Radha Krishna

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की इकतिस्वे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

इकत्तीसवाँ अध्याय- पुरूतोत्तम मास महात्म्य की महानता का वर्णन

आपने काँसे के संपुट का दान सब दानों से अधिक बढ़कर बताया है उसका स्पष्ट कारण मुझे बतावें । श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन् ! एक समय पार्वतीजी ने इस व्रत को किया था, तब उस समय उन्होंने महादेवजी से पूछा ऐसा कौन सा उत्तम दान है जिसके देने से मेरा पुरुषोत्तम व्रत पूर्ण हो जावे । हेदयासिंधो ! उस दान को सब लोगों के कल्याण के लिये आप मुझसे कहिये । यहसुनकर महादेवजी श्रीपुरुषोत्तम का ध्यान करके सब लोगों के कल्याण की इच्छा से पार्वतीजी से बोले-हे अपर्णे ! पुरुषोत्तम मास में व्रत की विधि पूर्ण करने के लिये वेद में कहीं भी कोई दान नहीं है । हे गिरिसुते ! श्रीकृष्ण के प्रिय पुरुषोत्तम मास में जो-जो उत्तम दान कहे हैं वे सब तुच्छ हो गये हैं । हे पार्वती ! कहीं भी ऐसे दान का विधान नहीं है जो पुरुषोत्तम मास में करने से तुम्हारा व्रत पूरा हो जावे । हे वरानने ! पुरुषोत्तम मास में व्रत पूर्ण करने के लिये सम्पुटाकार ब्रह्माण्ड का दान ही योग्य है। हे वरानने ! इस दान को कहीं भी कोई व्यक्ति नहीं दे सकता । इसलिये इस ब्रह्माण्ड के प्रतिनिधि स्वरूप काँसे का सम्पुट बनाकर उसमें तीस मालपुआ रखकर सात तागे से लपेटकर विधिवत् पूजा करके व्रत की पूर्णता के लिये विद्वान ब्राह्मण को दे दें । यदि आर्थिक स्थिति ठीक हो तो ऐसे तीस सम्पुटों का दान करें । इस प्रकार लोक हितकारी महादेवजी के ऐसे सुन्दर वचन सुनकर पार्वतीजी लोक कल्याण की इच्छा से अत्यन्त प्रसन्न हुई और तीस काँसों के सम्पुट विद्वान ब्राह्मणों को दान में देकर व्रत के विधान को पूरा करके अत्यन्त सुखी हुई । सूतजी बोले- हे विप्रो ! नारदजी भगवान बद्री नारायण के अमृत तुल्य वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार नमस्कार कर फिर कहने लगे यह पुरुषोत्तम मास सब साधनों का सर्वश्रेष्ठ मास है आज इसका माहात्म्य सुनकर मुझे पूर्ण निश्चय हो गया है। भक्ति मात्र से सुन लेने पर जब मनुष्य के महापाप नष्ट हो जाते हैं तब श्रद्धा पूर्वक विधि-विधान से जो करता है तो उसका कहना ही क्या है ? क्योंकि अमृत पीकर अत्यन्त तृप्त हुए मनुष्य को दूसरे जल पान करने की इच्छा नहीं रहती, इसलिये अब इससे आगे सुनने को मेरी कुछ भी इच्छा बाकी नहीं है । सूतजी बोले- ब्रह्मर्षि ऋषिवर नारदजी इतना कहकर शांत हो पुरातन मुनि बद्री नारायण के चरण कमलों में मस्तक रखकर नमस्कार करने लगे । जो मनुष्य भरतखण्ड में जन्म लेकर पुरुषोत्तम मास का सेवन नहीं करते वे घर-जंजाल में आसक्त हुए अधम हैं ऐसी दुष्ट बुद्धि वाले मनुष्य बार-बार जन्मते और मरते हैं तथा जन्म जन्मान्तर में पुत्र, मित्र, भार्या एवं प्रिय जनों आदि के वियोग के दुःखों से दुःखी रहते हैं । सूतजी बोले- हे द्विज श्रेष्ठो ! इस पुरुषोत्तम मास में नास्तिक बाद के शास्त्रों का वर्णन न करे, न पराई सेज पर शयन करे, न कभी झूठ बोले, न कभी परनिन्दा, आलोचना, चुगली करे, न पराया अन्न खावे, न कभी दूसरे की नकल करे, न धन की कंजूसी करे, सच्चरित्र ब्राह्मण को दान दे, धनवान होते हुए जो कंजूसी करता है वह रौरव नरक में जाता है । व्रती लोग दिन में सायंकाल के चार बजे के बाद भोजन करें । अतः वे लोग धन्य हैं जो पुरुषोत्तम मास का नियम पालन करते हैं । महाराज इन्द्रद्युम्न, यौवनाश्व और भगीरथ यह सब राजा लोग पुरुषोत्तम मास की आराधना कर श्रीकृष्ण भगवान के निकट पहुँच गये। इसलिये यह पुरुषोत्तम मास सब साधनों से श्रेष्ठ है और वांछित फल देने वाला है । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *