बलकों के हाथ पैरों प्रायः मस्से पैदा होकर उन्हें कुरूप बना देते हैं। इसकी अचूक ओषधि है- ‘चिरायता’। चिरायता दो प्रकार का होता है- गाँठिया और बाँसिया। गाँठिया विशेष उपयोगी है। पसारियों के यहाँ मिलता है। वैसे तो यह कई रोगों को दूर करता है, पर मस्से तो पाँच-सात दिन तक सेवन से ही सूखकर, पपड़ी बनकर गिर जाते हैं। विधि यह है-आधा तोला चिरायता कूटकर, कपड़े से छानकर चूर्ण बना ले और शहद मिलाकर उसकी चने के बाराबर गोलियाँ बना ली जायँ। प्रातः शौचादि के बाद 4-5 गोली प्रति दिन सेवन करा दें। बालक सरलता से निगल सकते हैं। औषधि-सेवन के समय तेल, लाल मिर्च का परहेज रखें। इनका प्रयोग अनेक बार शत-प्रतिश्रूात सफल हुआ है। चिरायता शब्द ‘चिरायुत्व’ (लंबी आयु) – का अपभं्रश है।

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