श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की चौदहवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

चौदहवा अध्याय– श्रीबाल्मीकि मुनि का राजा दृढ़धन्वा को पूर्व जन्म का वर्णन |

श्रीनारायण बोले-एक दिन चिन्ता ग्रस्त राजा दृढधन्वा के महल में बाल्मीकि मुनि आये। राजा ने दूर से ही बाल्मीकि मुनि को आता हुआ देखकर शीघ्रता से उठकर भक्ति सहित उनके चरणों में प्रणाम किया। फिर ऋषि को सत्कार कर श्रेष्ठ आसन पर बैठाकर चरणों को अपनी गोदी में ले दोनों हाथों से धोया । फिर चरणोदक को शिर पर धारण करते ही राजा को तोते का वचन याद आया तो राजा बड़ी मीठी वाणी से बोला-हे भगवन् ! अब मैं कृत कृत्य हुआ में बड़ा भाग्यवान हूँ । आज मेरा जन्म तथा मनोरथ सफल हुआ । आपके दर्शन से मेरा वेदाध्ययन आदि सफल हो गया । हे संसार को पावन करने वाले ! मैं अपने सौभाग्य का क्या वर्णन करूँ ? श्री नारायण बोले- मुनिराज से ऐसा कह राजा शान्त हो गया । तब बाल्मीकि मुनि राजा को विनय युक्त देख मन में बड़े प्रसन्न होकर बोले-हे राजन् ! तुम इतने चिन्ता से व्याकुल क्यों हो तुम्हारे मन में क्या है सो बताइये ? हे महामते ! जो कुछ इच्छा हो सो कहिये । दृढधन्वा बोले-आपके चरणों की कृपा से मुझे सदा सुख है परन्तु हे ज्ञानधन ! मेरे मन में एक बड़ा भारी भ्रम है जो वन में तोते ने कहा था उस शूल को दूर कीजिये । एक समय मैं शिकार खेलने के लिये घोर वन में चला गया वहाँ घूमते हुए मुझे एक तालाब नजर आया । उसका ठंडा जल पीने के बाद श्रम दूर करने को एक बड़े वट वृक्ष के नीचे उसकी शीतल छाया में बैठ गया । उसकी छाया मन और नेत्रों को अत्यन्त सुखदाई थी । उस वृक्ष पर मैंने एक मनोहर तोता देखा, जब तक मैं वहाँ रहा तब तक वह तोता मेरे आगे एक ही श्लोक पढ़ता रहा कि राजा तू पृथ्वी पर अत्यन्त सुख को देख तत्त्व की चिन्ता नहीं करता, तेरा कैसे उद्धार होगा ? उसकी इस वाणी को सुन मैं अत्यन्त विस्मित हो गया । हे ब्रह्मन् ! तोते ने जो कहा वह मैं नहीं समझ पाया । यही मेरे हृदय का संदेह है इसे आप ही मेटने में समर्थ हैं। मेरे राज्य में सभी सुख हैं, प्रतिभाशाली चारों पुत्र हैं, मनोहर पतिव्रता स्त्री है, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल चतुरंगिनी सेना है । हे ब्रह्मन् ! सभी अपार समृद्धि है यह मेरे कौन से पुण्य का फल है यह सब संक्षेप में विचार कर कहो । बाल्मीकि मुनि राजा का प्रश्न सुनकर प्राणायाम करके दो घड़ी तक ध्यानावस्थित होकर भूत, भविष्य और वर्तमान वेत्ता हाथ में लिये दर्पण की भाँति विश्व की होने वाली सब घटनायें देखकर हृदय में निश्चित करके राजा से बोले- राजन् ! आप अपने पूर्व जन्म के चरित्र का विवरण सुनो, हे राजेन्द्र ! पूर्व जन्म में आप द्रविण देश में सुदेव नाम के ब्राह्मण थे, ताम्रपर्णी नदी के किनारे रहते थे, आप