श्रीहनुमानजी के प्रति शंकाओं का स्पष्ट समाधान प्रमाणिक उदाहरण सहित ।

श्रीहनुमानजी के प्रति इस धरा में कई प्रकार की भ्रामक शंकायें अन्जान लोंगों द्वारा उत्पन्न कर दी गयीं। इन शंकाओं का प्रमाणिक उदाहरणसहित समाधान किया जाना अति आवश्यक है, जिससे जन-कल्याण और मंगल हो। पाठकों को आश्चर्य अवश्य होता होगा कि जिन श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘असुभ होई जिन्ह के सुमिरे ते बानर रीछ बिकारी।’ (विनय-पत्रिका 166/9) के नियमानुसार स्वयमेव हनुमानजी से श्रीरामचरितमानस (5/6/4) में कहा है कि-
 
प्रात लेई जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।’’
 
-इत्यादि कहा-कहलाया, वे ही ‘विनय-पत्रिका’-में हनुमानजी को-
 
‘जयति मंगलागार’ (27/1)
 
‘मंगल-मूरति मारूत नंदन। सकल अमंगल-मूल-निकंदन।।
पवनतनय संतन-हितकारी। हृदय बिराजत अवध-बिहारी।।’ 
(27/1)
 
-इत्यादि कैसे कह डालते हैं। ऐसी परस्पर-विरोधी बातों पर शंका होना स्वाभाविक है। प्रातःकाल मंगल-स्मरण का विधान है। यों भी प्रत्येक कार्यारम्भ में, विशेषकर स्थिर कार्यादि के प्रारम्भ में ‘मंगलाद्यप्रयोगं च’ मंगल स्मरण आवश्यक तथा उसका अनुष्ठान न करना दोषवह माना गया है। ऐसी दशा में व्यक्ति बड़ी द्विविधा में पड़ जाता है कि वह प्रातःकाल एवं यात्रा, कार्यारम्भ आदि में अन्य मंगल-स्मरणों के साथ श्रीहनुमानजी का भी स्मरण करे या नहीं। अस्तु यहाँ संक्षेप में इसी प्रश्न पर विचार प्रस्तुत करने का यत्न किया जा रहा है। आरम्भ में ‘मंगल’ शब्द तथा मंगल पदार्थ पर भी कुछ विचार कर लेने से प्रसंग को सागोपाग समझने में सहायता मिलेगी; अतः थोड़ा उस पर भी विचार किया जा रहा है।
 
मंगल पदार्थ क्या है?
 
गत्यर्थक ‘मगि’ धातुसे ‘अलच्’ प्रत्यय (उणादि पच्चमपाद अन्तिम मंगलसूत्र) द्वारा ‘मंगल’ शब्द निष्पन्न होता है। पुनः उससे ‘यत्’ प्रत्यय करने से ‘मंगल्य’ एवं ‘ष्य´्’ करने से ‘मागल्य’ शब्द बनता है- ‘कल्याण मंगलं शुभम्।’
 
मंगला सितदूर्वायामुमायां पुंसि भूमिजे।
नपुंसकं तु कल्याणे सर्वार्थरक्षणेऽपि च।।
मंगल्यः स्यात् त्रायमाणाश्वत्थबिल्वमसूरके।
स्त्रियां शम्यामधः पुष्पीमिसीशुक्लवचासु च।।
रोचनायामथो दध्नि क्लीबं शिवकरे त्रिषु।
 
‘मेदिनीकर’ के इस वचन तथा-
 
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।।
(मानस 7/3/5)
 
औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।
(मानस 2/5/1)
 
-इत्यादि के अनुसार दधि, दूर्वा, अक्षत, हरिद्रा, रोली, चन्दन, ताम्बूल, सुपारी, बिल्ब, रोचना, ब्राह्मण, राजा, वेश्या, सजल कलश, दीप, आम्रपल्लव, कदलीपत्र, दीपक, शंख, दर्पण, मंगलवाद्य, पुष्प, कन्या एवं पतिव्रता तथा सौभागिनी स्त्री, गौ, मागध-बन्दी, ध्वजा- पताका आदि ‘मंगल पदार्थ’ हैं। रघुनन्दनभट्ट के ‘एकादशी तत्व’ में तो कुशलाचारता को ही ‘मांगल्य’ कहा गया है। किंतु ‘रत्नमाला’ आदि में हंस, शिखि, शुक, पिक, चाष आदि पक्षियों को एवं अश्व-गजादि के घोष को भी ‘मंगलमय बतलाया गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण, गणपति-खण्ड के 16वें अध्याय और उसी के श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड, उत्तरार्द्ध के 70वें अध्यायमें एवं मानस, बालकाण्ड 299 से 305 दोहे तक नकुल, मृगमाला, श्वेत चामर, अश्वत्थ, शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु, मीन, श्रृगाल (लोवा-लोमड़ी) आदि मंगलमय प्राणी-पदार्थों की एक बड़ी तालिका प्राप्त होती है।
 
