krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की चौबीसवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

चौबीसवाँ अध्याय- मणिग्रीव शूद्र के पाप नाश की कथा एवं दीपदान की महिमा |

मणिग्रीव बोला- हे द्विजवर ! मैं विद्वानों से युक्त सुन्दर चमत्कारपुर नगरी में अपनी पत्नी के साथ रहता था । धनाढ्य पवित्र आचरण वाला एवं परोपकारी होने पर भी मुझ में प्रारब्धवश खराब बुद्धि उत्पन्न हुई । मैंने अपनी दुष्ट बुद्धि से अपने धर्म का त्याग करते हुए नित्य परस्त्री का उपभोग किया न पीने योग्य मदिरा आदि वस्तुओं का पान किया । इस कारण धन की कमी होने पर मैं चोरी, लूटपाट आदि हिंसक कार्यों में रहने लगा । तब मुझे मेरे बन्धुओं ने त्याग दिया तदनंतर महा बलवान राजा ने मेरा धन लूट लिया और जो कुछ घर में शेष बचा सो बाँधवों ने ले लिया । इस प्रकार सबों से तिरस्कार किया हुआ में वन में रहने लगा । वन के घोर दुःखों से दुःखित मैं दुरात्मा नित्य प्रति जीव हिंसा करके अपनी स्त्री सहित जीवन निर्वाह करता हूँ । हे ब्रह्मन् ! अब आप मेरे ऊपर कृपा करो, मेरे पूर्व जन्म के पुण्य प्रताप से ही आप इस गहन वन में आये हैं । हे महामुने ! स्त्री सहित हम दोनों आपकी शरण हैं। आप अपने उपदेश रूपी प्रसाद से हमें कृतार्थ करें जिससे हमारा घोर दारिद्र्य क्षण भर में नाश हो जाय और अतुल वैभव प्राप्त कर यथेष्ठ विचरण करें । उग्रदेवजी बोले- हे महाभाग ! तू कृतार्थ है तूने मेरा अतिथि सत्कार किया है इससे तेरा कल्याण होगा जो बिना व्रत, बिना दान, बिना तीर्थ के तेरा दारिद्र्य नाश होगा ऐसा मैंने निश्चय किया है। इस माह के आगे अब जो तीसरा माह आवेगा वह पुरुषोत्तम मास है । अतः तुम दोनों स्त्री पुरुष यत्न से पुरुषोत्तम भगवान की प्रसन्नता के लिये दीपदान करना जिससे तेरी महान दरिद्रता जड़ से नाश हो जायेगी । तिल के तेल से दीपदान करना, ऐश्वर्य होने पर घी से करना, इस समय वन में रहते हुए तेरे पास इन दोनों में से कुछ भी नहीं है । हे मणिग्रीव ! पुरुषोत्तम मास में तू स्त्री सहित हिंगोट के तेल से दिया जलाना । पहले इस तालाब में स्त्री सहित स्नान करना फिर दीपक जलाना । तेरे अतिथि सत्कार से प्रसन्न होकर मैंने वेद द्वारा प्रतिपादित यह उपदेश स्त्री सहित तुम दोनों को दिया है। बिना विधि के करने वाले को भी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यदि विधि विधान से करे तो उसका कहना ही क्या है ? वेद में कहे हुए कर्म और नाना प्रकार के दान पुरुषोत्तम मास के दीपदान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते । सम्पूर्ण तीर्थ सब शास्त्र, योग, ज्ञान, सांख्य, सम्पूर्ण तंत्र शास्त्री, कृच्छ्र, चांद्रायण आदि समस्त व्रत, वेद का स्वाध्याय, गया श्राद्ध, गौमती नदी के तट का सेवन, हजारों सूर्य चंद्र ग्रहण, सैकड़ों व्यतीपात योग आदि तथा क्षेत्रों में श्रेष्ठ कुरुक्षेत्रादि और दंडकादि उत्तम वन भी पुरुषोत्तम मास के दीपक की सोलहवीं कला को प्राप्त नहीं कर सकते । हे वत्स ! यह दीपदान धन धान्य को बढ़ाने वाला, पशु, पुत्र, पौत्र, यश, वैभव आदि का देने वाला अत्यंत गुप्त है यह चाहे