, भगवान् श्रीराम और महेश्वर तत्वतः एक ही हैं; इनमें भेद नहीं। इसी कारण ‘जो गोविन्द को नमस्कार करते हैं, वे शंकर को भी नमस्कार करते हैं एवं जो भक्तिपूर्वक श्रीहरि की अर्चना करते हैं, वे वृषभध्वज की भी पूजा करते हैं। जो विरूपाक्षसे द्वेष करते हैं एवं जो रूद्र को नहीं जानते-जिन्हें रूद्र का स्वरूप विदित नहीं है, वे केशवको भी नहीं जानते।

भगवान् शंकर ने स्वयं अपने मुखारविन्द से कहा है-‘जो इन अव्यक्त विष्णु को और मुझ महेश्वर देव को एक-सा देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। किन्तु लीला के लिये-अपनी ही रसमयी मधुर लीला के आस्वादन के लिये वे दोनों आशुतोष शिव एवं मुनिमनरज्जन श्रीराम के रूप में प्रकट होते हैं।

पाप-ताप-निवारण, धर्म-संस्थापन एवं प्राणियों के अशेष मंगल के लिये जब-जब भगवान् श्रीराम धरती पर अवतरित होते हैं, तब-तब सर्वलोकमहेश्वर शिव भी अपने प्रियतम् श्रीराम की मुनिमनमोहिनी मधुर मंगलमयी लीला के दर्शनार्थ धरती पर उपस्थित हो जाते हैं। वे अपने एक अंश से अपने प्राणप्रिय श्रीराम की लीला में सहयोग करते हैं, पर दूसरे रूप में उनकी भुवनपावनी लीला के दर्शन कर मन-ही-मन मुदित भी होते रहते हैं। उस समय उनके आनन्द की सीमा नहीं रहती।

निखिल भुवन-पावन भगवान् श्रीराम महाभागा कौसल्या के सम्मुख प्रकट हुए और अवधकी गलियों में उमानाथा लगे घूमने। वे अयोध्यापति दशरथके राजद्वार पर कभी प्रभु-गुण-गायक साधु के रूप में तो कभी भिक्षा प्राप्त करने के लिये विरक्त महात्मा के वेष में दर्शन देते। कभी परम प्रभु के अवतारों की मगंलमयी कथा सुनाते प्रकाण्ड विद्वान् के रूप में राज-सदन पधारते तो कभी त्रिकालदर्शी दैवज्ञ बनकर राजा दशरथ के कमल-नयन शिशु का फलादेश बताने पहुँच जाते। इस प्रकार वे किसी-न-किसी बहाने घूम-फिरकर श्रीराम के समीप जाते ही रहते। भगवान् शंकर कभी अपने आराध्य को अंक में उठा लेते, कभी हस्तरेख देखने के लिये उनका कोमलतम् दिव्य हस्त-पद्य सहलाते और कभी अपनी जटाओं से उनके नन्हे-नन्हें कमल-सरीखे लाल-लाल तलवे झाड़ते तो कभी उन देव-दुर्लभ सुकोमल अरूणोत्पल चरणों को अपने विशाल नेत्रों से स्पर्श कर परमानन्द निमग्न हो जाते। धीरे-धीरे कौसल्यानन्दन राजद्वार तक आने लगे।

एक बार की बात है-पार्वतीवल्लभ मदारी के वेष में डमरू बजाते राज द्वार पर उपस्थित हुए। उनके साथ नाचनेवाला एक अत्यन्त सुन्दर बंदर था। मदारी के साथ अवध के बालकों का समुदाय लगा हुआ था।

डमरू बजने लगा-और कुछ ही देर में श्रीराम सहित चारों भाई राजद्वार पर आ पहुँचे। मदारी ने डमरू बजाया और बंदर ने दोनों हाथ जोड़ लियें भ्राताओं सहित राघवेन्द्र हँस पडे़।

मदारी जैसे निहाल हो गया डमरू और जोर से बजा। बंदर ने नाचना आरम्भ किया। वह ठुमुक-ठुमुक नाचने लगा।

भगवान् वृषभध्वज अपने एक अंश से अपने प्राणाराध्य के सम्मुख नाच रहे थे और अपने दूसरे अंश से स्वय ही नचा रहे थे। नाचने और नचाने वाले आप ही थे-श्रीरामचरणानुरागी पार्वतीवल्लभ और बंदर के नाच से मुग्ध होकर बार-बार ताली बजाने वाले थे-सम्पूर्ण सृष्टि को नट-मर्कट की भाँति नचाने वाले अखिलभुवनपति कौसल्या-कुमार भगवान् श्री राम!

