श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की तेरहवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

तेरहवाँ अध्याय- चित्रधर्मा का बैकुण्ठ गमन तथा दृढ़धन्वा राजा की कथा।

ऋषि बोले-हे वक्ताओं में श्रेष्ठ महाभाग सूतजी ! दृढधन्वा राजा को पुरुषोत्तम के सेवन से राज्य, पुत्र पौत्रादि और पतिव्रता स्त्री कैसे मिली तथा योगियों को भी दुर्लभ लोक की कैसे प्राप्ति हुई सो हे तात ! आपके मुख कमल से बार-बार कथा के सार को सुनकर हम लोगों की तृप्ति नहीं होती । अतः इस पुरातन इतिहास को विस्तार से कहिये । हमारे भाग्यबल से ही ब्रह्मा ने आपको यहाँ भेजा है। सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो ! नारायण मुनि ने नारदजी से जो कहा था वही पुरातन इतिहास मैं आप लोगों से कहता हूँ पापनाशक दृढधन्वा का चरित्र जैसा मैंने गुरुजी के मुख से सुना है वही आप सब मुनि लोग सुनो । श्रीनारायण बोले- हे ब्राह्मण ! आकाश गंगा की तरह पवित्र करने वाली सुन्दर पुरानी दृढधन्वा राजा की कथा को मैं कहता हूँ तुम सुनो । हैहयदेश का रक्षक बुद्धिमान, सत्यवादी, पराक्रमी चित्रधर्मा नाम का राजा था । उसका पुत्र महातेजस्वी सर्व गुण सम्पन्न, सत्यवादी, धार्मिक, सदाचारी दृढधन्वा नाम से विख्यात हुआ । उसके विशाल नेत्र थे चौड़ी छाती और लम्बी भुजायें थीं ऐसे गुण समूहों के साथ वह दृढधन्वा राजा नित्य प्रति बढ़ने लगा । वह चतुर दृढधन्वा एक बार के सुनने से ही अध्ययन कर लेता था मानो पूर्व से ही वेद पढ़े हुए हों ऐसा प्रकट होता था । चारों वेदों को पढ़ने के बाद गुरु को दक्षिणा दे और उनका विधिवत् सम्मान कर वह बुद्धिमान राजकुमार गुरु की आज्ञा से अपने पिता के नगर को गया । नगर निवासी उसे देखकर बड़े आनन्दित हुए और उसके पिता चित्रधर्मा भी अपने पुत्र को देखकर परम प्रसन्न हुए क्योंकि धर्म को जानने वाले युवराज प्रजा पालन में समर्थ हो गये थे । इस संसार में इससे •बढ़कर और कौन सुख हो सकता है। राजा ने मन में सोचा अब मैं दो भुजाधारी मुरलीधर, प्रसन्न मुख, शांत, भक्तों को अभय करने वाले श्रीकृष्ण की आराधना करूँगा । जैसे ध्रुव, अम्बरीष, ययाति, शर्याती, शिवि, रंतिदेव, शशबिन्दु, भगीरथ, भीष्म, विदुर, दुष्यंत, भरत, पृथु, उत्तानपाद, प्रहलाद, विभीषण आदि यह सभी भोगों को छोड़ भगवान पुरुषोत्तम की आराधना कर परम पद को प्राप्त हुए। इसलिये मैं भी स्त्री, घर, पुत्रादि के स्नेह रूपी बंधन को तोड़कर वन में जाकर हरि का भजन करूँगा । मन में ऐसा निश्चय करके चित्रधर्मा अपने पुत्र दृढधन्वा को राज्य पाट सौंपकर विरक्त हो पुलह ऋषि के आश्रम को चले गये। जहाँ सब कामनाओं का परित्याग कर निराहार रह निरन्तर श्रीकृष्ण भगवान का स्मरण करते हुए तप करने लगे। बहुत समय तक तप करके वे अंत में भगवान के परमधाम को चले गये । जब दृढधन्वा ने अपने पिता की वैष्णवी गति को सुना तो चित्त में उनके वियोग का दुःख हुआ परन्तु परमधाम की प्राप्ति से उन्हें हर्ष भी हुआ । पश्चात् विद्वानों के कथनानुसार पिता का शास्त्र विधि अनुसार सब कर्म किया। नीतिशास्त्र में निपुण पुण्यात्मा राजा दृढधन्वा पुष्करावर्तक नामक नगर में राज्य करने लगा । विदर्भ देश के राजा की अद्वितीय सुन्दरी कन्या दृढधन्वा की गुणसुन्दरी नाम की सुशील स्त्री थी । जिससे सुन्दर एवं चतुर चार पुत्र और सुलक्षणा चारुमती नाम की एक पुत्री उत्पन्न हुई । ये सभी पुत्र शूरवीर थे जिनके नाम चित्रवाक, चित्रवाह, मणिमान और चित्रकुण्डल थे जो अपने अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध हुए । दृढधन्वा राजा भी अपने गुणों से प्रसिद्ध हुए वह शान्त, दृढ़प्रतिज्ञ, रूपवान, गुणवान्, र, श्रीमान, स्वभाव