जिस किसी को नहीं कहना । बाँझ स्त्री के बाँझपन को दूर करने वाला, स्त्रियों को सुहाग देने वाला, राज्य से छूटे हुए को राज्य का देने वाला, मनुष्यों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाला यदि कुमारी कन्या इस व्रत का अनुष्ठान करे तो उसे दीर्घ आयु वाला और सर्व गुण सम्पन्न पति मिले । स्त्री की इच्छा करने वाले को श्रेष्ठ सुशील एवं पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है । विद्यार्थी को विद्या प्राप्त होती है, सिद्धि का इच्छुक श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करता है, गढ़ा खजाना चाहने वाले को खजाना मिलता है। मोक्ष की इच्छा करने वाला मोक्ष पाता है जो पुरुष बिना विधि व बिना शास्त्र की मत के कहीं भी दीपदान करता है तो वह भी सम्पूर्ण कामनाओं को पाता है । हे वत्स ! जो विधि से नियमानुसार दीपदान करे तब तो कहना ही क्या, अतः श्री पुरुषोत्तम मास में दीपदान अवश्य करना चाहिये। यह मैंने तुझे महा दारिद्र्य नाशक योग बताया है मैं तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ तेरा कल्याण हो । अगस्त्यजी बोले- ऐसा कहकर वे योगी श्रेष्ठ ब्राह्मण दो भुजा वाले मुरलीधर हरि का स्मरण करते हुए प्रयाग को चले गये । वे दोनों स्त्री-पुरुष अपने आश्रम से उग्रदेव के पीछे-पीछे जाकर और उनको दूर तक पहुँचाकर नमस्कार करके प्रसन्न चित्त हो वापस लौटे। पुरुषोत्तम मास की राह देखते हुए ब्राह्मण की भक्ति में तत्पर दोनों स्त्री-पुरुषों ने अपने आश्रम में दो महीने का समय बिताया। दो मास बीतने पर सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास आया तब गुरु की आज्ञा से दोनों दंपत्ति ने मास भर प्रेम सहित ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये हिंगोट के तेल का दीपदान किया । तब वे निर्मल मन होकर कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त हो स्वर्ग को गये। वहाँ अनेक प्रकार के सुख भोगकर भरतखंड में उग्रदेव की कृपा से द्विज वर्ण में जन्म को प्राप्त हुए । पूर्व जन्म में मृग हिंसा करने वाला जो मणिग्रीव शूद्र था वही तू इस जन्म में राजा वीरबाहु का पुत्र चित्रबाहु के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस समय जो तेरी चन्द्रकला नाम की पटरानी है वह पूर्व जन्म में सुन्दरी नाम की तेरी स्त्री थी । जो पतिव्रता होने के कारण अब तेरी अर्द्धांगिनी हुई है क्योंकि पतिव्रता स्त्री पति के पुण्य का आधा भाग ले लेती है । श्रीपुरुषोत्तम मास में हिंगोट के तेल के दीपदान करने से तुझे निष्कंटक राज्य मिला है । जो पुरुष पुरुषोत्तम मास में घी या तिली के तेल से अखंड दीपदान करते हैं तो फिर उनका कहना ही क्या है ? पुरुषोत्तम मास के दीपदान का नि:संदेह यही फल है और जो उपवासादि व्रत करते हैं तो फिर कुछ कहना ही क्या है ? बाल्मीकि जी बोले- इस प्रकार अगस्त्यजी राजा चित्रवाहु से उसके पूर्व जन्म का चरित्र कह तथा उनसे अभिनन्दित हो अक्षय आशीर्वाद देकर अपने आश्रम को चले गये । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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