श्रीकृष्ण स्वरूप अधिकमास की स्नान, दान, पुण्य, तप आदि का एवं अधिकमास की ग्यारहवे अध्याय की कथा एवं महात्म्य-

ग्यारहवाँ अध्याय– ऋषि पुत्री का घोर तप तथा शिव का उसे पाँच पति होने का वरदान देना।

नारदजी बोले – हे महामुने ! ऋषि कुमारी, जो तप मुनियों को भी दुष्कर कार्य है वह उसे कैसे करने लगी ? यह हमें सुनाइये । श्रीनारायण बोले- उस कल्याणी ने शांत सनातन पाँच मुखी शिव का चिंतन कर अति दारुण तप आरम्भ किया । सर्पों के आभूषण, नन्द और भृंगीगण से सेवित, चौबीसों तत्त्वों और तीनों गुणों से समन्वित आठों महा सिद्धियों, प्रकृति एवं पुरुष से युक्त मस्तक पर अर्द्धचंद्र एवं जटा मुकुट से शोभित ऐसे भगवान शिव का ध्यान कर वह बाला ग्रीष्म ऋतु के सूर्य में पंचाग्नि के मध्य बैठकर परम तप करने लगी । हेमन्त और शिशिर ऋतु में ठण्डे जल में बैठकर, मुख को जल के ऊपर करके तप करने लगी। उस समय वह ऐसी प्रतीत हुई मानो जल में कमलिनी खिली है। सिर के नीचे काले बाल ऐसे शोभित होते थे कि मानो लतायें फैली हुई हों । शीत के कारण उसके ब्रह्मरंध्र से निकलता हुआ धुआँ ऐसा प्रतीत होता था मानो कमल के मकरंद का पान करके भौरे निकल रहे हों। वह कोमलांगी कन्या प्रातः और सायंकाल धूम्रपान करके रहती थी। उसका कठोर तप सुनकर इन्द्र बड़ा चिन्तित हुआ । हे नृपनन्दन ! सब देवताओं को सराहने योग्य ऐसे तप में लगी हुई ऋषि कन्या को नौ हजार वर्ष बीत गये । तब पार्वती पति शंकर ने बाला के तप से प्रसन्न हो उसे अपने अगोचर रूप का दर्शन दिया। वह शिव का दर्शन पाकर झटपट खड़ी हो गई मानो देह में प्राण वापस आ गये हों । वह तप से दुबली बाला हृष्ट-पुष्ट हो गई । हवा, धूप और वर्षा से पीड़ित वह कन्या शिवजी को अत्यन्त प्रिय लगी । तब कन्या ने नम्र हो शंकरजी को प्रणाम किया । फिर विश्व बन्दित शंकर की मानसिक उपचारों से पूजा करके बड़ी श्रद्धा भक्ति से स्तुति करने लगी। कन्या बोली- हे पार्वती बल्लभ ! हे प्राणनाथ ! हे प्रभो ! हे भर्ग ! हे भूतेश ! हे गौरीश ! हे शम्भो ! हे तमः ! हे सोम, सूर्य और अग्निरूपी दिव्य त्रिनेत्र वाले ! मेरे आधार ! हे मुण्डमाल धारी ! आपको नमस्कार है। अनेक तापों से उत्पन्न पीड़ा वाले, व्याधि से युक्त, इस घोर संसार रूपी सागर में डूबे हुए, दुष्ट काल रूपी सर्प की उग्र दाढ़ों से इसे हुए प्राणी भी आपकी शरण में आकर मुक्त हो जाते हैं। हे विभो ! आपने बाणासुर को अपनाया, राजा अलर्क की मरी हुई स्त्री को जीवित किया । हे दयानाथ ! हे भूतेश्वर ! हे चंडीश्वर ! हे भवत्राण ! हे मृत्युञ्जय ! हे प्राणनाथ ! हे दक्षयज्ञ के विध्वंसक ! हे शत्रुओं के नाशक ! अपने भक्तों के जन्म मरण रूप बन्धन के नाशक ! आवागमन के मिटाने वाले ! हे सृष्टिकर्ता ! हे प्राणपति ! हे पापहारी ! आपको नमस्कार है । श्रीकृष्ण बोले- हे युधिष्ठिर ! मेधावी ऋषि की तपस्विनी पुत्री मन और वाणी से शिवजी की स्तुति कर शांत हो गई । ऋषि पुत्री के महा उग्र तप से युक्त उसकी स्तुति को सुन शिवजी बड़े प्रसन्न होकर बोले-हे तपस्विनी, हे महाभागे ! तेरा कल्याण हो, मन इच्छित वर माँग, मैं तुझ पर बहुत प्रसन्न हूँ चिन्ता मत कर, हे राजन् ! महा आनन्द में मग्न हुई कुमारी प्रसन्न हुए शिव के ऐसे वचन सुनकर बोली- हे दीनानाथ ! दयासिन्धो ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मुझे मन इच्छित पति दीजिये । हे प्रभो ! देर मत करो, हे महादेव ! मुझे पति दो, पति दो, श्रेष्ठ पति दो, मैं पति माँगती हूँ। