krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की तेइसवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

तेईसवाँ अध्याय- दृढ़धन्वा उपाध्यान राजा चित्रवाहु, मणिग्रीव तथा मुनि अग्रदेव की कथा।

राजा दृढधन्वा बोले-हे मुनिश्रेष्ठ ! पुरुषोत्तम मास में दीप दान का क्या फल है ? सो कृपाकर मुझसे कहो । श्रीनारायण बोले-राजा के विनम्र होकर पूछने पर बाल्मीकि मुनि बड़े हर्ष से मुस्कराते हुए बोले- हे राजा दृढधन्वा ! पापनाशिनी कथा सुनो, जिसको सुनने से पाँच प्रकार के महापातक नाश हो जाते हैं । सौभाग्य नगर में चित्रवाहु नाम का राजा रहता था । वह सत्यप्रतिज्ञ महाबुद्धिमान, शूरवीर, क्षमाशील, सब धर्मों को जानने वाला शांतरूप, दया से युक्त, पूजनीय, भगवान का भक्त, कथा सुनने में तत्पर, सदा अपनी पत्नि में प्रेम रखने वाला, पशु एवं पुत्रों से युक्त, चतुरंगिनी सेना वाला कुबेर के समान धनी था । उसकी चौंसठ कलाओं से युक्त पतिव्रता स्त्री महा भाग्यवान्, भगवत् भक्ति में रहने वाली चन्द्रकला रानी थी। उस चन्द्रकला रानी के साथ राजा पृथ्वी के सुख भोगता था वह श्रीकृष्ण के अतिरिक्त दूसरे देवता को नहीं जानता था । एक दिन राजा चित्रवाहु ने मुनि श्रेष्ठ अगस्त्य मुनि को दूर से ही आते हुए देखकर दंडवत प्रणाम किया और उनकी पूजा कर भक्ति सहित आसन बिछाकर मुनिवर के आगे बैठ गया तथा विनय पूर्वक बोला कि आज मेरा जन्म सफल हुआ आज मेरा राज्य और महल सफल हुआ जो आप श्रीकृष्ण के सेवक मेरे भवन में पधारे । आज आपके दर्शन से मैं पापों से छूट गया अतः हाथी, रथ, घोड़ों पैदल सेना सहित राज्य आपकी भेंट है। हे मुनि श्रेष्ठ ! आप वैष्णव हो, इससे मैंने सब कुछ आपको दिया क्योंकि वैष्णव को दिया हुआ थोड़ा दान भी सुमेरु पर्वत के समान हो जाता है। जो पुरुष दिन भर में कौड़ी भर शाक अथवा उत्तम अन्न वैष्णव ब्राह्मण को नहीं देता उसका वह दिन निष्फल है। ऐसा वेद वेत्ताओं का कहना है जो कोई ब्राह्मण आदि विष्णु भक्त हों वे पूजने योग्य हैं । उनका वाणी, मन और कर्म से सत्कार करना चाहिये ऐसा ऋषिगर्गाचार्य, गौतम और मुनि सुमन्त ने मुझसे कहा है । जब तक सूर्य उदय न हो तब तक तारों की छटा रहती है। इसी प्रकार जब तक वैष्णव विप्र नहीं आवे तक तक अन्य ब्राह्मणों की छटा रहती है । अगस्त्य जी बोले- हे चित्रवाहु ! तू सब प्रकार से धन्य है तेरी यह सब प्रजा भी धन्य है जो तुम जैसे वैष्णव प्रजा की रक्षा करते हो । जिस राज्य का राजा हरि भक्त न हो उस राज्य में नहीं रहना चाहिये । इसलिये वैष्णव रहित राज्य में रहने से वन में रहना अच्छा है । जैसे नेत्रहीन शरीर, पति के बिना स्त्री और निरक्षर ब्राह्मण निन्दनीय है वैसे ही वैष्णव रहित देश निन्दनीय है। जैसे दाँत बिना हाथी, पंख बिना पक्षी और दशमी विद्धा द्वादशी (एकादशी) की स्थिति होती है वैसे ही वैष्णव बिना राज्य है। जैसे कुश रहित संध्या, तिल के बिना तर्पण, जीविका के लिये देव सेवा होती है, वैसे ही अवैष्णव राजा