सर्वोत्कृष्ट मंगलसारसर्वस्वता
 
वेदों में मंगल के लिये ‘स्वस्ति न इन्द्रः’, ‘भद्रं कर्णोभिः’ आदिमें ‘स्वस्ति’ तथा ‘भद्र’ आदि शब्द ही अधिकतया प्रयुक्त हैं। उनमें ‘मंगल’ पदके-‘सुमंगलीरियं वधूः (ऋक0सं0 10/84/33,), ‘सुमंगली प्रतरणी’‘मंगलिकेभ्यः स्वहा’ इत्यादि प्रयोग विरले ही प्राप्त होते हैं। श्रीमदभगवतादि पुराणों में इस शब्द का प्रयोग अवश्य प्रचुररूप से उपलब्ध है, पर सर्वाधिक प्रयोग किया है इसका श्री गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने ही, अकेले मानस में ही यह शब्द प्रायः तीन सौ बार प्रयुक्त हुआ हैै। श्री रामविवाह प्रकरण में प्रति दोहे में इसका कई बार प्रयोग हुआ है। इनमें ‘मंगल’ पद की पुनरूक्तियाँ भी सुन्दर लगती हैं। 
 
वस्तुतः इन तथा अन्य सभी दृष्टियों से स्वयं भगवान् ही सभी मंगलों के मंगल, मूर्तिमान् मंगल या मंगलमूल-सारसर्वस्व हैं। यहाँ तक कि उनकी स्मृति भी सर्वार्थसाधिका कही गयी हैं।
 
गोस्वामी तुलसीदासजी के शब्दों में भी भगवान मंगलके भी मंगल, मोद के भी मोद, सुख के भी सुख, अनन्द के भी आनन्दप्रद और प्राणों के भी प्राण हैं-
 
‘आनँदहू के आनँद दाता।।’ (मानस 1/216/1)
 
‘रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के।।’
(मानस 2/73/3)
 
 
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख के राम।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम।।
(मानस 2/290)
 
इस प्रकार गोस्वामीजी भी –
मंगलरूप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते।।
(मानस 4/13/5)
 
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।।
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।
(मानस 2/138/2)
 
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।
(मानस 1/9/1)
 
नाथ! कुसल-कल्यान-सुमंगल बिधि सुख सकल सुधारिकै।
देत-लेत जे नाम रावरो, बिनय करत सुख चारिकै।।
(गीतावली 5/36/4)
 
-इत्यादि कथनों का यही तात्पर्य है।
 
श्रीहनुमानजी के विषय में शंका का कारण
 
श्री गोस्वामी तुलसीदासजी कुछ भी निराधार लिखने वाले न थे। वे जो कुछ लिखते, नानापुराण-श्रुति-स्मृति-सम्मत ही लिखते थे; विशेषकर रामचरितों के ज्ञान में तो वे अत्यन्त ही निश्णात थे। वाल्मीकीय रामायण में भगवती श्री सीता द्वारा ही वानर को ‘अशुभ कहा गया है। वचनों से सिद्ध होता है कि ‘वानर’ का प्रत्यक्ष या स्वप्नादि में भी दर्शन अम्युदयकारी या मांगलिक नहीं माना जाता। अतः श्री गोस्वामी जी का श्रीहनुमानजी द्वारा ही ‘प्रात लेई जो नाम हमारा।’ आदि कथन निराधार नहीं है, तथापि उनका ‘मंगल-मूरति मारूत-नन्दन’ कथन भी निर्मूल या असत्य नहीं है। विचार करने पर हनुमानजी की ‘मंगलसारता’-में निम्नलिखित हेतु प्रमुख दिखाई पड़ते हैं।
 
श्रीहनुमानजी की मंगलमयता
 
श्रीहनुमानजी साक्षात् शिवावतार हैं। भगवान् शिव परम-मंगलमय हैं ही। शिव शब्द का अर्थ ही परममंगल है। साक्षात् देवतारूप तथा महादेवावतार होने से श्रीहनुमानजी ‘मंगल-मूरति’ हैं ही। स्वयं श्री गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी इस शंका का खुलासा-रहस्य-भेदन विनय-पत्रिका के 27 वे आदि पदों में कर दिया है यथा- ‘जयति मंगलागार, संसारभारापहर, वानराकारविग्रह पुरारी।’ इत्यादि।
 
अर्थात जैसे शिवजी अमंगलवेश में भी अमंगलहारी नहीं हैं। सर्वदा मंगलकारी हैं-
 
‘असिव वेष सिवधाम कृपाला।।’
‘साजु अमंगल मंगल रासी।।’
 
इत्यादि, वैसे ही श्रीहनुमानजी सामान्य वानरवेश में भी मंगलागार हैं। आप आश्रितों के काम-क्रोध-लोभ-अज्ञानाश्रित जन्म-मरणरूपी संसारभारको दूरकर परमप्रभु के चरणों में पहुँचाकर परम श्रेय-महामंगल प्रस्तुत कर देते हैं। इससे बढकर मंगल और क्या होगा? यह समस्त मंगलों का भी मंगल एवं समस्त श्रेष्ठ फलों का भी तो फल है; अतः निस्संदेह श्रीहनुमानजी ‘मंगल-मूरति’ हैं और इसीलिये इन्हें ‘मंगल-मूरति मारूत-नन्दन’ कहना पूर्णरूप से सही है।
 
