krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की उन्तीसवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

उन्तीसवाँ अध्याय- देवदूतां के ज्ञानोपदेश से कदर्य का हरिलोक गमन व देनिक चर्चा

पुण्यशील और सुशील बोले-हे कदर्य ! गोलोक को चलिये देर क्यों कर रहे हो ? तुमने विशेष रूप से भगवान पुरुषोत्तम का सामीप्य पाया है। कदर्य बोला- मुझे अभी बहुत से कर्मों के फल भोगने हैं लेकिन किस प्रायश्चित् से गोलोक मिला । यह नहीं समझ पाया, पृथ्वी पर जितनी वर्षा की धारायें हैं, जितने तृण और रजकण हैं तथा जितने आकाश में तारे हैं उतने ही मेरे पाप हैं। मैंने यह सुन्दर शरीर कैसे पाया । हरि के प्रिय पार्षदो ! इसका कारण मुझे बताओ। श्रीनारायण बोले-कदर्य की ऐसी वाणी सुनकर हरि के दूत बोले- अहा हे देव ! क्या तुमने यह पद पाने का महान साधन नहीं जाना । हे प्रभो ! पुरुषोत्तम मास विष्णु का प्रिय और महापवित्र है, इसमें तुमने देव दुर्लभ तप किया है। हे महाराज ! वन में बानर शरीर से अनजाने और मुख रोग के कारण न खाने से तुम्हारा निराहार व्रत हो गया । तुमने बानर पने की चंचलता से वृक्ष से फल तोड़-तोड़कर पृथ्वी पर फेंक दिये जिनसे अन्य लोगों की तृप्ति हुई और दुःख के कारण तुम पानी भी नहीं पी सके जिससे तुम्हारा अज्ञानता वश पुरुषोत्तम मास में बड़ा भारी तप हो गया । हे अनघ ! तुम्हारे द्वारा फलों के गिराये जाने से परोपकार हो गया । वन में विचरते महा भयंकर शीत, वायु, धूप आदि सहन की और इस रमणीक श्रेष्ठ तीर्थ में पाँच दिन गोते लगाये । जिससे तुम्हें पुरुषोत्तम मास के स्नान का फल मिला । इस प्रकार तुम्हारे रोगवश होने से अनजाने ही उत्तम तप हो गया सो वह सब सफल हो गया और अब तुमने अनुभव भी कर लिया। जो मनुष्य इस पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा पूर्वक इसके उत्तम माहात्म्य को जानकर विधि सहित कर्म करते हैं उनका तो कहना ही क्या है ? आपने जैसा साधन किया, वैसा करने में अन्य कोई समर्थ नहीं । इस मास में एक उपवास करने से ही मनुष्य पाप समूह से छूट जाता है । इस मास के समान पुरुषोत्तम की प्रीति देने वाला अन्य कोई नहीं है। इस पुरुषोत्तम का जो व्रत करते हैं वे धन्य हैं । इस भरत खण्ड में मनुष्य जन्म पाकर जो पुरुषोत्तम का सेवन करते हैं वे सदा महा भाग्यशाली हैं और उन्हीं का जन्म सफल है जिनका पुरुषोत्तम मास स्नान, दान, जपादि में बीता है । पुरुषोत्तम मास में दान, पितृ कार्य (श्राद्ध) और अनेक प्रकार के तप करने से ये सब अन्य मासों की अपेक्षा करोड़ गुने फलदायक होते हैं। जो पुरुष पुरुषोत्तम मास में स्नान दान नहीं करता उस नास्तिक, पापी, मूर्ख, पाखण्डी, दुष्ट, अधर्मी तथा आलोचक को धिक्कार है । श्रीनारायण बोले- पुण्यशील और सुशील द्वारा कदर्य ब्राह्मण अपने पूर्व वृत्तांत को सुनकर पुलकित हो आश्चर्य में पड़ गया । प्रथम तीर्थ के देवताओं और कालिंजर पर्वत को फिर वन के देवों को छोटे-छोटे पेड़ों तथा सब लताओं और वृक्षों को उसने नमस्कार किया तत्पश्चात् नम्रता पूर्वक विमान की प्रदक्षिणा कर, मेघ के समान श्याम वर्ण का हो सुन्दर पीताम्बरधारी वह विमान पर बैठ गया । तब सब देवता स्तुति करने लगे, गन्धर्व एवं किन्नर आदि बाजों के साथ गाने लगे, इन्द्र आदि देवता बड़े हर्ष से पुष्प वर्षा कर सादर पूजा करने लगे । पश्चात् वह आनन्द से योगियों को दुर्लभ गोप, गोपी और गौओं से सेवित रासमण्डल से सुशोभित गोलोक को गया जिस लोक में न बुढ़ापा आता है और न मृत्यु ही होती है और न कोई शोक होता है। ऐसे लोक को कदर्य (चित्रशर्मा) ब्राह्मण पुरुषोत्तम मास के सेवन से बानर शरीर त्याग कर गया जहाँ दो भुजाधारी मुरलीधर पुरुषोत्तम के दर्शन करके आनन्दित हो गया । श्रीनारायण बोले- इस आश्चर्यमय दृश्य को देखकर सब देवता चकित हो गये और पुरुषोत्तम की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थान को चले गये । नारदजी बोले -हे तपोधन ! आपने ये प्रातःकाल के कर्म बताये, अब दिन के पिछले भाग में क्या कर्म करने चाहिये ? हे नाथ ! गृहस्थ के उपकार के लिये मुझे बताइये क्योंकि आप जैसे महात्मा सबके उपकार के लिये सदा विचरते रहते हैं । श्रीनारायण बोले- प्रातः काल का कर्म विधि पूर्वक समाप्त करके फिर मध्यान्ह काल की संध्या करके अग्नि को आहुति देकर अनुचरों सहित अल्प भोजन कर बैठ जायँ । भोजन कर, तकिया आदि सहित कोमल शैय्या पर सोवे । गृहस्थी पुरुष सदैव भली प्रकार से गृहस्थ के कर्मों को करें । हिंसा नहीं करनी चाहिये, सत्य बोलना, सब प्राणियों की रक्षा और दया करना, यह सब गृहस्थियों के लिये धर्म कहे गये हैं । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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