से सुन्दर, अंग सहित वेदों को जानने शूर, वाले, सभा में प्रिय बोलने वाले, धनुर्विद्या में निपुण, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्यरूपी छहों शत्रुओं को जीतने वाले, क्षमा में पृथ्वी की तरह, गम्भीरता में सागर के समान, समता में ब्रह्म की भाँति, कृपा करने वालों में महादेव के समान, एक स्त्री व्रत धारण करने वालों में दूसरे राम के समान महापराक्रमी, श्रेष्ठ, धर्मवान मानो दूसरे हैहय वंशीय कार्तवीर्य के समान थे । श्रीनारायण बोले-एक दिन उस राजा को सोते समय रात्रि में चिन्ता हुई कि अहो ! यह महान वैभव किस पुण्य के कारण हुआ । न मैंने कोई तप किया, न दान किया, न कभी यज्ञ किया। इस अपने सौभाग्य का कारण किससे पूछूं । ऐसा सोचते विचारते सारी रात बीत गई । प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर यथाविधि स्नान कर, अर्घ्य आदि दे तथा देवालय में देव पूजन करके ब्राह्मणों को , सूर्य को दान देकर उन्हें नमस्कार कर घोड़े पर चढ़ तत्काल शिकार खेलने वन को चला गया। वहाँ बहुत से मृग, सूअर, सिंह, नील गाय आदि का शिकार किया। वन में राजा दृढधन्वा के बाण से घायल होकर एक मृग एक वन से भागता हुआ दूसरे वन को चला गया । तब राजा भी बाण ताने हुए उसके रक्त गिरे हुए मार्ग से उसके पीछे-पीछे गया । किन्तु मृग के कहीं छिप जाने से राजा उस वन में भटकता रहा । तब प्यास से व्याकुल होकर उसने एक सुन्दर सरोवर को देखा राजा ने वहाँ जाकर पानी पीया और उसके किनारे पर एक घनघोर छायादार वट वृक्ष की जटा से अपने घोड़े को बाँधकर स्वयं वहीं पर बैठ गया । उसी समय वहाँ एक तोता अत्यन्त शोभायमान मनुष्यों की सी बोली बोलता हुआ आया और राजा दृढधन्वा को अकेला बैठा हुआ समझ वह निम्न श्लोक को बार-बार पढ़ने लगा- विद्यमानातुल सुखसालोक्यातीव भूतले । न चिंतयसि तत्त्वं त्वं तत्कथं पारमेष्यसि ॥ राजन् ! तुम इस भूतल पर विद्यमान अतुल सुखों को देखकर तत्त्व (आत्मा) के सम्बन्ध में विचार नहीं कर रहे हो तो कैसे भवसागर से पार होगे । बार-बार इस पद्य को सुनकर राजा आनन्द को प्राप्त हुए और मोह ग्रस्त भी हुए । तोता सार गर्भित कठोर नारियल के समान गम्भीर पद्य को बार-बार क्यों पढ़ता है ? जो बड़ी कठिनाई से समझ में आने योग्य है । क्या ये ही श्रीशुकदेवजी हैं जो श्रीकृष्ण के सेवक मुझ संसार में डूबे हुए मूढ़ को परीक्षित की भाँति कृपा करके उद्धार करने आये हैं। ऐसा सोच ही रहे थे कि इतने ही में उनकी सेना भी राजा को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ आ गई । उधर तोता भी राजा को आत्म-बोध कराकर अन्तर्ध्यान हो गया । राजा अपने नगर में आकर तोता के वाक्य को स्मरण करते रहे । उन्होंने भोजन पानी सब छोड़ दिये गुम-सुम हो गये किसी के बोलने से भी नहीं बोलते तब रानी ने एकांत में आकर राजा से प्रेम सहित कहा- हे राजन् ! आज ऐसे उदास क्यों हो रहे हो ? उठिये उठिये भोजन पानी कीजिये और बातचीत कीजिये । उस प्रकार रानी के समझाने पर भी राजा देवताओं को भी दुर्ज्ञेय तोता के सत्य वचन स्मरण करता रहा और कुछ भी न बोला । तब रानी दीर्घश्वाव लेकर अपने पति के मानसिक दुःख से अत्यन्त पीड़ित हुई और स्वामी की कठिन चिन्ता के कारण को नहीं जान सकी । ऐसी चिन्ता में राजा का बहुत समय व्यतीत हो गया किन्तु संदेह दूर करने को कोई उपाय दिखाई नहीं दिया । नारदजी बोले हे मुने! ऐसी चिन्ता करते हुए राजा दृढधन्वा का क्या हुआ ? सो कहिये, क्योंकि विष्णु भगवान के पवित्र चरित्र को थोड़ा सा भी सुनने से पाप नाश हो जाते हैं । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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