श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की बारहवें अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

बारहवाँ अध्याय– द्रौपदी की अग्नि कुण्ड से उत्पत्ति, श्रीकृष्ण का पुरूषोत्तम व्रत का उपदेश।

नारदजी बोले – हे नाथ ! शंकरजी के चले जाने पर चिंतातुर उस बाला ने क्या किया ? सेवा, धर्म और सिद्धि के लिये मुझ दीन की सुनने की इच्छा है सो कहो । श्रीनारायण बोले- इसी प्रकार युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण भगवान से पूछा था तब भगवान ने युधिष्ठिर से जो कुछ कहा था वह मुझसे सुनो। श्रीकृष्ण भगवान बोले-हे राजन् ! इस प्रकार शिव के चले जाने पर वह कन्या कांति हीन हो गई, लम्बी-लम्बी श्वास लेने लगी, अत्यन्त डरी हुई, पतली कमर वाली आँसू बहाती हुई, रोने लगी । हृदयाग्नि से उसका शरीर जलने लगा और उस तपस्विनी की अवस्था दावाग्नि से जले हुए लता के पत्तों की भाँति हो गई। ऐसे दुःख पाते हुए जब बहुत समय बीत गया तब काल ने उस तपस्विनी को धर दबोचा । जैसे बिल में चूहेको सर्प दबोच लेता है वैसे ही तपस्विनी को बलवान काल ने दबोच लिया। जैसे वर्षा काल में मेघ से छाये आकाश में बिजली चमक कर रह जाती है वैसे ही वह तप से पाप भस्म कर अपने ही आश्रम में मर गई । उस समय धर्मात्मा राजा यज्ञसेन अनेक सामग्री से युक्त एक महान यज्ञ कर रहे थे तब उसी यज्ञ कुंड में से स्वर्ण के समान कांति वाली एक कन्या का प्रादुर्भाव हुआ जो पहिले ऋषि कन्या थी । वह अब यह राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के नाम से विख्यात हुई है । हे राजन् ! इसको स्वयंवर में अर्जुन ने मत्स्य बेधकर, भीष्म, कर्ण आदि बहुत से राजाओं का मान मर्दन करके प्राप्त किया था । श्रीनारायण बोले-हे नारद ! उसी द्रौपदी को दुष्ट दुःशासन ने बाल पकड़ कर खींची थी और कर्ण ने शूल जैसे कटु वचन सुनाये थे । श्रीकृष्ण बोले- हे राजन् ! पुरुषोत्तम मास के त्यागने से मैंने भी इसको त्याग दी जब अत्यन्त स्नेह के साथ मेरा नाम ले लेकर यह बार-बार चिल्लाई कि हे दामोदर ! हेदयासिन्धो ! हे कृष्ण ! हे जगत्पते ! हे नाथ ! हे रमानाथ ! हे केशव ! हे क्लेश नाशन ! मेरे माता, पिता, भाई-बन्धु, सखी, भानजा, बहिन, इष्ट, मित्र, पति आदि कोई भी नहीं है । हे हृषीकेश ! मेरे तो सब कुछ आप ही हैं । हे गोविन्द ! दुःशासन मेरा भरी सभा में अपमान कर रहा है क्या इसे आप नहीं देख रहे हैं। दुःशासन द्वारा खींची गयी द्रौपदी पहले मुझ पुरुषोत्तम को भूल गयी थी परन्तु जब इसने मुझे याद किया तब हे राजन् ! मैं तत्काल गरुड़ पर चढ़कर वहाँ आया और अनेक प्रकार के वस्त्रों से इसको आच्छादित कर दिया । जो सदा मुझमें स्नेह करने वाली, मुझे अत्यन्त प्यारी, पतिव्रता, मेरे प्राण तुल्य और मेरी प्रिय सखी थी, ऐसी द्रौपदी की भी पुरुषोत्तम के अनादर करने के कारण मैंने उपेक्षा कर दी थी । अतः पुरुषोत्तम का अनादर करने वाले को मैं गिरा देता हूँ। सब प्रकार से यह पुरुषोत्तम व मास मनुष्यों, मुनियों तथा देवताओं को भी मान्य है और मन इच्छित फल देने वाला है, इससे अब आने वाले पुरुषोत्तम मास की आराधना करो ताकि चौदह वर्ष पूरे होने पर तुम्हारा अवश्य कल्याण होगा । हे पांडुपुत्र ! राजसभा में जिन-जिन ने भी द्रौपदी के केशों को खींचते हुए देखा है मैं उन-उन की स्त्रियों के बालों को क्रोध से उखाड़ दूंगा और दुर्योधनादि राजाओं को यमलोक पहुँचा कर सब शत्रुओं का नाश करके तुम्हें सम्राट बना दूँगा । हे राजन् ! मुझे लक्ष्मीजी, बलदेवजी, माता