krishna ji

श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की पन्द्रहवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

पन्द्रहवाँ अध्याय- सुदेव ब्राह्मण के घोर तप से प्रसन्न हो भगवान का पुत्र प्राप्ति का वरदान देना।

श्रीनारायण बोले-फिर भक्तवत्सल श्रीकृष्ण भगवान की हाथ जोड़कर सुदेव ब्राह्मण गद्गद् स्वर से स्तुति करने लगा । हे देव देवेश ! त्रैलोक्य को अभय देने वाले ! प्रभो ! हे सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे परमेश्वर ! हे शरणागत वत्सल ! मेरी रक्षा करो, हे जगद्वन्द्य ! हे भक्त भय भंजन ! आपको नमस्कार है आप जय स्वरूप हैं, जय के देने वाले हो, जय के स्वामी हो, जय के कारण हो, विश्व के आधार हो । विश्व के एक मात्र रक्षक हो, दिव्य हो, विश्व के आगार हो, विश्वरूप हो, फलों के बीज हो, फलों के आधार हो, फलों के मूल हो, फलों के दाता हो । तेज रूप हो, तेज के दाता हो, सब तेजस्वियों में श्रेष्ठ हो, हे कृष्ण, हे विष्णु, हे वासुदेव ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे जगत्प्रभो ! आपकी ब्रह्मादि देवता भी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं । हे जनार्दन ! मैं अल्प बुद्धिवाला मंद और साधारण मनुष्य आपकी स्तुति कैसे करूँ ? मैं आपका अति दुःखी और दीन भक्त हूँ मेरे को कैसे त्यागते हो ? हे प्रभो ! आपका लोक में लोकबन्धु नाम व्यर्थ है । बाल्मीकि बोले- इस प्रकार स्तुति कर सुदेव ब्राह्मण हरि के आगे खड़ा रह गया । तब हरि भगवान उसकी स्तुति सुनकर मेघ के समान गम्भीर वाणी में बोले- हे वत्स ! तुमने बहुत कठिन तप किया है अतः हे महाप्राज्ञ, हे तपोधन ! जो इच्छा हो वर माँग लो । मैं तुम्हारे तप से बहुत प्रसन्न हूँ मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, ऐसा दारुण तप किसी ने भी नहीं किया । सुदेव बोला- हे नाथ, हे दीनबन्धो, हे दयानिधे ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे विष्णो, हे पुराण पुरुषोत्तम ! मुझको एक श्रेष्ठ पुत्र दो । हे हरे ! पुत्र के बिना पूरा गृहस्थ जीवन मुझे अच्छा नहीं लगता । ब्राह्मण के ऐसे वचन सुन हरि भगवान बोले- हे ब्राह्मण ! पुत्र के अतिरिक्त मैं सब कुछ तुम्हारे लिये दूँगा । हे वत्स ! तुम्हारे भाग्य में पुत्र सुख विधाता ने नहीं लिखा । मैंने तुम्हारे भाल पटल के सब अक्षर देखे हैं परन्तु उसमें तुम्हारे सात जन्म तक कोई पुत्र सुख नहीं लिखा है । इस प्रकार वह ब्राह्मण हरि के बज्र समान निष्ठुर वचन सुनकर जड़ से कटे हुए वृक्ष की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा। पति को गिरे हुए देखकर उसकी स्त्री अत्यन्त दुःखी हुई और स्वामी को पुत्र की इच्छा से रहित देख रोने लगी फिर धीरज धर पति से गौतमी बोली- हे नाथ ! उठिये-उठिये क्या मेरे वचन आपको याद नहीं हैं जो कुछ विधाता ने भाग्य में लिख दिया है वही सुख दुःख प्राप्त होता है। इसमें रमानाथ क्या करें मनुष्य अपने किये हुए कर्म का फल भोगता है जैसे मरते हुए को औषधि देना निष्फल हो जाता है वैसे ही अभागे पुरुष का किया हुआ उद्योग देव के प्रतिकूल होने से व्यर्थ हो जाता है। यज्ञ, दान, तप, सत्यव्रत द्वारा हरि का सेवन श्रेष्ठ है किन्तु इनसे भी सब वेदों में भाग्य फल श्रेष्ठ है । अतः हे भूसुर ! सबका विश्वास छोड़कर भाग्य का ही सहारा पकड़ो इसमें हरि का क्या प्रयोजन है ? इस प्रकार पनि के असह्य तीव्र शोक युक्त वचन सुनकर उनके दुःख से दुःखी हुआ गरुड़ शोक सागर में डूबी हुई ब्राह्मणी तथा ब्राह्मण को देखकर हरि भगवान् से विनम्र हो बोला- हे दीनबन्धो, हे दयासिन्धो ! हे भक्तों को अभय करने वाले ! हे प्रभो ! आज आपकी भक्तों के दुःख को न सहने वाली दयालुता कहाँ चली गई । अहो, आप तो ब्राह्मणों के रक्षक हो आपका धर्म आज कहाँ चला गया, अपने भक्तों को देने के लिये आपके हाथों में चारों प्रकार की भक्ति रहती है तो भी आपके भक्त उत्तम भक्ति की इच्छा करते हैं मुक्ति की कामना नहीं करते । उनके आगे आठों सिद्धियाँ दासी के समान खड़ी रहती हैं । ऐसी तो आपकी आराधना की महत्ता है जो सर्वत्र विख्यात है । फिर इस ब्राह्मण की पुत्र कामना पूरी करने में आपको क्या परिश्रम है ? भला हाथी का दान देने वाले पुरुष को अंकुश का दान देने में क्या दुविधा है ? अब आज से कोई भी मनुष्य आपके चरण-कमलों की सेवा नहीं करेगा क्योंकि जिसके भाग्य में जो लिखा है उसको वही निश्चय मिलता है। इस प्रकार लोक में यह विश्वास होने से आपकी भक्ति लोप हो जायेगी । हे नाथ ! आप में करने और न करने की क्षमता है यह सर्वविदित है वही क्षमता इस ब्राह्मण को पुत्र न देने से नष्ट हो जायेगी । मेरी प्रार्थना है कि आप इस ब्राह्मण को अवश्य ही एक पुत्र दीजिये । सुदामा ब्राह्मण ने आपकी आराधना से महान ऐश्वर्य पाया और सांदीपनि को आपकी कृपा से मरा हुआ पुत्र पुनः प्राप्त हुआ । ये दोनों स्त्री-पुरुष पुत्र की कामना से आपकी शरण में आये हैं। श्रीनारायण बोले- इस प्रकार गरुड़जी के वचन सुनकर विष्णु भगवान अमृत तुल्य वचन बोले-हे गरुड़ ! हे वैनतेय ! इस ब्राह्मण को मनवांछित एक पुत्र शीघ्र ही दे दो। इस प्रकार हरि के अपनी इच्छा के अनुकूल वचन सुनकर गरुड़जी का हृदय प्रसन्न हो गया और तत्काल उस दुःखी ब्राह्मण को एक अनुरूप भव्य पुत्र दे दिया । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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