krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की तीसवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

तीसवाँ अध्याय- पतिव्रता स्त्रियों के लक्ष्मण और नियमों का वर्णन

नारदजी बोले -हेतपोनिधे ! आपने पहले पतिव्रता स्त्रियों की प्रशंसा की है अब आप उनके सब लक्षण मुझसे संक्षेप में कहिये । सूतजी बोले- हे ब्राह्मण ! नारदजी के इस प्रकार पूछने पर पुरातन मुनि बद्री नारायण पतिव्रता स्त्रियों के सब लक्षण कहने लगे । श्री नारायण बोले- हे नारद! सुनो मैं पतिव्रता स्त्रियों के उत्तम धर्म कहता हूँ । पति चाहे कुरूप हो, बुरे आचरण वाला हो, श्रेष्ठ स्वभाव वाला न हो, रोग से पीड़ित हो, पिशाच हो, क्रोधी हो, मदिरा पीने वाला हो, वृद्ध हो, मूर्ख हो, गूँगा हो, अन्धा हो, बहिरा हो, काना हो, रूद्र रूप हो, दरिद्री हो, कृपण हो, निन्दित हो, दीन हो, धूर्त हो, दूसरी स्त्रियों में आसक्त हो तो भी साध्वी नारी का कर्तव्य है कि मन, वचन, कर्म से पति को देवता के समान माने । किशोरी हो, युवती हो, चाहे बृद्ध हो, किसी भी स्त्री को पति के प्रतिकूल अपनी इच्छा से स्वतंत्रता पूर्वक कभी भी कुछ भी कार्य नहीं करना चाहिये । अहंकार काम तथा क्रोध को त्यागकर पति का सदा मनोरंजन करती रहे अन्य किसी दूसरे के मन को कभी भी प्रसन्न न करे । जो स्त्री पर पुरुष की तिरछी चितवन से लुभावने मीठे वचनों से, छेड़छाड़ी से, मेला तमाशे की भीड़भाड़ में, धक्का मुक्की में भी स्पर्श होने पर विकारयुक्त न हुई हो तो उस स्त्री के शरीर पर रोंगटे होते हैं वह उतने हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करती है। जो स्त्री दूसरे पुरुष के द्वारा दिये गये वैभव के लालच में न आकर अपने ही पति से प्रेम करे तथा मन कर्म वचन से पर पुरुष से आलिंगन न करे वही स्त्री लोक विभूषित सती है। कुटनी द्वारा चापलूसी करने पर, जबरन घेरने पर, कपड़े गहनों के लालच में न आकर भी जो नारी विकार युक्त नहीं होती वही सती है। जो पर पुरुष के देखने पर उसे आप न देखे, दूसरे के हँसने पर स्वयं न हँसे, आवाज कसी करने पर बोले नहीं वही श्रेष्ठ लक्षणों वाली साध्वी नारी है। रूप और यौवन से भरपूर तथा नृत्य और गाने में योग्य होने पर भी अपने ही समान कुशल युवक को देखकर जिस स्त्री के चित्त में कोई विकार उत्पन्न नहीं होता वही सती है । सुन्दर, जवान, मनमोहक, मदमाती नवेलियों को रिझाने वाले ऐसे नवयुवक के मिलने पर भी जिसका मन विचलित नहीं होता वही पतिव्रता है । पतिव्रता स्त्रियों को पति के सिवाय अन्य कोई देवता, मनुष्य, गन्धर्व प्यारा नहीं होता । अतः पत्नि का कर्तव्य है कि कभी भी अपने पति का अप्रिय न करे । जो पति के पीछे आप भोजन करे, पति के दुःख से आप दुःखी रहे, उसके प्रसन्न होने पर आप प्रसन्न रहे, पति के परदेश जाने पर साधारण वस्त्र पहिने, पति के सो जाने पर सोवे और पति से पहिले उठे। पति के मर जाने पर अग्नि में प्रवेश कर चाहे सती हो जावे परन्तु अपने मन में किसी दूसरे पुरुष की इच्छा न करे वही पतिव्रता है। सास श्वसुर के प्रति भक्ति भाव रक्खे और पति के प्रति विशेष श्रद्धा रखे । धर्म कार्य में अनुकूल रहे और गृहकार्य