radha krishna

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की पचीसवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

पच्चीवाँ अध्याय- दृढधन्वा उपाख्यान एवं पुरूषोत्तम मास की उद्यापन विधि |

दृढ़धन्वा बोला-हे ब्रह्मन् ! अब आप पुरुषोत्तम मास के

व्रती मनुष्यों के लिये कृपया भली-भाँति उद्यापन विधि बताइये । बाल्मीकिजी बोले-पुरुषोत्तम मास के व्रत की सम्पूर्ण फल प्राप्ति के लिये उद्यापन विधि संक्षेप में कहता हूँ । पुरुषोत्तम मास में कृष्ण पक्ष की चौदस, नवमी या अष्टमी तिथियों में उद्यापन करना चाहिये । पवित्र पुरुषोत्तम मास में प्रातःकाल उठकर नित्य क्रिया करके जो पूजन सामग्री सुलभ हो उसी से प्रातः क्रिया करे । फिर प्रसन्न चित्त से विष्णु भक्त तीस सदाचारी ब्राह्मणों को उनकी पत्नियों सहित निमन्त्रित करे अथवा यथा शक्ति श्रद्धानुसार पाँच या सात ब्राह्मणों को सपत्नीक आमन्त्रित करे फिर दुपहर को एक द्रोण (लगभग 16 किलो) आठ किलो या चार किलो यथा शक्ति पाँच धान्यों से उत्तम सर्वतोभद्र बनावे । सर्वतोभद्र मण्डप के ऊपर सोने, चाँदी, ताँबा या मिट्टी के जिसमें छिद्र न हो ऐसे चार कलश स्थापित करें । चारों दिशाओं में पुरुषोत्तम भगवान की प्रसन्नता के लिये कलशों पर श्रेष्ठ वस्त्र से लपेटकर नारियल रखे उनके ऊपर पान रखे । चारों कलशों पर क्रम से वासुदेव, हलधर, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध देवताओं की स्थापना करें । पश्चात् पुरुषोत्तम मास के आरम्भ में जिस कलश पर श्री राधा सहित देव देवेश पुरुषोत्तम भगवान की मूर्ति स्थापित की है उसे वहाँ से लाकर मण्डप के ऊपर बीचों बीच में स्थापित करे । वैष्णव ब्राह्मण को आचार्य बनाकर चार ब्राह्मण जप के लिये वरण करे, उन ब्राह्मणों को हस्त मुद्रा आदि छापे के दो-दो वस्त्र दे। फिर आचार्य को धोती, दुपट्टा, अँगूठी आदि से विभूषित कर शरीर शुद्धि के लिये प्रायश्चित करें। फिर पूर्वोक्त विधि से सपत्नीक पूजा करे । वरण किये हुए चारों ब्राह्मणों से चतुर्व्यूह का जप करावे । चारों दिशाओं में चार दीपक जलावे, फिर क्रम से नारियल आदि को अर्घ्य प्रदान करे पश्चात् दोनों घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथों में पंच रत्न और श्रेष्ठ ऋतु फल लेकर श्रद्धा भक्ति सहित प्रसन्नचित्त से श्रीहरि भगवान का स्मरण करता हुआ इस मंत्र से अर्घ्य दे-

मंत्र- देव देव नमस्तुभ्यं पुराण पुरुषोत्तम । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे ॥

हेदेव देव पुराण पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है है हरि ! के राधा सहित मेरे दिये हुए अर्घ्य को ग्रहण करें। नवीन मेघ के से समान श्याम शरीर, दो भुजा धारी मुरलीधर, पीताम्बरधारी, न राधासहित पुरुषोत्तम देव को मैं नमस्कार करता हूँ । इस

प्रकार भक्ति से राधा सहित पुरुषोत्तम भगवान को नमस्कार कर नाम मंत्रों से अन्त में स्वाहा लगाकर तिलों से हवन करे। फिर हवन के अन्त में उन्हीं मंत्रों से तर्पण और मार्जन करे फिर राधा सहित पुरुषोत्तम देव की आरती करें।

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

 

 

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