देवकी, सात्यकी, प्रद्युम्न आदि कोई भी इतना प्रिय नहीं है जितना मुझको मेरे भक्त प्रिय हैं। जिसने मेरे भक्त को सताया है मैं उसे सदा पीड़ित करता हूँ । हे पांडुपुत्र ! मेरा उसके समान कोई शत्रु नहीं है, मैं उसकी ओर देखता भी नहीं हूँ, उसको यमराज ही दण्ड देने के अधिकारी हैं। श्रीनारायण बोले- इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण द्रौपदी और पाँचों पाण्डवों को समझाकर द्वारिकापुरी जाने की इच्छा से बोले-हे राजन् ! अब मैं अपने बिरह में विकल द्वारिकापुरी को जा रहा हूँ जहाँ महाभाग वसुदेवजी, बड़े भाई बलदेवजी, माता देवकी, गद, साम्ब, आदि आहुक, उग्रसेन आदि यादव लोग रुक्मिणी आदि मेरी पलियाँ ये सब मेरे आने की प्रतीक्षा में टकटकी लगाकर मेरे दर्शन की उत्कंठा में मेरे चिंतन में लगे हुए हैं। श्रीनारायण बोले-श्रीकृष्ण भगवान के ऐसा कहने पर और उनके जाने के अभिप्राय को समझकर पाँचों पांडु पुत्र गद्गद् कण्ठ से बोले- हे जनार्दन ! जैसे जलचर प्राणियों का जल ही जीवन है वैसे हमारे भी जीवन आप ही हो, आप जा रहे हैं जाइये परन्तु थोड़े ही दिनों में हमको दर्शन दीजिये क्योंकि सब लोग यह कहते हैं कि पांडवों के नाथ श्रीकृष्ण ही हैं, त्रिलोकी में और कोई नहीं है अतः हमारी आप सदा रक्षा करते रहें । हे जगदीश्वर ! भले बुरे जैसे भी हैं हम सब आपके ही हैं भूल मत जाना । हमारे चित्त रूपी भ्रमरों का जीवन आपके पदरूपी कमलों के आधीन है। आप ही हमारे जीवन के आधार हो हम बार-बार यही प्रार्थना करते हैं। पांडु पुत्र ऐसा कह उनके पीछे-पीछे चलने लगे तब श्रीकृष्ण भगवान प्रेम मग्न हो रथ में धीरे-धीरे बैठ पांडु पुत्रों को लौटाकर द्वारिकापुरी चले गये । श्रीनारायण बोले- द्वारिकानाथ श्रीकृष्ण के द्वारिकापुरी चले जाने के बाद युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित तप नियम व्रत करते हुए तीर्थयात्रा को चल दिये । हे नारदजी ! भगवान के प्रिय पुरुषोत्तम मास में मन लगाकर और श्रीकृष्ण का वचन स्मरण कर द्रौपदी और छोटे भाइयों से युधिष्ठिरजी बोले-अहा ! हमने पुरुषोत्तम मास का कितना उच्च माहात्म्य सुना है । इसकी बिना आराधना के मनुष्य कैसे सुखी रह सकता है । इस लोक में वही पूज्य, धन्य और श्रेष्ठ है जो अनेक प्रकार के नियमों से पुरुषोत्तम की पूजा करे । इस प्रकार तीर्थयात्रा करते हुए पुरुषोत्तम मास आ गया सबने विधि अनुसार नियम धारण किया । हे मुने ! चौदह वर्ष भी पूरे हो गये तब श्रीकृष्ण की कृपा से उन्होंने भारत वर्ष का निष्कंटक राज्य प्राप्त किया। पहिले सूर्यवंशी राजा दृढधन्वा पुरुषोत्तम के ही सेवन से महालक्ष्मी पाकर पुत्र पौत्र का सुख तथा अनेक प्रकार के भोगों को भोगकर अंत में हरिलोक को गया । हे मुनि सत्तम ! मैं पुरुषोत्तम मास का अतुल माहात्म्य करोड़ों कल्पों में भी कहने में समर्थ नहीं हूँ । सूतजी बोले-हे विप्रो ! यद्यपि मैंने पुरुषोत्तम का माहात्म्य वेदव्यासजी से सुना है तो भी कहने में असमर्थ हूँ । सम्पूर्ण माहात्म्य को या तो आप नारायण ही जानते हैं या साक्षात् बैकुण्ठवासी हरि जानते हैं । सब ब्रह्मादि देवता गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के सिंहासन को नमस्कार करते हैं। स्वयं पूजने वाले देवता भी पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य नहीं जानते फिर मनुष्य कैसे जान सकता है । 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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