का देश है । जैसे केश सँवारने वाली विधवा स्त्री, स्नान रहित व्रत करने वाला और ब्राह्मणी से संभोग करने वाला शूद्र निन्दनीय है वैसे ही वैष्णव बिना राज्य है। विद्वानों ने राजा वही कहा है जो श्रीकृष्ण भगवान के चरणों का आश्रित हो, उसी का राज्य दिन प्रतिदिन बढ़ता है और उसी की प्रजा सुख भोगती है । हे राजन् ! आपके दर्शन से मेरी दृष्टि सफल हो गई, आपके साथ वार्तालाप करने से आज मेरी वाणी सफल हो गई आपके साथ बैठकर मेरा मन गद्गद् हो गया । हेराजन् ! मेरी आज्ञा है अब इस राज्य का शासन तुम करो। मैं तुमको राज्य में पुनः प्रतिष्ठित कर रहा हूँ तुम्हारा कल्याण हो । श्रीनारायण बोले- इस प्रकार कहकर चलने की इच्छा करने वाले अगस्त्यजी को राजा चित्रवाहु की पतिव्रता पटरानी ने परम भक्ति पूर्वक प्रणाम किया। अगस्त्यजी बोले- हे शुभे ! तू सदा सौभाग्यवती हो और भक्ति पूर्वक पति की सेवा करती रहे श्रीकृष्ण भगवान में तेरी दृढ़ भक्ति हो । ऐसा आशीर्वाद देते हुए मुनि से विनय पूर्वक राजा सिर नवा हाथ जोड़कर फिर बोला- हे महर्षि ! मुझे अपार धन, अकंटक राज्य और पतिव्रता स्त्री किन सुकर्मों से प्राप्त हुई ? हे विपेन्द्र ! यह सब मुझे बताइये, मैं आपकी शरण में आया हूँ। हाथ के दर्पण की भाँति आप त्रिकालदर्शी हो । श्रीनारायण बोले- इस प्रकार राजा का प्रश्न सुनकर मुनि श्रेष्ठ अगस्त्यजी एकाग्रचित्त होकर बोले- मैंने तेरे पूर्व जन्म का सब चरित्र देख लिया वह सब प्राचीन इतिहास कहता हूँ । तू सुन्दर चमत्कारपुर में मणिग्रीव नाम से शूद्र जाति में पैदा हुआ था तथा जीव हिंसक था । नास्तिक, दुश्चरित्र, पर स्त्रियों को हरने वाला, बुरे विचार वाला तथा अशिष्ट था । तेरी यह सुन्दर स्त्री पूर्व जन्म में तेरी भार्या थी यह मन, कर्म, वचन से पति की सेवा में रहती थी । यह पतिव्रता महा भाग्यशाली धर्मात्मा तेरे ऊपर कभी भी दुष्टभाव न रखती थी । तुझ कुकर्मी को तेरी जाति के अन्य भाई बन्धुओं ने त्याग दिया और राजा ने क्रोधित हो तेरा सब वैभव छीन लिया, बचा हुआ जाति के लोगों ने छीन लिया, सम्पत्ति के चले जाने पर तुझे बड़ी भारी धन की इच्छा हुई । किन्तु निर्धन होने पर भी तुझको तेरी इस पतिव्रता स्त्री ने नहीं त्यागा इस प्रकार भाई बन्धुओं से तिरस्कृत हो तू निर्जन वन में चला गया । है महीपते ! उस वन में तू अनेक पशुओं को मारकर अपनी स्त्री सहित जीवन निर्वाह करता रहा । एक दिन तू (मणिग्रीव) धनुष उठाकर मृग का मांस खाने की इच्छा से सर्पों और मृगों से युक्त वन में गया । हे राजन् ! उस निर्जन वन में महामुनि उग्रदेव दिशा भूल जाने के कारण इधर-उधर भटकने से व्याकुल हो रहे थे, तेज दुपहर की गर्मी के कारण प्यास के मारे व्याकुल होकर वे वहाँ गिर गये और अचेत हो गये । तब भूले हुए दुःखित ब्राहमण को देखकर तुझे दया आ गई । उसे उठाकर अपनी पीठ पर लादकर तू अपनी कुटिया में ले गया । उस दुःखित ब्राह्मण की तुम दोनों स्त्री-पुरुष ने बहुत सेवा की जब महायोगी उग्रदेव