बहुत धर्मात्मा, सत्यवादी, सन्तोषी, वेदाध्ययन करने वाले हरिभक्त थे, अग्निहोत्र आदि यज्ञों द्वारा आपने हरि को प्रसन्न किया था । आपके सर्वांग सुन्दर उत्तम गुण वाली गौतम ऋषि की पुत्री गौतमी नाम की सर्वश्रेष्ठ स्त्री थी जैसे पार्वती जी शंकर की सेवा करती हैं वैसे ही वह गौतमी अपने पति की प्रेम से सेवा करती थी । गृहस्थ धर्म में चलते हुए दोनों को बहुत समय बीत गया, किन्तु सन्तान सुख प्राप्त नहीं हुआ । एक दिन सुदेव आसन पर बैठा हुआ अपनी स्त्री से सेवा कराता हुआ दुःखित वाणी से बोला- हे सुन्दरि ! संसार में पुत्र से अधिक बढ़कर कोई सुख नहीं है, तप और दान से उत्पन्न पुण्य परलोक में सुख देता है। किन्तु शुद्ध कुल में उत्पन्न हुई सन्तान इस लोक और परलोक दोनों में सुख देती है। ऐसी श्रेष्ठ सन्तान मुझे प्राप्त न होने से मेरा जीवन निष्फल है क्योंकि पुत्र का न तो लालन-पालन किया, न वेदार्थ पढ़ाया, न विवाह आदि संस्कार किया अतः मेरा जन्म वृथा ही गया । ऐसे जीवन से मेरी मृत्यु हो जाय तो अच्छा है। अपने पति के ऐसे वचन सुन वह सुन्दरी मन में बहुत दुःखी हुई । प्रिय भाषणी, चतुर धीरज धरकर पति को ढांढस बँधाते हुए समझाने लगी । हे प्राणेश्वर ! अभी ऐसी तुच्छ बात मत कहिये आप जैसे वैष्णव भागवताचारी मोह रूपी जाल में नहीं पड़ते । हे द्विज ! आप सत्यकर्म में लीन हो, सत्यव्रती ही स्वर्ग को जाता है, हे सुब्रत ! आप जैसे ज्ञानी पुरुष पुत्र सुख की इच्छा नहीं करते । हे ब्रह्मन् ! पहले राजा चित्रकेतु जब पुत्र शोक में दुःखित हुआ तब नारद और अंगिरा मुनि ने आकर उन्हें पुत्र शोक से मुक्त किया था। जिस प्रकार अंगराजा अपने दुष्ट पुत्र बेन के कारण रात्रि में वन को चला गया वैसे ही हे स्वामी ! कभी-कभी सन्तान भी दुःखदाई हो सकती है यदि आपको सुपुत्र की इच्छा हो तो सब अर्थ के देने वाले हरि जगन्नाथ की आराधना करो । हे ब्रह्मन् ! जिनकी आराधना करके महर्षि कर्दम ने सांख्य के आचार्य योगियों में श्रेष्ठ कपिलदेव को प्राप्त किया । इस प्रकार अपनी पत्नी के वचन सुन वह ब्राह्मण मन में निश्चय कर पत्नी सहित ताम्रपर्णी नदी के किनारे गया । वहाँ जाकर पुण्य तीर्थ में स्नान कर महान तप करने लगा, पाँच-पाँच दिन में सूखे पत्तों का आहार कर जल पीता था । ऐसे तप करते हुए उस तपोनिधि को चार हजार वर्ष बीत गये । हेब्रह्मन् ! उसके तप से जब तीनों लोक काँप उठे तब उस सुदेव का महा उग्र तप देखकर शीघ्र ही गरुड़ पर सवार हो भक्तवत्सल भगवान प्रकट हुए। श्रीनारायण बोले-नवीन मेघ के तुल्य वर्ण वाले विश्वरक्षक, जगत् के पालन कर्ता, चार भुजा वाले अति प्रसन्न मुरारी के दर्शन करके बड़े हर्ष से सुदेव ब्राह्मण ने भगवान मुकुन्द को साष्टांग प्रणाम किया । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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