श्रीत्र्यमबकराय मखिने वाल्मीकिरामायण के सुन्दरकाण्ड की टीका में, इसके अतिरिक्त दूसरे-तीसरे कारणों का भी न्यास किया है। उनके अनुसार हनुमानजी की सुन्दरता और मंगलमयता के ही आधार ‘सुन्दरकाण्ड- की भी सुन्दरता एवं मंगलमयता मानी गयी है। श्री हनुमानजी सभी प्रकार से सुन्दर, कल्याणस्वरूप एवं मंगलरूप हैं। इसीलिये सुन्दरकाण्ड के पाठ से कल्याण होता है। ‘सुन्दर’ का एक अर्थ ‘हनुमान’ भी है। इधर श्रीरामप्राण होने से तो श्रीहनुमानजी शुद्ध राममय-मंगलमय सिद्ध होते ही हैं।
 
सुन्दरकाण्ड वाल्मीकीय रामायण का प्राण है, किंतु इसमें श्रीहनुमानजी ही सर्वस्व हैं। यदि वे मंगलरूप न होते तो सुन्दरकाण्ड के पाठ से पूर्ण मंगल कैसे होता? सीता का पता लगाना, उन्हें श्रीराम से मिलाना, धर्मकी स्थापना करना, धर्मोन्मूलक रावणादि राक्षसों का उन्मूलन, विभीषण-सुग्रीवादि को राज्यदान-ये सभी कार्य परम मंगलमय ही हैं। यावज्जीवन ब्रह्मचर्यधारण, ज्ञानार्जन, रामभक्तों का श्रेयोविस्तार-यही इनका मूर्तरूप है। इस प्रकार कार्यशुद्धि, ज्ञानशुद्धि, भवशुद्धि, व्यावहारशुद्धि एवं आत्मशुद्धि आदि के शुद्ध विग्रह श्री हनुमानजी विशुद्ध मंगलविग्रह-मंगलमूर्ति ही हैं, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है। और ‘प्रात लेई’ आदि कथन में इनकी नम्रता एवं निरहंकारिता भी एक हेतु है।
 
निष्कर्ष एवं उपसंहार
 
निष्कर्षतः यात्रारम्भ, कार्यारम्भ, प्रातर्मंगल आदि रूपमें सर्वत्र श्रीहनुमत्स्मरण परम मंगलमय ही है। यह बात श्री गोस्वामी जी ने निम्नलिखित पद्यों से और भी स्पष्ट हो जाती है-
 
सकल काज सुभ समउ भल सगुनप सुमंगल जानु।
कीरति बिजय बिभूति भलि हियँ हनुमानहि आनु।।
(दोहावली 232 तथा रामाज्ञाप्रश्न 3/4/1)
 
सुमिरत संकट-सोच-बिमोचन, मूरति मोद-निधानकी।।
तुलसी कपिकी कृपा-बिलोकनि, खानि सकल कल्यानकी।।
(विनय-पत्रिका 30। 2-3)
 
‘पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।’
(हनुमान चालीसा)
 
 
मंजुल मंगल मोद मय मूरति मारूत पूत।
सकल सिद्धि कर कमल तल, सुमिरत रघुबर दूत।।
(राजाज्ञा0 6/4/1)
 
सदा अभय, जय, मुद-मंगलमय जो सेवक रनरोर को।।
भगत-कामतरू नाम राम परिपूरन चंद चकोर को।
तुलसी फल चारों करतल जस गावत गई बहोर को।।
(विनय-पत्रिका 31। 5-6)
 
मंगल मूरति मारूतिहि सादर लीन्ह बुलाई।।
(राजाज्ञा0 3/6/4)
 
तुलसी तुलसी राम सिय, सुमिर लखनु हनुमान।
काजु बिचारेहु सो करहु, दिनु दिनु बड़ कल्यान।।
(राजाज्ञा0 1/1/7)
 
सुख मुद मंगल कुमुद बिधु, सगुन सरोरूह भानु।
करहु काज सब सिद्धि प्रभु आनि लिएँ हनुमान।।
(राजाज्ञा0 7/1/2)
 
इन सभी वचनों में स्पष्ट ही श्री हनुमानजी के स्मरण से नित्य-निरन्तर उत्तरोत्तर कल्याण-प्राप्ति का निर्देश है। (विनयपीयूष, सिद्धान्त-तिलकादि व्याख्याओं में इन विषयोंपर तथा पदोंके भावार्थों पर विशेष विचार हुआ है।) अतः निसंकोच कार्यारम्भ आदि में श्री सीतारामसहित श्री हनुमानजी का भी स्मरण किया जाना ही चाहिये।
 
समस्त पाठकबन्धु को मेरा हृदय से जय सियाराम जय हनुमान।
 
लेखक- अनिल यादव।

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