radha krishna

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की छबिसवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

छब्बीसवाँ अध्याय- उद्यापन के बाद व्रत त्याग की विधि एवं धर्म वर्णन

बाल्मीकिजी बोले-सम्पूर्ण पापों के नाश के लिये विष्णु भगवान की प्रसन्नता के लिये विधि पूर्वक धारण किये हुए नियमों को उद्यापन के बाद त्याग की विधि कहता हूँ । हे राजन् ! नक्त व्रत (रात्रि में भोजन करने वाला मनुष्य व्रत की समाप्ति में ब्राह्मणों को भोजन करावे । अयाचित-व्रत (बिना मांगे जो कुछ मिल जाय उसे ही खाकर रहे) में स्वर्ण दान करें । अमावस्या को भोजन का नियम करने वाला दक्षिणा सहित गौ दान दे, आँवला से स्नान करने वाला दही या दूध दे । हे राजन् ! फलों का नियम किया है तो फल दान करे । तेल छोड़ा हो तो घी दे, घी का नियम लिया हो तो दूध दे । हे राजन् ! अन्न का नियम लिया हो तो गेहूँ और चावल दे । हे नृपश्रेष्ठ ! पृथ्वी में शयन करने के नियम में रुई का गद्दा तकिया और चद्दर सहित शय्या दे, पत्तल में भोजन करने वाला घी और खाँड का दान कर ब्राह्मण को भोजन करावे, मौन व्रत में सपत्नीक ब्राह्मण को भोजन करावे तथा सुवर्ण सहित घंटा तिल का दान दे । हे राजन् ! नख और बाल न बनवाने के नियम में दर्पण दे, जूता पहिनना छोड़ा हो तो जूतों का दान दे । नमक त्यागने पर अनेक प्रकार के रस दान दे, दीपदान किया हो तो पात्र सहित दीप दान करे । भक्ति से अधिमास में जो मनुष्य इस प्रकार करता है वह सदा बैकुण्ठ वास करता है । ताँबे की कटोरी में घी और स्वर्ण की बत्ती रखकर दीप का दान करे व्रत की सम्पूर्णता के लिये चाहे एक पल का ही दान करे । एकान्तर उपवास में वस्त्र उड़ाकर सुवर्ण के टुकड़ा सहित सोने के या मिट्टी के आठ घड़ा दान में दे । मास के अन्त में छाता जूतों सहित तीस लड्डुओं ‘का दान करे और बोझा ढोने लायक बैल दे, इन सबके अभाव में या असमर्थ होने पर हे राजन् ! सब व्रतों का सिद्धि दाता ब्राह्मण का आशीर्वाद होता है। जो मनुष्य एक मात्र अन्न से मल मास को बिताता है वह मनुष्य चतुर्भुज (विष्णुरूप) हो परम गति प्राप्त करता है। इस संसार में एक अन्न से उत्तम कुछ भी नहीं है। एक अन्न के सेवन से सिद्ध, मुनिजन उत्कृष्ट मोक्ष को प्राप्त हुए हैं। जो मनुष्य अधिमा में रात्रि में भोजन करता है वह राजा हो सब कामनाओं को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। प्रातःकाल देवता भोजन करते हैं और दुपहर को मुनिजन, तीसरे पहर में पितृगण और चौथे पहर में मनुष्य अपनी आत्मा की तृप्ति के लिये भोजन करे । हे राजन् ! जो सब समय को व्यतीत कर चौथे पहर में भोजन करता है, उसके ब्रह्महत्या आदि सब पाप नाश हो जाते हैं और हे महीपाल ! रात्रि में भोजन करने वाले को सबसे अधिक पुण्य मिलता है और वह प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ करने का फल पाता है । जो हरिभक्त अधिमास में उड़द नहीं खाता है वह सब पापों से छूट जाता है। जो पापी ब्राह्मण होकर भी कोल्हू में तिल पेरता है । हे राजन् ! वह जितना तिल पेरता है उतने तिल की संख्या के बराबर रौरव नरक में रहकर अंत में चांडाल की योनि पाता है तथा कोढ़ी होता है । जो मनुष्य इस अधिमास में शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की एकादशी का उपवास करता है वह विष्णु रूप हो देवताओं से पूजित तथा अप्सराओं से सेवित हो विष्णु लोक में जाता है । एकादशी व्रत करने वाला दशमी और द्वादशी को एक बार भोजन करे, भगवान की प्रसन्नता के लिये जो ऐसा करता है वह स्वर्ग में जाता है । हे राजन् ! कुशा के आसन को न त्यागे । जो पुरुष कुशा से मल, मूत्र, कफ या रुधिर को साफ करता है अर्थात् झाडू का काम लेता है। वह विष्टा का कृमि होता है । कुशा अत्यन्त पवित्र होती है, कुशा के बिना सभी धर्म क्रिया वृथा है क्योंकि कुशा की जड़ में ब्रह्मा, बीच में जनार्दन भगवान और अग्रभाग में शंकर निवास करते हैं इसलिये कुशा से मार्जन करे । शूद्र जमीन से कुशा को न उखाड़े और कपिला गाय का दूध न पीवे । हे भूपते ! न ढाक (पलास) की पत्तल में भोजन करे और न ओंकार मंत्र का उच्चारण करे, न यज्ञ का बचा हुआ अन्न खावे, न कभी कुशा के आसन पर बैठे, न यज्ञोपवीत धारण करे, न वेद की कोई क्रिया करे यदि विधि विधान का परित्याग कर जो शूद्र मनमाना आचरण करता है तो वह अपने पितरों सहित नरक में जाता है । पश्चात् वह मुर्गा, सूअर और बानर की योनि पाता है । इसलिये शूद्र कभी ओंकार मंत्र का उच्चारण न करे । हे राजन् ! ब्राह्मणों के नमस्कार करने से शूद्र का नाश हो जाता है । हे महाराज ! इतना करके व्रत परिपूर्ण होता है और ब्राह्मणों को दक्षिणा न देने से मनुष्य नरक में जाता है । व्रत में विघ्न होने से अन्धा और कोढ़ी होता है । हे भूप ! पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मनुष्य स्वर्ग को जाता है अतएव कल्याण की इच्छा करने वाला विज्ञानी पुरुष ब्राह्मणों के वचनों का उल्लंघन न करे । यह मैंने कल्याणकारी, पाप नाशक, शुभ फल देने वाला, माधव भगवान को प्रसन्न करने वाला मन को आनन्द दाता उत्तम धर्म का रहस्य बतलाया है। पुरुषोत्तम भगवान की कथा को उनकी प्रसन्नता के लिये हे राजन् ! जो प्रेम से सुनेगा या पढ़ेगा वह योगीश्वर हरि भगवान के परम लोक को प्राप्त होगा ।

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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