श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की सातवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

सातवाँ अध्याय– श्री कृष्णा अधिकमास को अपना पुरुषोत्तम स्वरुप देना |

सूतजी बोले- हे तपोधन ! आप लोगों ने जो प्रश्न किया है वही प्रश्न ऋषिवर नारदजी ने नारायण से किया था । नारायण ने नारदजी से जो कहा था वही मैं आप लोगों से कहता हूँ । नारदजी बोले – हे बद्रीपते ! जब विष्णु अधिमास के अपार दुःख कहकर चुप हो गये तब भगवान श्रीकृष्ण ने क्या कहा सो आप कहो ? श्रीनारायण बोले-हे वत्स नारद ! गोलोक नाथ श्रीकृष्ण ने विष्णु से जो कहा वह अति गुप्त है । परन्तु जो श्रेष्ठ भक्त हो, जिज्ञासु हो, पाखण्डी न हो, सज्जन एवं सेवा करने वाला हो उसे बता देना चाहिये । यह गुप्त वचन सुकीर्ति करने वाला, पुण्यात्मा, यश तथा श्रेष्ठ पुत्र देने वाला है । राजा और राजदरबार को वश में करने वाला, दरिद्रता नाशक पुण्यात्माओं के सुनने योग्य है। अतः भक्ति सहित इसका आचरण करना चाहिये । श्रीपुरुषोत्तम बोले- हे विष्णु ! आपने यह बहुत अच्छा किया जो मलमास का हाथ पकड़ कर यहाँ ले आये। इससे आपकी लोक में महान कीर्ति होगी । जब आपने अधिमास को अपना लिया तो मैंने भी इसे अपना लिया । अतः मैं इसे भी अपने समान सर्वोपरि करूँगा । यह गुण, कीर्ति, प्रभाव, ऐश्वर्य शक्ति, पराक्रम, भक्तों को वरदान देने में मेरे ही समान गुणवान होगा जैसे मैं विश्व में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ वैसे ही यह भी पृथ्वी पर पुरुषोत्तम नाम से विख्यात होगा। जो गुण मैंने इसको दिये हैं वे सब मुझमें हैं और मेरा पुरुषोत्तम नाम लोक और वेद में विख्यात है । हे जनार्दन ! वह सभी गुण तुम्हारी प्रसन्नता के लिये आज मैंने इसे दे दिये हैं। अतः हे मधुसूदन ! आज से मैं ही इसका स्वामी हूँ। अब इसका पुरुषोत्तम नाम होने से सब जगत पवित्र हो जायेगा और यह मेरे समान होकर सब मासों का स्वामी होगा । अब यह जगत् पूज्य और विश्व बन्दनीय होगा । इसकी जो लोग पूजा, व्रत, आराधना करेंगे उनके सब दुःख दारिद्र नाश हो जायेंगे। बारहों महीने सकाम हैं परन्तु मैंने इसको निष्काम कर दिया, जैसे मैं प्राणियों का मोक्षदाता हूँ वैसे ही मैंने इसे मोक्ष का देने वाला कर दिया । जो कोई निष्काम या सकाम भाव से इस अधिमास को पूजेगा उसके सभी कर्म भस्मीभूत होकर वह मेरे गोलोक को प्राप्त करेगा इसमें जरा भी संशय नहीं है। जिस परम पद की प्राप्ति को बड़े-बड़े भाग्यशाली यति, ब्रह्मचारी, महात्मा लोग निराहार रहकर दृढ़ व्रत करके कठोर तप करते हैं और फल, पत्र, वायु का आहार करते हैं तथा काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, ईर्ष्या आदि को त्यागकर जितेन्द्रिय हो वर्षा, जाड़े और प्रचण्ड धूप को खुले में सहन करते हैं ऐसे महात्मा लोग भी हे गरुड़ध्वज विष्णु ! मेरे परम पद को नहीं पाते । किन्तु पुरुषोत्तम मास के आराधक केवल एक मास की आराधना से ही वृद्धावस्था रहित होकर परम पद गोलोक को बिना परिश्रम के प्राप्त कर लेंगे। सब साधनों में श्रेष्ठ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि देने वाला यह पुरुषोत्तम मास अवश्य सेवन योग्य है । जैसे जोते हुए खेत में बोने से बीज करोड़ गुना बढ़ते हैं वैसे ही पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य कोटि गुना बढ़ता