अन्त में भगवान् श्रीराम प्रसन्न हो गये और मचल उठे-‘मुझे यह बंदर चाहिये।’

चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम की कामना कैसे अपूर्ण रहती। मदारी बंदर का मूल्य चाहे जो ले, पर बंदर तो कौसल्या-किशोर के पास ही रहेगा। मदारी को भी तो यही अभीष्ट था। इसी उद्देश्य से-अपने प्रभु के चरणों में समर्पित होने के लिये ही तो वह राजद्वार पर आया था। नवनीरद-वपु श्रीराम ने अपने कर-कमलों से बंदर को ग्रहण किया-युग-युगकी लालसा पूर्ण हुई बंदर की। वह नाच उठा-थिरक-थिरककर नाचने लगा। अब तक भोलेनाथ बंदर के रूप में अपने को नचा रहे थे; अब वे स्वयं नाच रहे थे और उन्हें नचाने वाले थे मुनि-मन-मानस-मराल दशरथकुमार! बंदर के सुख, सौभग्य और आनन्दकी सीमा न थी। वह विविध प्रकार के मनमोहक हाव-भाव प्रदर्शित करता हुआ अपने आराध्य के सम्मुख नृत्य करने में तन्मय था; उधर मदारी अदृश्य हो गया। पता नहीं, वह कैलास-शिखर पर चला गया या अपने परम प्रभु की सुखद लीला के दर्शनार्थ अपने दूसरे रूप में प्रविष्ट हो गया।

इस प्रकार हनुमानजी ने अपने स्वामी श्रीराम के समीप रहने का अवसर प्राप्त कर लिया। श्रीराम हनुमानजी को अतिशय प्यार करते। वे हनुमानजी के समीप बैठते, उनके साथ खेलते, उनके सुवर्ण-तुल्य अंगों पर अपने कर-कमल फेरते; कभी उन्हें नाचने के लिये आज्ञा देते तो कभी दौड़ाकर कोई वस्तु मँगवाते। हनुमानजी अपने प्रभु की प्रत्येक आज्ञा का अत्यन्त आदर, उत्साह एवं प्रसन्नतापूर्व पालन करते। वे प्रत्येक रीति से भगवान् श्रीराम को प्रसन्न करते। भगवान् श्रीराम को जैसे सुख मिले, उनका जैसा मनोरंजन हो, वे वही करते।

इस प्रकार कई वार्षो का समय क्षणार्ध के समान व्यतीत हो गया। महर्षि विश्वामित्र आयोध्या पधारे और जब उनके साथ श्रीराम के जाने का अवसर आया तो उन्होंने हनुमानजी को एकान्त में बुलाकर कहा-‘मेरे अन्तरंग सखा हनुमान! मेरे धराधाम पर अवतरित होने का प्रमुख कार्य अब प्रारम्भ होने वाला है। लंकाधिपति रावण की अनीति एवं अनाचार से पृथ्वी विकल हो उठी है। अब मैं उसका वध कर पृथ्वीपर धर्म की स्थापना करूँगा। मेरे इस कार्य में तुम्हारी सहायता अपेक्षित होगी। दशाननने महाबली वाली को मिला रखा है और वह अपने अनुज सुग्रीव के रक्त का प्यासा है। भयाक्रान्त सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर निवास कर रहे हैं। अतएव तुम ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर सुग्रीव से मेत्री कर लो। मैं अपने पड़ोस में बसने वाले मारीच, सुबाहु और ताड़का का उद्धार कर कुछ ही दिनों में दण्डकारण्य में खर-दूषण, त्रिशिरा और शूर्पणखा-जैसे भयानक कण्टकों को दूर करता हुआ ऋष्यमूक की ओर आऊँगा। वहाँ तुम मुझे सुग्रीव की मैत्री स्थापित करवाकर वानर-भालुओं के द्वारा मेरे अवतार-कार्य में सहायता करना।’

हनुमानजी अपने प्रभु से पृथक होना नहीं चाहते थे, किंतु प्रभु की आज्ञा का पालन ही उनके लिये सर्वोपरि कर्तव्य था। उन्होंने अपने प्राणाराध्य के चरणों में प्रणाम किया और उनके मंगलमय-कल्याणमय मधुर नामों का मन-ही-मन जप करते हुए वे ऋष्यमूक के लिये प्रस्थित हो गये।

सारांस यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने आराध्य के प्रति समर्पित होना चाहिये, सदैव उनकी सेवा अर्चना करना चाहिये, अवश्य ही कल्याण होगा। लोक परलोक दोनों सुधर जायेगें। यह प्रसंग बहुत ही महत्वपूर्ण है कृपया अधिक से अधिक लोंगों तक

अवश्य पहुचायें। कमेन्ट में जय सियाराम जय हनुमान अवश्य लिखें।

लेखक- अनिल यादव।

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