krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की इकिस्वे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

इक्कीसवाँ अध्याय- मुनि बाल्मीकि का राज दृढ़धन्वा को पुरूषोत्तम मास की पूजन विधि कहना।

बाल्मीकिजी बोले-पुरुषोत्तम भगवान की प्रतिमा को शुद्ध करके प्राण प्रतिष्ठा करे, अन्यथा मूर्ति धातु की ही रहती है । मूर्ति के दोनों गालों को दाहिने हाथ से स्पर्श कर उसमें हरि भगवान की प्राण प्रतिष्ठा करें । मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा न करने से पहले जो स्वर्ण आदि धातु थी वह वैसे ही रहती है उसमें देवता का वास नहीं होता । अतः हे राजन् ! अन्य देवताओं की मूर्ति में भी देवत्व लाने के लिये प्राण प्रतिष्ठा अवश्य करनी चाहिये। “तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” (यजुर्वेद अं० ६ मंत्र ५) पुरुषोत्तम के बीज मन्त्र से करनी चाहिये मंत्र वेत्ता ब्राह्मण निरन्तर प्रतिमा के हृदय पर अँगूठा रखकर निम्न मंत्रों द्वारा हृदय में भी प्राण प्रतिष्ठा करे । इस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित हों, इस प्रतिमा में प्राण चलायमान हों, यह प्रतिमा पूजा के लिये देवत्व को प्राप्त हो “स्वाहा” इस प्रकार यजुर्वेद के मंत्र कहते हुए वेद संबंधी मूल मंत्र व अंग मंत्रों से प्रतिमा में सब जगह प्राण प्रतिष्ठा करे, अथवा नाम मंत्रों से चतुर्थी विभक्ति व अन्त में “स्वाहा” लगाकर उन उन देवताओं को अनुस्मरण करते हुए प्राण प्रतिष्ठा करे । इस प्रकार प्राण प्रतिष्ठा करके श्री पुरुषोत्तम का ध्यान करे, श्रीवत्स से चिन्हित हृदय वाले, शांत, नील कमल दल के समान कान्ति वाले, त्रिभंग, मनोहर, आकृति वाले ऐसे श्रीराधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान का ध्यान करे । देश और काल का उच्चारण संकल्प करके, नियम धारण करके, मौन होकर, पवित्र हो सोलह उपचारों से पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करे । आवाहन हे देव- देवेश ! श्रीकृष्ण ! पुरुषोत्तम ! आप श्रीराधिका सहित मेरे द्वारा दिये हुए पूजन को ग्रहण करें । श्रीराधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान को नमस्कार है। ऐसा कहकर आवाहन करे । आसन- हे पुरुषोत्तम देव-देवेश ! अनेक प्रकार के रत्नों से जड़ित सुवर्ण से शोभित ऐसे आसन को ग्रहण करें । यह कहकर आसन समर्पण करे । पाद्य-मेरे द्वारा गंगादिक सब तीर्थों से प्रार्थना करके लाया हुआ सुखदायक स्पर्श करने योग्य जल पाद्य (पाँव पखारने) के लिये ग्रहण करें। अर्घ्य हे हरि ! गोपिकाओं को आनन्द देने के लिये गोपराज नंद के घर में उत्पन्न हुए आप राधा सहित मेरे दिये हुए अर्घ्य को ग्रहण करो । आचमन-हे ऋषिकेश! हे पुराण पुरुषोत्तम! शुद्धि से लाये हुए तथा स्वर्ण कलश में रक्खे हुए गंगाजल से आप आचमन करें । पंचामृत-हे हरे ! मेरे द्वारा लाये गये पञ्चामृत से राधा सहित जगत् के नियन्ता हरि आपकी पूजा से मेरे कार्य सिद्ध हों । हे राधिकानन्ददायक ! गौ का दूध, दही, घी, मधु और शक्कर इनसे युक्त, पंचामृत ग्रहण करें, ऐसे कह पंचामृत से स्नान करावे । नमस्कार-हे नाथ योगेश्वर गिरिधारी, यज्ञपति गोविंद ! आपको नमस्कार है । पुनः स्नान – हे नन्दनन्दन ! मेरे द्वारा दिये गये गंगाजल की भाँति निर्मल नदी व तीर्थ का जल स्नान को ग्रहण करें । वस्त्र-हे देव ! सब कामनाओं की सिद्धि के लिये मेरे द्वारा निवेदित किये गये इन दो पीताम्बरों को ग्रहण करें। ऐसे