krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की सत्तइसवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

सत्ताईसवाँ अध्याय- (दृढ़धन्वा का तप एवं स्वर्ग गमन, एक वानर की कथा)

श्रीनारायण बोले कि हे नारदजी! इस प्रकार बाल्मीकि मुनि के कहकर चुप होने पर दृढधन्वा राजा ने उनको नमस्कार किया फिर भक्ति पूर्वक अपनी स्त्री सहित मुनि का पूजन किया । पूजा को अंगीकार कर मुनि आशीर्वाद देते हुए बोले- हे राजन् ! तेरा कल्याण हो, अब मैं पाप नाशिनी सरयू नदी को संध्या करने के लिये जा रहा हूँ । इस समय सायंकाल हो गया है ऐसा कह बाल्मीकि मुनि तत्काल चले गये । राजा दूर तक बाल्मीकिजी को पहुँचाकर अपने महल को लौट आया और अपनी गुण सुन्दरी रानी से बोला- हे सुन्दरी ! राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य इन छः शत्रुओं से भरे हुए गन्धर्व रूपी नगर के समान इस असार संसार में मनुष्यों को क्या सुख है ? कीड़ा, विष्ठा तथा राख नाम धारी और बात, पित्त, कफ से युक्त मल, मूत्र, रक्त से व्याप्त इस देह से क्या मोह है ? हे प्रिये ! मैं इस क्षणभंगुर शरीर से ध्रुव पदार्थ की प्राप्ति के लिये पुरुषोत्तम का स्मरण करने वन को जाता हूँ । यह सुनकर पतिव्रता गुण सुन्दरी विनय से नम्रता पूर्वक दुःखित हो हाथ जोड़कर अपने पति से बोली- हे भूपते ! मैं भी आपके साथ चलूँगी क्योंकि पतिव्रता स्त्रियों के तो पति ही देवता हैं । जो स्त्री पति के चले जाने पर पुत्र रहती है वह पुत्र वधू के आधीन हो पराये घर में कुतिया की घर में भाँति (लानत व फटकार आदि सहते हुए) रहती है । पिता भाई और पुत्र सभी थोड़ा ही साथ देते हैं परन्तु सब कुछ वस्तु देने वाला एक मात्र पति ही होता है तो फिर ऐसे पति भर्ता के साथ कौन-सी स्त्री न जायेगी । इस प्रकार अपनी प्रिया के वचन मानकर पुत्र को राज्य अभिषेक कर स्त्री सहित शीघ्र ही मुनियों की भाँति वन को चला गया। दोनों स्त्री पुरुष हिमालय के निकट गंगा तट पर रहने लगे और हे नारद ! पुरुषोत्तम मास के आने पर विधि पूर्वक तीनों समय स्नान कर पुरुषोत्तम भगवान का स्मरण करते हुए स्त्री सहित तप करने लगा । ऊपर को दोनों हाथ किये, बिना किसी सहारे पैर के अँगूठे के बल पर खड़ा हो, आकाश में दृष्टि लगाये, निराहार रहकर राजा श्रीकृष्ण को जपने लगा । इस प्रकार व्रत की विधि में स्थित हुए तपोनिधि राजा की पतिव्रता रानी उसकी सेवा में तत्पर रहती थी। ऐसा करते हुए पुरुषोत्तम मास के बीतने पर वहाँ छोटी-छोटी घंटिकाओं के जाल से बजता हुआ एक सुशोभित विमान आया । पुण्यशील और सुशील दोनों हरिगणों के सहित आये हुए उस विमान को देखकर राजा स्त्री सहित आश्चर्य में पड़ गया । विमान में बैठे हुए दोनों हरि गणों को रानी सहित राजा ने नमस्कार किया । देव दूतों ने उन दोनों को विमान पर चढ़ा लिया, स्त्री सहित राजा विमान में चढ़कर सुन्दर दिव्य शरीर धारण कर शीघ्र ही गोलोक को चला गया । इस प्रकार राजा पुरुषोत्तम