श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की चौथे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

चौथा अध्याय – अधिक मास में भगवान की शरण में जाना |

श्री नारायण बोले-हे नारदजी ! मैं लोक हित के निमित्त भगवान हरि से अधिमास ने जो कहा सो कहता हूँ तुम सावधान होकर सुनो । अधिमास बोला हे नाथ ! हे कृपानिधे ! हे हरे ! मैं मलमास बलवानों से तिरस्कृत होकर यहाँ आया हूँ फिर आप मेरी रक्षा क्यों नहीं करते ? मुझे उन लोगों ने शुभ कर्म में वर्जित अनाथ और हमेशा घृणा से देखा है अब आपकी वह दयालुता कहाँ गई यह कठोरता कैसे हुई ? हे भगवान ! जैसे आपने अग्निरूप दुष्ट कंस से जलती हुई देवकी की रक्षा की वैसे ही मुझ शरणागत की रक्षा क्यों नहीं करते ? हे दीनवत्सल ! जैसे दुःशासन के दुःख से द्रौपदी की रक्षा की, वैसे ही मेरी रक्षा क्यों नहीं करते ? कृपा कर बताइये । हे प्रभु ! जैसे आपने यमुना के कालियदह में नागराज के महा विष से गोप और गौओं की रक्षा की वैसे ही रक्षक ! मुझ दीन की रक्षा क्यों नहीं करते ? हेदीनवत्सल ! जैसे ग्वालों और उनकी स्त्रियों की दावानल से जलते समय वन में रक्षा की वैसे ही मेरी रक्षा क्यों नहीं करते ? हे दीनवत्सल ! जैसे आपने जरासन्ध की कैद से बंदी राजाओं की रक्षा की, वैसे ही मुझ शरण में आये हुए की रक्षा क्यों नहीं करते ? हे दीन प्रतिपालक! जिस प्रकार ग्राह के मुख से गजराज की रक्षा की, वैसे ही मुझ शरणागत की रक्षा क्यों नहीं करते ? इस प्रकार भगवान से कहकर स्वामी रहित मलमास श्रीकृष्ण भगवान के आगे आँसू बहाता हुआ उदास हो चुप हो गया । तब अत्यन्त द्रवीभूत हो कृपालु हरि आगे खड़े हुए मलिन मुख मलमास से बोले-हे पुत्र ! तू अत्यन्त दुःखी है, तेरा ऐसा क्या दुःख है जिससे इतना पीड़ित हो रहा है तू सोच मत कर मैं तेरा दुःख दूर करूँगा । मेरी शरण में आकर महा दुःखी और पतित भी सोच नहीं करता फिर तू यहाँ आकर क्यों सोच में डूब रहा है ? तुझको दुःखी देख यहाँ के बैकुण्ठ वासी बिस्मित हो गये हैं । तू क्यों मरने की इच्छा करता है ? सो कह नारायण बोले-भगवान के ऐसे प्रिय वचन सुन मलमास जैसे सिर पर से बोझा उतार कर कोई लम्बी-लम्बी श्वास लेता है । इस प्रकार श्वास लेकर मधुसूदन भगवान से बोला- हे प्रभु! आप घट-घट के वासी हैं, सब जानते हैं और आकाश की भाँति संसार में व्याप्त हैं। आप चराचर पति विष्णु हैं सबके साक्षी, विश्व दृष्टा हैं आप निरंजन निराकार रूप में सब प्राणियों की व्यवस्था में स्थित रहते हैं अतः हे जगन्नाथ! आपके बिना कुछ भी नहीं है। मुझ अभागे की पीड़ा को क्या आप नहीं जानते, तो भी हे नाथ ! दुःख रूपी बंधन में बँधा हुआ जैसा कष्ट किसी को कभी न हुआ, न सुना और न देखा सो आपसे कहता हूँ । क्षण, लव, मुहूर्त, पक्ष, मास और दिन, रात्रि आदि अपने स्वामी की आज्ञा से सदा अभय हो आनन्द करते हैं। किन्तु मेरा न कोई नाम हैन कोई स्वामी है और न कोई आश्रय स्थल ही है इसलिये उन सब अधिपतियों ने मेरा बहिष्कार कर दिया है कि यह मलमास शुभ कर्म में निषिद्ध है, अन्धा है, पतन के गर्त में गेरने वाला है । अतः मैं मरना चाहता हूँ, जीना नहीं । ऐसे जीने से तो मरना ही अच्छा है नित्य जलता हुआ कैसे सुख पूर्वक सो सकता है । अब इसके आगे हे महाराज ! कुछ कहने को बाकी नहीं है । आप दूसरों के दुःख को कदापि नहीं सह सकते आप तो परोपकार परायण हैं इसी कारण वेद पुराणों में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हैं। आप अपने धर्म को देख जो चाहो सो करो, आप महा प्रभु हो मैं तुच्छ मनुष्य की भाँति बार-बार कहने योग्य नहीं। हे नारदजी ! मैं मरूँगा मैं मरूँगा इस प्रकार कहता हुआ वह शान्त हो गया और शीघ्र प्रभु के निकट धड़ाम से गिर पड़ा । उसको इस प्रकार गिरते हुए देख सारी सभा (बैकुण्ठ वासी) विस्मित हो गई । नारायण बोले- अधिमास के ऐसे शान्त होने पर महाकृपालु श्रीकृष्ण भगवान शरद चन्द्र की किरणों के समान शीतल और मेघ के समान गम्भीर शब्द से शोभायमान वचन कहने लगे । सूतजी बोले- हे ऋषियो ! वेद की ऋद्धि में तत्पर पाप समूह के नाश करने को बड़वाग्नि के समान ऐसे आदि पुरुष भगवान के वचन सुनने की इच्छा वाले नारदजी प्रसन्न मन हो कहने लगे । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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