वस्त्र धारण कराने के बाद आचमन करावे । उत्तरीय वस्त्र यज्ञोपवीत-हे दामोदर ! आपको नमस्कार है इस संसार सागर से आप मेरी रक्षा करें और अँगोछा सहित यज्ञोपवीत देवे । चन्दन-हे सुरश्रेष्ठ! सुगंधि से पूरित मनोहर दिव्य चंदन आपके लिये विलेपन को है इसे प्रीति से ग्रहण करें ऐसा कह चन्दन लगावें । अक्षत्-हे पुरुषोत्तम ! मेरे भक्ति से लाये केसर से रंगे हुए सुन्दर अक्षत ग्रहण करें ऐसा कह अक्षत दे । पुष्प-हे प्रभो ! मेरे लाये हुए इन माल्यादि चमेली आदि के सुगन्धित पुष्पों को ग्रहण करो, पुष्पों को समर्पित कर फिर अंग पूजा करे । नंद यशोदा के पुत्र केशी दैत्य को मारने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले, अनन्त, विष्णु के रूप को धारण करने वाले, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नीलकंठ, सकलास्त्रधृक, वाचस्पति, केशव तथा सर्वात्मा इन नामों से पैर, टँकना, जानु, जंघा, कटि, मेढू, नाभि, हृदय, कण्ठ, दोनों भुजाओं, मुख, नेत्र, शिर आदि सर्वांगों को पुष्प लेकर क्रम से चतुर्थ्यन्त नामों से विश्वरूप जगत्पति की पूजा करे । इस प्रकार प्रति अंग की पूजा कर फिर चतुर्थ्यन्त केशवादि नाम मंत्रों से एक-एक पुष्प हाथ में लेकर पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करे । धूप- दिव्य वनस्पतियों के रस गंध से युक्त सुगन्ध सब देवताओं को सूँघने योग्य इस धूप को आप ग्रहण करें ऐसा कह धूप दें । दीप- हे परमधाम! आप सब देवताओं के ज्योतिस्वरूप हैं तेजस्वियों के उत्तम तेज हैं स्वयं प्रकाशमान, परमधाम हैं यह दीप आप ग्रहण करें । यह कहकर दीप जलावे । नैवेद्य-हे देव ! नैवेद्य ग्रहण करें और मेरी भक्ति को अचल करके मुझे इच्छित वर दीजिये तथा परलोक में परम गति प्रदान करें यह कहकर नैवेद्य समर्पण करें बीच में जल दे । फिर अन्त में उत्तरापोशन (आचमन) दे हे हृषीकेश ! सुवर्ण के कलश में लाये हुए गंगाजल से आचमन करो, यह कहकर आचमन दे । फल-हे देव! ये फल मैंने आपके आगे रक्खे हैं, अतः मुझे जन्म-जन्मान्तर में श्रेष्ठ फल मिलें ऐसा कह श्रीफल दे । करोद्वर्तन हे परमेश्वर ! गन्ध, कपूर युक्त कस्तूरी आदि से सुगन्धित करोद्वर्तन (हाथों की शुद्धि को उवटन) ग्रहण करो, ऐसे कह करोद्वर्तन दे । ताम्बूल हे देव ! सुपारी युक्त कपूर सहित भक्ति भाव से दिया मनोहर ताम्बूल ग्रहण करो । इस प्रकार ताम्बूल दे । दक्षिणा-ब्रह्माजी के गर्भ में स्थित अग्नि के बीज, अनन्त पुण्य के फलदाता स्वर्ण को ग्रहण करें और मुझे शान्ति दें, ऐसा कह दक्षिणा प्रदान करे । आरती-हे शरदऋतु के कमल तुल्य श्याम, तीन जगह से टेड़ी मनोहर आकृति वाले, देवताओं के स्वामी श्रीराधाकृष्ण की मैं आरती करता हूँ, ऐसा कह नीराजन करे । प्रदक्षिणा – हे जगन्नाथ! रक्षा करो, रक्षा करो। हे भक्तों पर कृपा करने वाले ! मेरी प्रदक्षिणा स्वीकार करो, ऐसा कह प्रदक्षिणा प्रदान करे। मंत्र पुष्पांजलि – हे नाथ! यज्ञेश्वर, यज्ञ रूप, यज्ञ के कारण श्रीगोविंद को मैं नमस्कार करता हूँ ऐसा कह मन्त्र पुष्पांजलि दे । नमस्कार-विश्वेश्वर, विश्वरूप, विश्व के उत्पन्न करने वाले, विश्वपति गोविंद को नमस्कार है ऐसा कहनमस्कार करे । क्षमापन- फिर निम्न मंत्र से पुरुषोत्तम भगवान से क्षमा माँगें- 

मंत्र – हीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन । यत्पूजितम मयादेव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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