मास में तप करके निर्भय लोक में जाकर हरि के निकट आनन्द करने लगा और राजा की पतिव्रता स्त्री भी पुरुषोत्तम मास में तप करते हुए अपने पति की सेवा करती हुई पति लोक को गई श्रीनारायण बोले-हे नारदजी ! मेरे एक जिह्वा है अतः इस समय मैं उसका क्या वर्णन करूँ ? इस पृथ्वी पर पुरुषोत्तम मास के समान अन्य कुछ भी नहीं है। हजारों जन्म तक तप करने से भी वह फल प्राप्त नहीं होता है जो पुरुषोत्तम मास के सेवन से प्राप्त होता है। पुरुषोत्तम मास में भूलकर भी उपवास, दान, स्नान और जप करने से जन्म जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। जैसे पुरुषोत्तम मास में अनजाने एक बन्दर के तीन दिन स्नान करने से ही पूर्व जन्म के सब प्रकार के पाप समूह नाश हो गये और वह भी दिव्य शरीर धारण ● पुरुषोत्तम मास माहात्म्य ● कर विमान पर चढ़कर वृद्धावस्था तथा मृत्यु से रहित होकर दिव्य लोक को गया । इसलिये यह सब मासों में अत्यन्त श्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास है जो दुष्ट बन्दर भी अनायास हरि भगवान को प्राप्त गया। जो पुरुषोत्तम मास का सेवन नहीं करते वे महा मूढ़ हैं । वे धन्य हैं, कृतार्थ हैं और उनका जन्म भी सफल है जो स्नान, दान, जप, उपवास आदि करते हैं। नारदजी बोले-वेद में सम्पूर्ण अर्थों का साधन मनुष्य जन्म कहा है परन्तु बन्दर भी अनजाने बन्धन से मुक्त हो गया यह आश्चर्य की बात है । हे तपोनिधे ! सब लोगों के हित के लिये यह कथा भी मुझसे कहो कि उस बन्दर ने तीन रात्रि कहाँ स्नान किया, वह बन्दर कौन था, क्या खाता था, कहाँ उत्पन्न हुआ और कहाँ रहता था ? उसको किस कारण से पुरुषोत्तम मास में ऐसा श्रेष्ठ फल प्राप्त हुआ ? यह मुझे सुनने की जिज्ञासा है अतः विस्तार पूर्वक कहो, क्योंकि मुझे आपके मुख से कथा रूपी अमृत सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती । श्रीनारायण बोले- केरल देश में कोई एक ब्राह्मण मधु मक्खियों की तरह नित्यप्रति धन इकट्ठा करने में लगा रहता था । वह बड़ा लालची तथा कंजूस ब्राह्मण था इस कर्म के कारण लोक में वह “कदर्य” नाम से विख्यात हो गया था । उसके पिता का रखा हुआ पहिला नाम “चित्रशर्मा” था । उसने श्रेष्ठ अन्न और वस्त्रों को कभी नहीं भोगा उस दुर्बुद्धि ने न कभी हवन किया, न कभी पितरों का श्राद्ध किया । अपनी ख्याति के लिये भी कुछ नहीं किया, स्त्री पुत्रादि का भी पालन नहीं किया । अन्याय से इकट्ठे किये हुए धन को पृथ्वी में गाढ़ दिया था न कभी माघ मास में तिल दान किया न कार्तिक मास में दीपदान किया और न ब्राह्मण भोजन कराया । वैशाख मास में अन्नदान और व्यतीपात में स्वर्णदान तथा वैधृति में चाँदी का दान भी नहीं किया । सूर्य संक्रान्ति में भी कभी दान नहीं किया चन्द्र और सूर्य ग्रहण में भी न कभी जप किया न हवन । वर्षा, वायु, धूप से दुःखित, दुबला, काला शरीर आँखों में आँसू भरकर सब जगह दीन वचन बोलता फिरता था । वह मूर्ख धन के लोभ में सदा