के निमित्त द्रव्य संचय करे, दिन भर घर के काम-धन्धे में लगी रहे। खेत, वन या गाँव से घर आये भर्ता को देख उठकर आसन और जल देकर स्वागत करे । सदा प्रसन्न रहे, समय पर भोजन तैयार करे, भोजन करते समय पति से कभी कटु वचन न बोले । पत्नि को आसन, भोजन व दान देने में, सम्मान करने में और मधुर भाषण देने में सदा तत्पर रहना चाहिये । घर खर्च के लिये जो भी स्वामी ने दिया हो उससे घर खर्च चलावे और अपनी बुद्धि से कुछ बचा भी लेना चाहिये । दान के लिये दिये हुए द्रव्य में से लोभ वश अपने पास तनिक भी न रक्खे । भर्ता की आज्ञा के बिना अपने बांधवों को धन न दे । असंतोष रखना, दूसरे पुरुष के साथ संलाप, आहार, बिहार, व्यापार सम्बन्धी वार्ता, ठहाका मारकर हँसना, अत्यन्त क्रोध करना, नाक मुँह सिकोड़ना, गुस्से में भरी रहना यह सब पतिव्रता नारी को छोड़ देना चाहिये । पति जो वस्तु न खावे, न पीवे, उसको पतिव्रता स्त्री त्याग दे । तेल लगाना, स्नान करना, शरीर में उवटन लगाना और दाँतों की शुद्धि पतिव्रता स्त्री पति की प्रसन्नता के लिये नित्य करे । हे मुने ! त्रेतायुग से स्त्रियों के मासिक धर्म (रजो दर्शन) होता चला आया है अतः स्त्री उस दिन से तीन दिन छोड़कर चौथे दिन गृह कार्य के लिये शुद्ध होती है । पहिले दिन चांडालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिन रहती है, चौथे दिन शुद्ध होती है। स्नान, शौच, गाना, रोना, हँसना, सवारी पर चढ़ना मालिश करना, सहेलियों के साथ जुआ खेलना, चन्दन आदि लगाना, दिन में सोना, दाँतुन करना, मैथुन करना, पूजा पाठ करना और देवताओं को नमस्कार करना ये सब कार्य रजस्वला स्त्री न करे । रजस्वला से न स्पर्श करे न संभाषण करे । रजस्वला स्त्री अपना मुख तीन दिन तक न दिखावे, जब तक स्नान करके शुद्ध न हो जावे तब तक बोले नहीं । रजस्वला स्त्री स्नान करके पर पुरुष को न देखे प्रथम सूर्य का दर्शन करके आत्म शुद्धि के लिये पंचगव्य पीवे, श्रेष्ठ नारी नियम से रहे यदि गर्भिणी हो जाय तो गर्भवती निम्न नियम पालन करे, वस्त्र और आभूषण पहिन कर रहे तथा अपने भर्ता को प्रिय करने में लगी रहे । सदा प्रसन्न मुख, धर्म में तत्पर और शुद्ध रह अपनी आत्मरक्षा करे, विभूषणों से विभूषित रहे, वास्तु देवता का पूजन करती रहे जिससे गर्भ रक्षा होती रहे । चरित्रहीन स्त्रियों से न बोले, सूप की वायु शरीर में न लगे, पराये घर में भोजन न करे और जिसके बच्चे होकर मर जाते हों ऐसी स्त्री के साथ न रहे, न पास बैठे, किसी भयंकर दृश्य को न देखे, कोई भयंकर कथा वार्ता न सुने, गरिष्ठ अत्यन्त गरम और कच्चा भोजन न करे जिससे अजीर्ण हो । इस प्रकार आचरण करने से पतिव्रता स्त्री श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करती है विपरीत आचरण करने से या तो गर्भ गिर जाते हैं या स्तम्भ न होने का भय रहता है, अपने से गुणहीन सौत की निन्दा न करे, राग, ईर्ष्या और डाह आदि उत्पन्न होने पर भी आपस में एक दूसरे के प्रति कटु शब्द न कहे, न एक दूसरे का नाम ले और न एक दूसरे का बखान करें । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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