जातकर्म-संस्कार- नवजात शिशु श्रीमहाराज का विधिवत जातकर्म-संस्कार हुआ। पिताजी ने बालक का जातकर्म संस्कार नालच्छेदन के पूर्व ही किया। पुत्रोत्पत्ति का शुभ समाचार सुनते ही अपने कुलदेवता और अपने मान्य वृद्धपुरूषों का अभिवादन करके तत्पश्चात् अपने पुत्र का मुखावलोकन करके आपने कूप पर स्नान किया।

जन्म लेने के बाद बालकों के जो अनेक संस्कार किये जाते हैं उनमें सबसे पहला संस्कार ‘जातकर्म’ है। यह जातकर्म केवल पुत्र के उत्पन्न होने पर ही होता है; कन्या के उत्पन्न होने पर नहीं। जातकर्म संस्कार के द्वारा बालक गुणवान् और दीर्घायु होता है।

जन्म-दिन से छठे दिन अनुपम शिशु का षष्ठी संस्कार हुआ। घर की दीवार पर पुत्तलिका बनाकर ‘षष्ठी देवी’ की पूजा की गयी। षष्ठी देवी के पूजन में वैदिक मन्त्रों के उच्चारण का दोष नहीं होता। षष्ठी देवी का महात्सव विशेषकर स्त्रियाँ ही मनाया करती हैं। षष्ठी देवी नवजात शिशाुओं का लालन-पालन और उनकी रक्षा करने वाली हैं। वे प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई इसी से उनका नाम ‘षष्ठी देवी’ पड़ा। सन्तानकामी पुरूष को विधिपूर्वक षष्ठी देवी की पूजा करनी चाहिये।

नामकरण-संस्कार- श्रीमहाराजजी का जन्म अपने बड़े भाई के जन्म के पश्चात् पन्द्रह वर्ष के अन्तराल पर हुआ था। अतः कुछ लोक-रीति मान्यता के आधार पर इनकी नाक भी छिदवायी गयी थी। ‘नामकरन कर अवसरू जानी।’ ‘एकादशेऽहनि पिता नामं कारयेत्।’ इस सूक्ति के अनुसार पिताश्री ने ग्यारहवें दिन कुल-पुरोहित तथा ज्योतिषियों के द्वारा समय जानकर शुभमुहूर्त में बालक का नामकरण संस्कार विधिवत् सुसम्पन्न कराया। नाम विशोषज्ञ पण्डितों ने बहुत सोच-विचार कर बालक का श्रीभगवन्नाम परक नाम ‘नृत्यगोपाल’ रक्खा गया। एक ज्योतिषाचार्य ने महाराज जी का उज्जवल भविश्य फल बतलाया। यह सुनकर उक्त बालक के माता-पिता आदि सभी बन्धवों ने अत्यधिक आनन्द का अनुभव किया।

अनादिकाल से भारतवर्ष में बच्चों को श्री भगवान् से परिचय कराने के लिये अधिक से अधिक आनन्द का अनुभव किया।
अनादिकाल से भारतवर्ष में बच्चों को श्री भगवान् से परिचय कराने के लिये अधिक से अधिक प्रयत्न किया जाता रहा है। संस्कार सम्पन्न माता-पिता ही अपने बालकों को प्रभु के नाम-रूपों में प्रेमासक्ति उत्पन्न करने के लिए समर्थ होते हैं। वे अपने नौनिहालों के नाम प्रभु के परम कल्याणकारी नामों से चुनते हैं और बालिकाओं के नाम महासती साध्वी सीता जी, राधा जी, पार्वती जी जैसी देवियों के नाम पर रखते हैं ताकि उनके व्यक्तित्व पर सतियों का कुछ प्रभाव पड़े।

यथा नाम तथा गुणः।’ मनुष्य का जैसा नाम होता है, उसमें गुण भी बैसे ही आविर्भूत (प्रकट) होते हैं। यह लोकोक्ति प्रायः सत्य पायी जाती है बालकों का नाम लेकर पुकारने से उनके मन पर उस नाम मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और स्वभावतः उसी के अनुरूप उनके चलने की कोशिश भी होने लगती है। अतएव नामकरण में उदात्त भावना होनी चाहिए जिससे बच्चों में यश एवं भाग्य का उदय सम्भव हो। श्रीमद्भागवत के अनुसार अजामिल अति जघन्य पापी था तद्यापि वह अपनी मृत्यु के समय अपने ‘नारायण’ नाम के पुत्र के नाम उच्चारण करने मात्र के प्रभाव से सद्गति को प्राप्त हो गया।

सारांस यही है कि माता-पिता को अपने बालक नाम हमेशा ‘राम’, ‘कृष्ण’ ही रखना चाहिये। नाम की बहुत बड़ी महिमा है।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक-अनिल यादव।

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