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहती । ऐसा कहकर वह चुप हो गई । महादेव जी यह सुनकर मुनि कन्या से बोले- हे मुनि कन्या ! तूने जो कहा है वही होगा । तूने पाँच बार पति-पति कहकर वर माँगा है इसलिये हे सुन्दरी ! तेरे पाँच पति होंगे वे सब शूरवीर, धर्मवेत्ता, साधु, सत्यवादी, पराक्रमी, जवान, अपने गुणों से विख्यात, सत्य प्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय तुझे सब सुख देने वाले और सभी गुणवान राजकुलोत्पन्न होंगे । श्रीकृष्ण बोले- शंकरजी के ऐसे वचन सुनकर वह काँपते हुए बोली- हे उमाकांत ! ऐसा अनीतिपूर्ण वर देकर मेरा संसार में तमाशा न बनायें क्योंकि एक स्त्री का एक ही पति होता है । पाँच 1 पति वाली कोई स्त्री कहीं भी न देखी है और न सुनी है। हाँ यह सम्भव है कि एक पुरुष के पाँच स्त्रियाँ तो हो सकती हैं । हे शम्भो ! आपकी आराधिका होकर मैं पाँच भर्तावाली कैसे हो सकती हूँ ? हे कृपानिधे ! ऐसा कहना आपको शोभा नहीं देता । मैं आपकी हूँ अतः आपको ही लज्जा आनी चाहिये । कन्या के ऐसे वचन सुनकर शंकरजी फिर उससे बोले-हे भीरु ! इस जन्म में तुझको पति सुख नहीं मिलेगा । परन्तु तेरे अगले जन्म में जब तू अपने तपोबल से अयोनिजा (अग्नि कुण्ड से उत्पन्न) होगी तब तू पति सुख को प्राप्त हो परम पद को पावेगी ! तूने मेरे प्रिय स्वरूप दुर्वासा का अपमान किया है । हे सुभ्रू ! यदि दुर्वासा कुपित हो जायँ तो वे तीनों लोकों को भस्म कर दें । तूने अहंकार वश ब्रह्मतेज का तिरस्कार किया है और भगवान के प्रिय पुरुषोत्तम मास का सेवन नहीं किया, जिसको श्रीकृष्ण ने अपना सब ऐश्वर्य सौंपा है। हे बाले ! मैं ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता और नारद से लेकर जितने तपस्वी लोग हैं वे सब श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन करने वाले हैं। उनकी आज्ञा का उल्लंघन कौन कर सकता है । हे मूढ़ कन्या ! दुर्वासा के कहने पर भी लोक पूजित मास तूने नहीं पूजा अतः हे द्विजात्मजे ! तेरे पाँच प्रति अवश्य होंगे । पुरुषोत्तम मास के खंडन करने से अब यह टल नहीं सकता जो इस मास की निन्दा करता है वह उसके विपरीत फल पाकर घोर नरक में जाता है। जो मनुष्य पुरुषोत्तम मास के भक्त हैं वे पुत्र पौत्र और धन से सम्पन्न होकर इस लोक और परलोक की सिद्धि को प्राप्त करते हैं । हम सब देवता भी पुरुषोत्तम मास के सेवक हैं। जिससे पुरुषोत्तम भगवान प्रसन्न होते हैं ऐसे सेवन करने योग्य श्रेष्ठ मास को क्यों न पूजें ? अत्यन्त महान महात्माओं का वचन कैसे मिथ्या हो सकता है। तू ही बता, सदा बोलने वाले मुनियों की वाणी अनुकरणीय है। नीलकण्ठ महादेव ऐसे कहकर तत्काल अन्तर्ध्यान हो गये । तब वह बाला अपने झुण्ड से बिछड़ी हुई मृगी की भाँति चकित हो इधर-उधर देखती हुई रह गई । सूतजी बोले- हे मुनियों ! दोज के चन्द्रमा से युक्त भाल वाले सदाशिव के अन्तर्ध्यान होने पर जैसे इन्द्र को वृत्रासुर दैत्य का वध करने पर ब्रह्म हत्या लगने के कारण चिंता हुई थी उसी प्रकार मुनि कन्या को दुर्वासा के वचनों का उल्लंघन करने के कारण चिंता समा गई। 

जय श्री राधा कृष्णा | पुरषोत्तम भगवान की जय ||

लेखक – अनिल यादव

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