पृथ्वी पर विचरता हुआ बार-बार कहता था कि ” मुझ गरीब ब्राह्मण को कोई कुछ दे दो” वह ब्राह्मण सायंकाल गौ दुहते समय तक कहीं भी नहीं बैठता था। वह जहाँ भी जाता लोग धिक्कारते थे । इससे वह ज़ला भुना उद्विग्न मन वाला घूमता फिरता रहता था । उसका मित्र वन में विचरने वाला एक माली था । कदर्य ब्राह्मण उससे बार-बार रो रोकर अपना दुःख कहता था कि नगर निवासी लोग मेरा बड़ा तिरस्कार करते हैं अत: इस नगर में मेरा अब रहना उचित नहीं है । इस प्रकार कदर्य ब्राह्मण की अत्यन्त दीन वाणी सुनकर माली को दया आ गई । शरण में आये हुए ब्राह्मण को दीन जान दया करता हुआ माली बोला-हे कदर्य ! तुम मेरी इस बाड़ी में रहो । सब लोगों से तिरस्कृत ब्राह्मण कदर्य माली का वचन सुनकर आनन्द से उस बाड़ी में रहने लगा । नित्य उस माली मेरी दुर्बुद्धि मृग तृष्णा जैसी हो गई इस पवित्र भारत खण्ड में देवताओं को भी दुर्लभ ऐसा मनुष्य देह प्राप्त हुआ जो धन के लोभ में फँसकर मैंने कुछ भी नहीं किया, व्यर्थ ही जन्म खोया और जो मैंने बहुत दिन तक धन इकट्ठा किया वह भी सब दूसरों का हो गया। इस समय मैं पराधीन होकर काल के पास में बँधा हुआ क्या कर सकता हूँ ? मनुष्य जन्म प्राप्त करके कुछ भी शुभ कार्य नहीं किया न दान, हवन, तप किया न माघ मास में मकर के सूर्य में गंगा स्नान ही किया न पुरुषोत्तम मास के अन्त में तीन दिन उपवास किया और न कार्तिक मास में तारागणों के रहते समय प्रातःकाल स्नान किया। मैंने पुरुषार्थ का देने वाला मनुष्य शरीर भी खा-पीकर पुष्ट नहीं किया आश्चर्य है कि मेरा इकट्ठा किया हुआ सब धन पृथ्वी में ही गढ़ा हुआ रह गया। मुझ दुष्ट बुद्धि ने जीवन पर्यन्त जीवों को कष्ट दिया। मैंने कभी भी अपनी जठराग्नि को अन्न से तृप्त नहीं किया, कभी भी खर्च करके श्रेष्ठ वस्त्रों से शरीर को नहीं ढका, न समाज के लोगों को, न परिवार को, न बन्धु-बांधव, बहिन, भानजा, जमाई, पुत्री, पिता, माता, छोटे भाई, पतिव्रता स्त्री, देवता और ब्राह्मण आदि किसी को कभी सन्तुष्ट नहीं किया और न मिठाई आदि से एक बार भी किसी को तृप्त किया । इस प्रकार विलाप करते हुए ब्राह्मण को यमराज के दूत यमराज के निकट ले गये । चित्रगुप्त उसके शुभ अशुभ कर्मों को देखकर अपने स्वामी धर्मराज से बोला-महाराज ! धन का लोभी यह कदर्य ब्राह्मण अधम है इसने माली का विश्वास पात्र बनकर विश्वास घात किया । यह स्वयं फलों को चुराकर खाता था और शेष चुराये हुए फलों को धन के लोभ से बेच देता था । अतः इसके ऊपर पहले फल चुराने का पाप और दूसरा अत्यन्त विश्वासघात का पाप ये दो पाप अत्यन्त उग्र हैं। इसके और भी अनेक पाप हैं । श्रीनारायण बोले- हेनारदजी ! चित्रगुप्त के वचन सुनकर धर्मराज अत्यन्त क्रोधित होकर बोले- इसे हजार जन्म तक बन्दर की योनि में रखो पश्चात् इसे विश्वासघात का फल मिलेगा । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

 

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