है। कुछ लोग चातुर्मासादि यज्ञ करके स्वर्ग में जाते हैं और वहाँ के भोग भोगकर फिर पृथ्वी पर आते हैं । किन्तु जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास का आदर से विधि पूर्वक सेवन करता है वह अपने कुल का उद्धार कर मुझको ही प्राप्त होता है । जो मुझे प्राप्त हो जाता है वह जन्म, मृत्यु, भय से व्याप्त आधि-व्याधि तथा वृद्धावस्था से घिरा हुआ इस संसार में नहीं जन्मता । जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं पड़ता वही मेरा गोलोक धाम है, ऐसा वेद और उपनिषद का वचन सत्य है जो झूठा नहीं हो सकता । इस मास का स्वामी मैं हूँ मैंने ही इसको प्रतिष्ठित किया है और अपना पुरुषोत्तम नाम भी इसको दिया है जिससे इसके भक्तों की चिन्ता अब रात-दिन मुझको रहेगी । अपने भक्तों की सभी कामना मुझको ही पूर्ण करनी है। मेरे भक्तों का अपराध कभी भी न गिना जाय । हे विष्णु ! मेरी आराधना की अपेक्षा मुझे अपने भक्तों की आराधना अधिक प्रिय है परन्तु कभी-कभी मुझे अपने भक्तों की वांछा पूरी करने में कुछ देर हो जाती है । मेरे पुरुषोत्तम मास के जो भक्त हैं उनकी मनोकामना पूरी करने में मैं कभी विलम्ब नहीं करता । मल मास के भक्त मेरे भक्त हैं वह मुझको अत्यन्त प्रिय हैं। इस मास में महा अज्ञानी मनुष्य जो जप, दान, स्नान आदि नहीं करते, अच्छे कर्म नहीं करते और देव, तीर्थ, ब्राह्मण का उपहास करते हैं वे दुष्ट और अभागे जो दूसरे के भाग्य पर जीने वाले हैं उनको स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता जैसे खरगोश के सींग खोजने पर भी नहीं मिलते । जो मूर्ख मेरे प्रिय मलमास का तिरस्कार करते हैं और जो धर्म का आचरण नहीं करते वे सदा नरकगामी होते हैं। पुरुषोत्तम मास प्रत्येक तीसरे वर्ष में पड़ता है ऐसे मास में जो धर्म आचरण नहीं करते वे कुम्भी-पाक नरक में पड़ते हैं और जब तक पृथ्वी पर जीवित रहते हैं तब तक अनेक कष्ट पाते हैं तथा पुत्र पौत्र पत्नी द्वारा दिये गये क्लेशों को भोगते हैं। जो सुहागिन स्त्रियाँ पुत्र सुख और अपने सौभाग्य की कामना से पुरुषोत्तम मास में स्नान, दान, पूजा, पाठ आदि करेंगी उनको मैं सौभाग्य, सम्पत्ति, विविध सुख एवं पुत्र आदि देता रहूँगा और जो स्त्रियाँ मेरा मास व्यर्थ निकाल देंगी तो मैं उनके प्रतिकूल हो जाऊँगा जिससे उन्हें न तो पति का ही सुख मिलेगा और भाई, पुत्र, सम्पत्ति आदि का सुख तो स्वप्न में भी नहीं मिलेगा । अतः इस मास में सभी शुद्ध मन से स्नान पूजा जपादि अवश्य करें और अपनी शक्ति के अनुसार दान करें । जो कोई पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा भक्ति से मेरी पूजा करेगा, वह धन, पुत्र और विविध भाँति के सुख भोगकर अन्त में गोलोक में जाकर वास करेगा । मेरी आज्ञा से सब मनुष्य अधिमास की पूजा करेंगे क्योंकि मैंने इसे सब मासों में उत्तम किया है। हे रमापते ! अब तुम अधिमास की चिन्ता छोड़कर इस पुरुषोत्तम मास को बैकुण्ठ ले जाओ । श्रीनारायण बोले इस प्रकार विष्णु श्रीकृष्ण के मुख से ऐसे रसीले वचन सुनकर बड़े आनन्दित हुए और मलमास को साथ लेकर नवीन मेघ के समान श्यामकान्ति वाले श्री श्यामसुन्दर को प्रणाम करके गरुड़ पर बैठ शीघ्र ही अपने बैकुण्ठ को चले गये । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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