को दो घड़ी बाद चेत हुआ तो वे आश्चर्य में पड़ गये और बोले-मैं वहाँ था, मुझे यहाँ कौन ले आया ? श्रीनारायण बोले-मणिग्रीव उस ब्राहमण से बोला-हे ब्रह्मन् ! यहाँ सुन्दर तालाब है इसमें कमलनी के पुष्पों से सुगन्धित शीतल जल में स्नान कर मध्यान्ह कालीन क्रिया करके आप फलाहार कर श्रेष्ठ शीतल जलपान करें पश्चात् आप सुख पूर्वक विश्राम करें। आप जैसे भगवद् भक्त सेवा करने योग्य हैं। अगस्त्यजी बोले- तब उग्रदेव श्रम रहित चैतन्य हो, मणिग्रीव की बात सुनकर प्यास की बेचैनी के मारे उठ बैठे तथा उग्रदेव मणिग्रीव की भुजा पकड़ कर तालाब के किनारे गये और वटवृक्ष से शोभित उसके तट पर बैठ गये । ब्राह्मण ने बड़ की छाया में क्षणमात्र विश्राम करके स्नान किया और नित्य कर्म करके वासुदेव का पूजन किया फिर उग्रदेव ने देव पितरों को तर्पण करके शीतल जल पिया पश्चात् बड़ की जड़ के पास बैठ गये । मणिग्रीव मुनि श्रेष्ठ को नमस्कार कर सत्कार करने के लिये विनय पूर्वक बोला- हे ब्रह्मन् ! आप मेरे उद्धार के लिये मेरे आश्रम में आये हैं, इस तरह आपके दर्शन से मेरे सब पाप नाश हो गये । फिर मणिग्रीव ने बड़े प्रेम से अपनी स्त्री से कहा- हे सुन्दरी ! जो-जो आश्रम में स्वादिष्ट पके हुए आम आदि के फल हों उनको जल्दी लाओ देर मत करो और भी जो कुछ कंद मूल फल हों उनको भी ले आओ । अपने पति के ऐसे वचन सुन सुन्दरी ने आम्र के फल और कन्दादि लाकर बड़े हर्ष से ब्राह्मण के आगे रख दिये । मणिग्रीव फिर मुनि श्रेष्ठ से बोला- हे ब्रह्मन् ! फलों को अंगीकार कर आप हम दोनों स्त्री-पुरुषों को कृतार्थ करें । उग्रदेव बोले-अरे भाई ! मैं तुमको नहीं जानता कि तुम कौन हो अतः तुम पहले मुझे अपना परिचय दो क्योंकि बुद्धिमान ब्राह्मण बिना जाने किसी का कुछ नहीं खाते । मणिग्रीव बोला- हे द्विजशार्दूल ! मैं जाति और भाई बांधवों से त्यागा हुआ मणिग्रीव नाम का शूद्र हूँ । उग्रदेव शूद्र के ऐसे वचन सुनकर प्रसन्न हुए तथा फलाहार करके फिर जल पिया पश्चात् सुख से बैठे ब्राह्मण के दोनों चरणों को अपनी गोद में रखकर मणिग्रीव दबाता हुआ बोला- हे मुनि श्रेष्ठ ! इस निर्जन और भयावने दुष्ट हिंसक व्याघ्रादि से युक्त वन में होकर आपको कहाँ जाना है । उग्रदेवजी बोले- हे शूद्र ! मैं ब्राह्मण हूँप्रयाग जाना चाहता हूँ इस समय अनजाने से इस महा भयंकर वन में भटककर आ गया । यहाँ प्यास की बेचैनी और थकान के कारण मैं मरणासन्न हो गया । मुझको तूने जीवन दान दिया है अतः बताओ मैं तुझे क्या दूँ ? हे मणिग्रीव ! तुम दोनों स्त्री-पुरुष ने वन का आश्रय क्यों लिया सो मुझसे कहो, वहदुःख मैं दूर करूँगा । अगस्त्यजी बोले- इस प्रकार उग्रदेव के मनोहर वचन सुनकर अपनी स्त्री के सामने ही मुनीश्वर की प्रार्थना कर दरिद्रता रूपी समुद्र से तरने के लिये मणिग्रीव अपने किये हुए कर्मों का फल वर्णन करने लगा । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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