krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की उन्नीसवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

उन्नीसवाँ अध्याय- अधिक मास एवं अपने पूर्व जन्म की कथा सुनकर दृढ़धन्वा का चकित होना।

सूतजी बोले- हे तपस्वियो ! इस प्रकार कहते हुए मुनि नारायण से देवर्षि नारदजी मधुर वाणी से बोले- हे ब्रह्मन् ! तपोनिधि सुदेव को भगवान ने प्रसन्न होकर क्या उत्तर दिया वह मुझसे कहो । श्रीनारायण बोले-सुदेव के आग्रह करने पर भक्त वत्सल भगवान ने कहा- हे द्विजराज ! तुमने जो कुछ किया है उसे अन्य कोई व्यक्ति नहीं कर सकता और जिससे मैं प्रसन्न हुआ हूँ उसका कारण भी मैं ही जानता हूँ तुम नहीं जानते ? मेरा प्रिय पुरुषोत्तम मास जो यह बीता है तुम दोनों के पुत्र शोक मग्न होने के कारण इसकी सेवा व आराधना हो जाने से हे तपोनिधे ! तुमको महान फल प्राप्त हुआ है । इस पुरुषोत्तम मास में जो मनुष्य एक दिन भी उपवास कर लेता है वह असंख्य पापों का नाश कर विमान में बैठ बैकुण्ठ को प्राप्त होता है । किन्तु तुम दोनों को पूरा महीना निराहार ही बीत गया था और बिना समय के मेघ वर्षा होने से नित्य प्रति तीनों काल तुम्हारा स्नान हो गया था । मेघ जल से स्नान कर लेने से और अखण्ड उपवास हो जाने से जो पुत्र शोक रूपी सागर में डूबे रहने के कारण तुमको मालूम नहीं हुआ था । इस प्रकार अनजाने में तुम्हारा पुरुषोत्तम मास का सेवन पूर्ण हो गया तुम्हारी इस साधना की समानता कौन कर सकता है । वेदों में जितने साधन वर्णन किये गये हैं वे सब तराजू के एक पलड़े में रखकर और दूसरे में पुरुषोत्तम को रखकर ब्रह्माजी ने देवताओं के समक्ष तोला तो पुरुषोत्तम का पलड़ा भारी बैठा, साधन वाला पलड़ा हल्का हो गया । अतः पुरुषोत्तम मास सब प्राणियों को सर्वत्र पृथ्वी पर पूजने से फलदायी है । इसलिये हे वत्स ! तुम सब प्रकार से धन्य हो क्योंकि तुमने इस मास में महादारुण तप किया है । जो मनुष्य का जन्म प्राप्त कर श्री पुरुषोत्तम मास में स्नान, दान, व्रत, उपवास नहीं करते वे जन्म-जन्मांतर में दरिद्री होते हैं । अतः सब भाँति से मेरा प्रिय पुरुषोत्तम मास सेवन करना चाहिये जो इसका सेवन करेगा वह भाग्यवान् धन्य और मेरा प्रिय पात्र होगा । श्रीनारायण बोले-हे मुने ! ऐसा कहकर जगदीश्वर हरि भगवान अन्तर्ध्यान हो गये । अपनी स्त्री सहित सुदेव पुरुषोत्तम मास के आराधन से जीवित हुए पुत्र शुकदेव को देखकर दिन रात अत्यन्त प्रसन्न रहने लगा और कहता कि हमारी अज्ञानता में पुरुषोत्तम मास की आराधना हो जाने से वह हमें कितना फलदायक हुआ जो मरा हुआ पुत्र जीवित हो गया बड़े आश्चर्य की बात है ऐसा मास कहीं भी नहीं देखा । इस प्रकार सुदेव उस आश्चर्यमय मास को अच्छी तरह से पूजने लगा । पुत्र को देख वह ब्राह्मण सपत्नीक हर्षित होता था और वह पुत्र भी अपने सत्कर्म से माता-पिता को आनन्दित करता था । सुदेव पुरुषोत्तम मास की स्तुति करते हुए विष्णु भगवान की पूजा करने लगा और कर्म मार्ग से होने वाले फल की इच्छा छोड़कर केवल भक्ति मार्ग में ही रहने लगा । सब दुःखों को दूर करने वाले प्रत्येक तीसरे वर्ष आने वाले श्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास का पनि सहित सुदेव जप, होम, स्नान, पूजा, दान आदि से श्रीहरि को भजने लगा । एक हजार वर्ष तक रात-दिन सब विषयों को भोगकर स्त्री सहित सुदेव बैकुण्ठ लोक को गया जो योगियों को भी दुर्लभ है । वह यज्ञ आदि करने वालों को भी अप्राप्य बैकुण्ठ लोक में हरि के निकट जा निश्चिन्त रहने लगा । बैकुण्ठ लोक के समस्त सुख भोगकर सुदेव गौतमी सहित पृथ्वी पर आया । वही सुदेव राजा दृढधन्वा नाम से तुम विख्यात हुए । हे राजन् ! तुम पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से सम्पूर्ण भोगों को भोगने वाले हुए और यह तुम्हारी पूर्व जन्म की पतिव्रता गौतमी पटरानी हुई । हे भूपाल ! तुमने जो मुझसे पूछा था वह सब मैंने कह सुनाया और जो तोता पक्षी था वह तुम्हारा पूर्व जन्म में शुकदेव नाम का पुत्र था जिसे हरि ने जीवित किया था वह बारह हजार वर्ष तक की आयु भोगकर बैकुण्ठ को चला गया । वही शुकदेव वन में सरोवर के निकट बड़ के वृक्ष पर बैठकर अपने पूर्व जन्म के पिता (तुमको) आया हुआ देखकर दूषित संसार सागर में मग्न, भोग रूपी विषयों में ग्रसित ऐसे राजा को देखकर अत्यन्त कृपायुक्त हो (तोता रूप हितकारी पुत्र) सोचने लगा कि यदि मैं इस राजा को आत्मबोध नहीं कराऊँगा तो मैं बंधन मुक्त न होऊंगा क्योंकि वेदमत है जो पुत्र पिता की पुंनाम नरक से रक्षा करता है वही श्रेष्ठ पुत्र है नहीं तो आज मेरा वेदार्थ का ज्ञान वृथा हो जायेगा । इसलिये वह अपने पूर्व जन्म के पिता के उद्धार करने का विचार करके कहने लगा था । बाल्मीकि मुनि बोले-हे निष्पाप ! जो कुछ तुमने पूछा वह सब मैंने सुना दिया । अब मैं पाप नाशिनी सरयू नदी के किनारे जा रहा हूँ । श्रीनारायण बोले- इस प्रकार बाल्मीकिजी यशस्वी दृढधन्वा राजा को पूर्व जन्म का चरित्र कहकर जाने लगे तब बाल्मीकि मुनि को महाराज दृढधन्वा ने नमस्कार किया और पुनः कुछ कहने लगे । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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