krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की सत्रहवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

संत्रहवाँ अध्याय– सुदेव का पुत्र शोक में विलाप करना।

नारदजी बोले – हे कृपासिन्धो ! फिर ज्ञान प्राप्त कर राजा दृढधन्वा का क्या हुआ ? वह पाप नाशक इतिहास मुझसे कहो । श्रीनारायण बोले-अपने पूर्व जन्म के चरित्र को सुनकर राजा दृढधन्वा चकित रह गये और आगे का हाल सुनने की इच्छा जाग्रत हुई । बाल्मीकि मुनि उसकी जिज्ञासा शान्त करते हुए बोले- अपनी ब्राह्मणी के मुख से ऐसी शीतल वाणी सुनकर सुदेव ब्राह्मण ने धैर्य धारण कर हरि में ध्यान लगाया । दीर्घश्वास ले मलिन मुख से जो होनहार है सो होगा ऐसा मन में निश्चय कर पुष्पादि लेने के लिये वन में गया । इस प्रकार करते हुए काफी समय निकल गया । एक दिन वह समिधा, कुशा, फल, फूल आदि लेने को वन में गया । वहीं सुदेव मन में हरि के चरण कमलों का ध्यान करने लगा उसी दिन उनका लड़का शुकदेव अपने मित्रों सहित बावड़ी पर गया और उसमें घुस मित्रों सहित जल में क्रीड़ा करने लगा तथा जलयंत्र से जल फेंकता हुआ बार-बार हँसता था । ग्रीष्म ऋतु थी अतः जल क्रीड़ा में बड़ा आनन्द आया बालकों में बड़े प्रेम से खेलते-खेलते अन्य बालकों के छकाये जाने पर उसने उनके भय से भागने की चेष्टा की तब भाग्यवश उसने श्वास रोककर अपने मित्रों को छलने के लिये अथाह जल में गोता लगाया । उस गहरे जल में से वह व्याकुल हो निकलने का प्रयत्न करने लगा परन्तु निकल नहीं सका और मर गया । यह देख सभी बालक आश्चर्य से हा हाकार करते हुए दौड़े और अत्यन्त दुःखित हो गौतमी को जाकर समाचार सुनाया । बालकों की यह अप्रिय और बज्र समान वाणी सुनकर पुत्र वत्सला गौतमी मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़ी। इतने में ही वन से सुदेव भी आ गये, वे पुत्र की मृत्यु सुन कटे वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े। पश्चात् दोनों स्त्री-पुरुष उस बावड़ी पर गये । वहाँ जाकर अपने मृत पुत्र को छाती से लगाकर उसे गोद में लिटाकर सुदेव शर्मा बार-बार मुख को चूमने लगा तथा गोदी में लिटाये हुए मृत पुत्र का मुख निहारते हुए रोते रोते विलाप करते हुए गद्गद् वाणी से बोला- हे पुत्र ! मेरा सोच दूर करने वाली शीतल मनोहर वाणी को बोलकर मेरे मन को आनन्दित करो। तुम अपने वृद्ध माता-पिता को छोड़कर असमय में जाने योग्य नहीं हो । हे वत्स ! तेरे मित्र वेद पढ़ने को तुझे बुला रहे हैं। हे पुत्र ! तुम्हारे उपाध्याय भी तुमको पढ़ाने को बुला रहे हैं शीघ्र उठो, इस समय कैसे सो रहे हो ? मैं तेरे बिना घर नहीं जाऊँगा, मेरा घर में क्या काम है ? तेरे बिना घर सूने वन के समान है। यदि तुम्हें फल, कंद मूल प्रिय हों तो मेरे आगे उठ जाओ यदि नहीं उठोगे तो मैं अब वन को भी नहीं जाऊँगा, वन में मेरा अब क्या काम है ? मैंने कोई कुकर्म नहीं किया, कभी ब्रह्महत्या नहीं की, फिर किस कर्म फल से मेरा पुत्र मर गया ? अरे निर्दयी विधाता ! तूने यह बड़ा बुरा किया मुझ वृद्ध गरीब के नेत्र निकाल कर तुम्हें क्या मिल गया ? निर्धन का धन छीनकर हम दोनों स्त्री-पुरुष का सहारा ऐसे बालक को मारते हुए तुझे तनिक भी लज्जा न आई । तुम सब पर दया करते हो पर हमारे प्रति निर्दयी क्यों हो गये ? यह सब मेरे दुर्भाग्य से ही हुआ है। अब मैं अपने सुन्दर पुत्र को कहाँ ढूढूँ हे पुत्र ! तुम्हारे सुन्दर नेत्र युक्त मुख को अब कहाँ देखूँगा । मेघ जल वर्षाता है, पृथ्वी से धान्य उत्पन्न होता है और पर्वत रत्न उत्पन्न करते हैं, समुद्र से मोती उत्पन्न होते हैं । किन्तु ऐसा कोई स्थान नहीं देखता जहाँ से मेरा पुत्र वापस मिल सके। ऐसा कह पुत्र का आलिंगन कर दुःखित मन से फिर बोला- हे पुत्र ! शीघ्र उठकर एक बार फिर अपनी मीठी बोली सुनाओ देखो तुम्हारी माता कुररी की भाँति लज्जा छोड़ अत्यन्त विलाप कर रही है । हे पुत्र ! माता को देखकर भी तुम्हें दया क्यों नहीं आती ? बिना माता-पिता के पूछे तुम कभी भी कहीं नहीं जाते थे । हे पुत्र ! हम दोनों से बिना पूछे इतने लम्बे मार्ग पर क्यों जा रहे हो ? अब मैं किसके मुख से वेदाध्ययन वाली श्रेष्ठ वाणी सुनूँगा । हे तात ! तुम्हारी मनोहर बोली की याद करते ही मेरा हृदय फट कर सौ टुकड़े क्यों नहीं हो जाता ? निःसन्देह यह लोहे का बना हुआ है । राजा दशरथजी धन्य हैं जिन्होंने राम के वन चले जाने पर पुत्र शोक में अपने प्राण त्याग दिये । मुझे धिक्कार है कि मैं पुत्र के मरने पर भी जीवित हूँ । हे नाथ ! हे गोविंद ! हे विष्णो ! हे यदुनाथ ! हे रुक्मिणी के प्राणपति ! हे मुर दैत्य के मारने वाले ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे दयालु ! मेरी पुत्र वियोग की अग्नि के ताप से रक्षा करो । हे देवाधिदेव ! हे त्रिलोकीनाथ ! हे गोपाल ! हे गोपीपति ! हे रथांगपाणे ! कालीदह के दोष को हरने वाले ! पुत्र रूपी अग्नि के ताप से जले हुए मेरी रक्षा करो। हे बैकुण्ठपते ! हे नरकासुर के शत्रु ! हे चराचरपति ! हे भवसागर से पार उतारने वाले ! हे ब्रह्मादि देवताओं द्वारा श्रद्धेय चरण-कमल वाले ! पुत्ररूप अग्नि के ताप से सन्तापित मेरी रक्षा करो मेरे समान मूर्ख कोई दूसरा नहीं होगा क्योंकि मैंने श्रीकृष्ण भगवान के वचन उल्लंघन कर पुत्र की कामना की, भला नष्ट होने वाले को कौन पा सकता है। 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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